Brinjal Farming: कब व कैसे करें बैंगन की खेती

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Brinjal Farming: कब व कैसे करें बैंगन की खेती
Brinjal Farming: कब व कैसे करें बैंगन की खेती

जानें रख-रखाव के उपाय
Brinjal Farming, (आज समाज), नई दिल्ली: भारत में बैंगन की खेती अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के अलावा लगभग सभी क्षेत्रों में की जाती है। यह एक सब्जी वाली फसल है, जिसका उत्पादन चीन के बाद सबसे ज्यादा भारत में किया जाता है। भारत के झारखंड राज्य में बैंगन की खेती सब्जी के कुल क्षेत्र के लगभग 10.1% भाग में उगाई जाती है। वर्तमान समय में बैंगन के फल हरे, बैंगनी, पीले और सफेद रंगो में उगाये जाते है। इसकी खेती को पूरे वर्ष आसानी से किया जा सकता है।

उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान

बैंगन की खेती के लिए किसी खास तरह की भूमि की आवश्यकता नहीं होती है, इसे किसी भी उपजाऊ भूमि में उगाया जा सकता है, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि भूमि उचित जल निकासी वाली हो। इसकी फसल के लिए भूमि का पीएच मान 5 से 7 के बीच होना चाहिए। बैंगन के पौधों को अच्छे विकास करने के लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। बैंगन के पौधों के लिए 25 से 30 डिग्री के तापमान उपयुक्त होता है, और ये अधिकतम 35 डिग्री व न्यूनतम 13 डिग्री तापमान को सहन कर सकते हैं।

बैंगन की उन्नत किस्में

बैंगन की कई उन्नत किस्मों को क्षेत्र की जलवायु और पैदावार के हिसाब से उगाने के लिए तैयार किया गया है। ग्रामिक कई उन्नत किस्मों के बैंगन बीज उपलब्ध हैं, जिन्हें आप इस लिंक पर क्लिक करके घर बैठे आॅर्डर कर सकते हैं।

बिजाई का समय

पहली फसल के लिए अक्तूबर में पनीरी बोयें ताकि जो नवंबर तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। दूसरी फसल के लिए नवंबर में पनीरी बोयें ताकि जो फरवरी के पहले पखवाड़े तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। तीसरी फसल के लिए फरवरी मार्च में पनीरी बोयें ताकि जो अप्रैल के आखिर से पहले ही पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। चौथी फसल के लिए जुलाई में पनीरी बोयें ताकि जो अगस्त तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाये।

बैंगन के खेत की तैयारी और उवर्रक की मात्रा

बैंगन की फसल से अच्छी उपज पाने के लिए भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसके लिए सबसे पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हलो से गहरी जुताई करें। इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए खाली छोड़ दें। इसके बाद खेत में आवश्यकता के अनुसार पुरानी गोबर की खाद डालें। गोबर की खाद के जगह आप खेत में वर्मी कम्पोस्ट का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

खेत में खाद को डालने के बाद कल्टीवेटर से दो से तीन तिरछी जुताई कर दें, इससे खेत की मिट्टी में गोबर की खाद अच्छी तरह मिल जाती है। खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी लगाकर पलेव करें। पलेव के कुछ दिन बाद जब खेत की मिट्टी ऊपर से सूखी दिखाई देने लगे तब रोटावेटर से जुताई करें।

इससे खेत की मिट्टी में मौजूद मिट्टी के ढेले टूट जाते हैं, और मिट्टी भुरभुरी हो जाती है। इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर दें।

बैंगन के पौधों की रोपाई का सही समय और तरीका

बैंगन के पौधों की रोपाई बीज के रूप में न करके पौध के रूप में की जाती है। इसके लिए बैंगन के बीज बोकर पौधों को नर्सरी में तैयार कर सकते हैं। इन पौधों की रोपाई को समतल और मेड़ दोनों पर ही कर सकते हैं। समतल भूमि में पौधों की रोपाई के लिए खेत में 3 मीटर की क्यारियां तैयार कर लें। इन क्यारियों में प्रत्येक पौधों के बीच में 2 फीट की दूरी रखी जाती है।

बैंगन की खेती

यदि पौधों की रोपाई मेड़ पर करनी हो तो उसके लिए दो से ढाई फीट की दूरी रखते हुए मेड़ को तैयार कर लिया जाता है। इसके बाद पौध रोपाई में प्रत्येक पौध के मध्य दो फीट तक दूरी अवश्य रखें। इन पौधों की जड़ों को 5 से 6 सेंटीमीटर की गहराई में ही लगाए, इससे पौधे अच्छे से विकास करते हैं। पौधों को लगाने के लिए शाम का समय अधिक उचित माना जाता है।

