Jagannath Puri Temple Mahaprasad: प्रसाद के लिए क्यों बड़ी संख्या में घंटों कतारों में लगते हैं श्रद्धालु

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ओडिशा के पुरी में विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथयात्रा आज शुरू हो गई और इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के प्रसाद का बहुत महत्व है। इसे महाप्रसाद कहा जाता है। प्रसाद को मिट्टी के बर्तनों में बनाया जाता है। भक्तों में प्रसाद लेने की इतनी होड़ रहती है कि वह लंबी-लंबी कतारों में घंटों प्रसाद की प्राप्ति के लिए खड़े रहते हैं। यात्रा 24 जुलाई को संपन्न होगी।
Jagannath Puri Temple Mahaprasad
Jagannath Puri Temple Mahaprasad: प्रसाद के लिए क्यों बड़ी संख्या में घंटों कतारों में लगते हैं श्रद्धालु

Jagannath Puri Temple Mahaprasad, (आज समाज), भुवनेश्वर: हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि (आज 16 जुलाई) से ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ रथयात्रा शुरू हो गई।  यह  24 जुलाई तक चलेगी और इस दौरान प्रसाद का भी बहुत खास महत्व बताया गया है। बताते हैं कि पुरी में एक ऐसा रसोईघर है जहां पूरी साफ-सफाई का ध्यान रखते हुए जगन्नाथजी का प्रसाद तैयार किया जाता है। इस प्रसाद को महाप्रसाद कहा जाता है, जिसके पीछे बहुत ही खास वजह छिपी है।

मिट्टी के बर्तन में भी बनाया जाता है प्रसाद

श्रद्धालु जगन्नाथजी का प्रसाद लेने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं और कतारों में लगे रहते हैं। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद 56 भोग का होता है और इसे मिट्टी के बर्तन में भी बनाया जाता है क्योंकि, हिंदू धर्म में मिट्टी को पवित्र माना गया है। जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद को महाप्रसाद कहने के पीछे भी एक वजह छिपी है।

देवी लक्ष्मी की अनुमति के बाद ही तैयार किया जाता है प्रसाद

मान्यता है कि इस प्रसाद को देवी लक्ष्मी की अनुमति के बाद ही तैयार किया जाता है। माता किसी न किसी संकेत के रूप में मंदिर के पुजारियों को अनुमति देती हैं और फिर जाकर प्रसाद तैयार किया जाता है। यही कारण है कि इसे प्रसाद नहीं, महाप्रसाद किया जाता है जो भक्तों के लिए बहुत ही खास महत्व रखता है। कहा जाता है कि इस प्रसाद को ग्रहण करने से नकारात्मक भाव दूर होते हैं।

रथ के पहिये को तोड़ देती हैं देवी

रथ यात्रा के पांचवें यानी हेरा पंचमी के दिन माता लक्ष्मी नाराज होकर गुंडिचा मंदिर पहुंच जाती हैं। वहां जाकर देवी भगवान श्रीजगन्नाथ के नंदीघोष रथ के पहिये को तोड़ देती हैं जो कि एक सांकेतिक उत्सव होता है। देवी लक्ष्मी ऐसा इसलिए करती हैं क्योंकि, भगवान उन्हें लंबे समय के लिए छोड़कर बुआ के घर चले जाते हैं।

दशमी तिथि के दिन वापस गुंडीचा मंदिर से लौटते हैं भगवान 

भगवान जगन्नाथ पूरे एक सप्ताह तक बुआ के घर पर ठहरते हैं और फिर, आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि के दिन वापस गुंडीचा मंदिर से लौटते हैं। इसे बहुड़ा यात्रा कहा जाता है। यहां तीन दिन भगवान अपने भक्तों को मंदिर के बाहर दर्शन देते हैं और फिर, अपने मंदिर के गर्भगृह में पहुंच जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां पहुंचकर भी भगवान जगन्नाथजी को माता लक्ष्मी की नाराजगी का सामना करना पड़ता है। भगवान को नाराज देवी लक्ष्मी को मनाना होता है, तब जाकर उन्हें गर्भगृह के अंदर प्रवेश मिलता है। इसे नीलाद्रि विजय के नाम से जाना जाता है।

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