
30 जून से होगी आषाढ़ मास की शुरूआत
Ashadha Month, (आज समाज), नई दिल्ली: हिंदू धर्म में आषाढ़ मास को बेहद पवित्र और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वह समय होता है जब प्रकृति भी एक बदलाव के दौर से गुजरती है। गर्मी का मौसम धीरे-धीरे विदा लेने लगता है और वर्षा ऋतु का आगमन होता है। लेकिन इस महीने का सबसे बड़ा धार्मिक महत्व जुड़ा है भगवान विष्णु के शयन से।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे हम देवशयनी एकादशी कहते हैं, क्योंकि श्रीहरि इस दिन से अगले चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि का हिंदू परंपरा में विशेष महत्व बताया गया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आषाढ़ मास का महत्व और देवशयनी एकादशी के रहस्य के बारे में।
कब से शुरू होगा आषाढ़ मास?
द्रिक पंचांग के अनुसार, साल 2026 में आषाढ़ मास की शुरूआत 30 जून 2026, मंगलवार से होगी और इसका समापन 29 जुलाई 2026, बुधवार को होगा। हिंदू पंचांग में आषाढ़ को साल का चौथा महीना माना जाता है।
क्या है देवशयनी एकादशी का महत्व?
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद अगले चार महीने तक वे आराम करते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के दिन जागते हैं। इन चार महीनों की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। चातुर्मास समाप्त होने के बाद ही विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार और अन्य मांगलिक कामों की शुरूआत दोबारा होती है। द्रिक पंचांग के अनुसार, साल 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026, शनिवार को है।
आखिर क्यों योगनिद्रा में जाते हैं भगवान विष्णु?
विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं। देवशयनी एकादशी के दिन उनका योगनिद्रा में जाना केवल विश्राम नहीं बल्कि एक दिव्य और आध्यात्मिक प्रक्रिया माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु बाहरी गतिविधियों से अलग होकर सृष्टि के संतुलन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। योगनिद्रा का अर्थ सोना नहीं है। यह ऐसी दिव्य अवस्था होती है जिसमें भगवान केवल ध्यान में रहते हैं। इसी कारण इसे योगनिद्रा कहा जाता है।
चातुर्मास में क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?
आषाढ़ से लेकर कार्तिक तक का समय वर्षा ऋतु का प्रमुख काल माना जाता है। प्राचीन समय में यात्रा करना कठिन होता था और ऋषि-मुनि भी एक स्थान पर रहकर तप, जप और साधना करते थे।
इसी वजह से इस अवधि में विवाह और अन्य बड़े समारोहों को टालने की परंपरा शुरू हुई। धार्मिक मान्यता यह भी है कि जब भगवान विष्णु खुद योगनिद्रा में हों, तब नए शुभ कामों की शुरूआत नहीं की जाती। इसलिए विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य देवउठनी एकादशी के बाद ही किए जाते हैं।
आषाढ़ मास में क्या करना शुभ माना जाता है?
आषाढ़ मास में भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, दान, जप और धार्मिक ग्रंथों के पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान विष्णु सहस्रनाम का पाठ, श्रीहरि का ध्यान, तुलसी पूजा और जरूरतमंदों को दान करना शुभ फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने में किए गए धार्मिक कार्य कई गुना अधिक पुण्य प्रदान करते हैं और व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का मार्ग खोलते है।