बैंगन के पौधों की सिंचाई

बैंगन के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसके पौधों की पहली सिंचाई पौध रोपाई के तुरंत बाद कर देनी चाहिये। गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को तीन से चार दिन के अंतराल में सिंचाई की आवश्यकता होती है, वही सर्दियों के मौसम में इसके पौधों की सिंचाई 10 से 15 दिन के अंतराल में करें। हालांकि यदि पर्याप्त बारिश हो, तो ऐसे मौसम में इसके पौधों को बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है।

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों को रोकने, अच्छे विकास और उचित हवा के लिए दो-चार गोडाई करें। काले रंग की पॉलिथीन शीट से पौधों को ढक दें जिससे नदीनों का विकास कम हो जाता है और जमीन का तापमान भी बना रहता है। नदीनों को रोकने के लिए पौधे लगाने से पहले मिट्टी में फलूकलोरालिन 800-1000 मि.ली. प्रति एकड़ या आॅक्साडायाजोन 400 ग्राम प्रति एकड़ डालें। अच्छे परिणाम के लिए पौधे लगाने से पहले एलाकलोर 2 लीटर प्रति एकड़ की मिट्टी के तल पर स्प्रे करें।

हानिकारक कीट और रोकथाम

  • फल और शाख का कीट: यह बैंगन की फसल का मुख्य और खतरनाक कीट है। शुरूआत में इसकी छोटी गुलाबी सुंडियां पौधे की गोभ में छेद करके अंदर से तंतू खाती हैं और बाद में फल पर हमला करती हैं। प्रभावित फलों के ऊपर बड़े छेद नजर आते हैं और खाने योग्य नहीं होते हैं।

    प्रभावित फल हर सप्ताह तोड़ कर नष्ट कर दें। नर्सरी लगाने से 1 महीने बाद ट्राइजोफॉस 20 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी और 50 ग्राम नीम एक्सट्रैक्ट 50 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे करें। 10-15 दिनों के फासले पर यह स्प्रे दोबारा करें। फूल निकलने के समय कोराजैन 18.5 प्रतिशत एस सी 5 मि.ली. + टीपॉल 5 मि.ली. का घोल 12 लीटर पानी में मिलाकर 20 दिनों के फासले पर दो बार स्प्रे करें।

    शुरूआती हमले में 5 प्रतिशत नीम एक्सट्रैक्ट 50 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे करें। ज्यादा हमला दिखने पर 25 प्रतिशत साइपरमैथरिन 2.4 मि.ली. प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। कीटों की गिनती अधिक हो जाने पर स्पाइनोसैड 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। फल पकने के बाद ट्राइजोफॉस या किसी और कीटनाशक की स्प्रे ना करें।

  • चेपा: पौधों पर मकौड़ा जुंएं, चेपा और मिली बग भी हमला करते हैं। ये पत्ते का रस चूसते हैं और पत्ते पीले पड़ कर झड़ने शुरू हो जाते हैं। यदि चेपे और सफेद मक्खी का हमला दिखे तो डैल्टामैथरिन + ट्राइजोफॉस के घोल 20 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी की स्प्रे करें। सफेद मक्खी के नुकसान को देखते हुए एसेटामीप्रिड 5 ग्राम प्रति 15 लीटर की स्प्रे करें।
  • थ्रिप: थ्रिप के हमले को मापने के लिए 6-8 प्रति एकड़ नीले फेरोमोन कार्ड लगाएं और हमले को कम करने के लिए वर्टीसिलियम लिकानी 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। थ्रिप का ज्यादा हमला होने पर फिप्रोनिल 2 मि.ली. प्रति लीटर की स्प्रे करें।
  • मकौड़ा जुंएं: यदि खेत में जुंओं का हमला दिखे तो एबामैक्टिन 1-2 मि.ली. या फैनाजैकुइन 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें।
  • त्ता खाने वाली सुंडी: कईं बार फसल की शुरूआत में इस कीड़े का हमला नजर आता है। इसकी रोकथाम के लिए नीम वाले कीटनाशकों का प्रयोग करें। यदि कोई असर ना दिखे और हमला बढ़ रहा हो तो रासायनिक कीटनाशक जैसे कि एमामैक्टिन बैंजोएट 4 ग्राम लैंबडा साइहैलोथ्रिन 2 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी की स्प्रे करें।

बीमारियां और रोकथाम

जड़ों में गांठें: यह बैंगन की फसल की आम बीमारी है। यह फसल के शुरूआती समय में ज्यादा खतरनाक होते हैं। इससे जड़ें फूलने लग जाती हैं इस बीमारी के हमले से फसल का विकास रूक जाता है, पौधा पीला पड़ जाता है और पैदावार भी कम हो जाती है।

इसकी रोकथाम के लिए फसल चक्र अपनाएं और मिट्टी में कार्बोफिउरॉन या फोरेट 5-8 किलो प्रति एकड़ मिलाएं।

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