Legally News : इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, जीवन से लंबे समय तक यौन संबंध बनाने की अनुमति न देना मानसिक क्रूरता

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Aaj Samaj (आज समाज),Legally News,नई दिल्ली :

1. इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, जीवन से लंबे समय तक यौन संबंध बनाने की अनुमति न देना मानसिक क्रूरता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने अहम एक फैसले में कहा है कि जीवनसाथी से लंबे समय तक यौन संबंध न बनाने की अनुमति न देना मानसिक क्रूरता है। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर वाराणसी के दंपत्ति के विवाह विच्छेद (तलाक) की अनुमति दे दी है।न्यायमूर्ति सुनीत कुमार और न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार चतुर्थ की खंडपीठ ने वाराणसी के रविंद्र प्रताप यादव की याचीका को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है। दरअसल परिवारिक न्यायालय ने राजेन्द्र कुमार की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी, जिसे अपील में चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता रविंद्र प्रताप यादव का विवाह 1979 में हुआ था। याचीका के मुताबिक शादी के कुछ समय के बाद उसकी पत्नी का व्यवहार बदल गया. उसने पत्नी के रूप में रहने से इंकार कर दिया था। इस दरमियान वो पति से दूर ही रही और आपसी संबध नहीं बने, जबकि दोनों एक ही छत के नीचे रहते थे। कुछ दिन बाद पत्नी मायके भी चली गई हालांकि पति ने उसे घर चलने के लिए कहा तो वह मानी नहीं।1994 में गांव में पंचायत कर 22 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के बाद आपसी तलाक हो गया। पत्नी ने बाद में दूसरी शादी कर ली, जिसके बाद पति ने तलाक देने की अदालत में अर्जी दी, लेकिन वह अदालत गई ही नहीं। परिवारिक न्यायालय ने पति की तलाक अर्जी को खारिज कर दिया था।

2. ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ फिल्म पर नही लगेगी रोक, राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की याचीका खारिज की

यौन शोषण मामले में दोषी आसाराम को बड़ा झटका लगा है। ‘सिर्फ एक बंदा ही काफी है’ फ़िल्म पर रोक लगाने की मांग वाली आसाराम की याचीका को राजस्थान हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। आसाराम के खिलाफ नाबालिग पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए केस लड़ने वाले दमदार वकील पी सी सोलंकी पर यह फिल्म बनी है।इस फिल्म में एक्टर मनोज बाजपेयी ने वकील पीसी सोलंकी का किरदार निभाया है। दरसअल इस याचिका पर सुनवाई 23 मई को पूरी हो गई थी, लेकिन कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था।

फ़िल्म की रिलीज को लेकर आसाराम की और से अधिवक्ता एसपी शर्मा और विपुल सिंघवी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर रिलीज पर रोक लगाने की मांग की थी। मांग की गई थी कि फिल्म को रिलीज न किया जाए, क्योंकि इस फिल्म में आसाराम से किसी भी तरह की इजाज़त नहीं ली गई। उनका कहना है कि आसराम बापू के मामले में अपील हाई कोर्ट में लंबित है।

3. कर्नाटक हाईकोर्ट ने छात्रों के यौन उत्पीड़न के आरोपी शिक्षक को जमानत देने से इनकार किया, कहा “शिक्षक भारत में भगवान हैं”

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अपनी नाबालिग छात्राओं के साथ यौन दुर्व्यवहार और मारपीट के आरोपी एक शिक्षक को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति उमेश एम अडिगा ने कहा कि अपराध प्रकृति में जघन्य है और याचिकाकर्ता ने एक शिक्षक के रूप में समाज में अपनी स्थिति और प्रतिष्ठा के बावजूद नाबालिग बच्चों का कथित रूप से यौन शोषण किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षकों को देश में भगवान माना जाता है, लेकिन याचिकाकर्ता के कारण माता-पिता अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने से हिचकिचाएंगे। उसने अपने सामाजिक कद या स्थिति की परवाह किए बिना चौथी और पांचवीं कक्षाओं में छात्रों का निर्दयता से यौन उत्पीड़न किया है। इस देश में, गुरुओं और शिक्षकों को भगवान के रूप में पूजा जाता है।

दअरसल इसी साल मार्च में, कुछ ग्रामीणों ने याचिकाकर्ता की कथित अवैध गतिविधियों के बारे में मधुगिरी ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) को सूचित किया। कुछ बच्चों द्वारा आरोपी द्वारा यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के बारे में बताए जाने के बाद बीईओ और एक बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) स्कूल गए।

नतीजतन, बीईओ ने एक शिकायत दर्ज की, और पुलिस ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की धारा 8 (यौन उत्पीड़न के लिए दंड) और 12 (यौन उत्पीड़न के लिए सजा) के अनुसार मामला दर्ज किया। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी) ने याचिकाकर्ता की जमानत याचिका खारिज कर दी। उसके बाद उसने उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि स्कूल परिसर में एक छोटी सी दुकान संचालित करने वाले एक ग्रामीण के बारे में चिंता जताने के बाद उसे मामले में गलत तरीके से आरोपी बनाया गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनके खिलाफ पहले कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई थी। उनके मुताबिक, कुछ गांवों ने उससे अपना हिसाब चुकता करने के लिए अपने बच्चों को पुलिस के सामने झूठे बयान देने की हिदायत दी।दूसरी तरफ, राज्य का कहना था कि यह मामला ज़मानत देने के लिए अयोग्य था क्योंकि कई बच्चों के खिलाफ भयानक अपराध किए गए थे।

इसके अलावा, बचे हुए लोग किसी भी तरह से छोटे दुकान के मालिक से संबंधित नहीं थे, जिससे याचिकाकर्ता की कहानी अविश्वसनीय हो गई। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िताओं ने बार-बार कहा था कि याचिकाकर्ता ने उनका यौन उत्पीड़न किया और उन पर हमला किया। न्यायालय के अनुसार, इन बयानों ने आरोपी अपराधों में याचिकाकर्ता की प्रथम दृष्टया संलिप्तता को प्रदर्शित किया। इसने यह भी कहा कि बचे लोगों के पास आरोपियों के खिलाफ झूठे आरोप लगाने का कोई कारण नहीं था क्योंकि उनका छोटे स्टोर के मालिक से कोई लेना-देना नहीं था। नतीजतन, अदालत ने याचिकाकर्ता को जमानत देने से इंकार कर दिया था।

4. अपात्रों-मृतकों को बांट दी पेंशन, हरियाणा-पंजाब हाईकोर्ट ने दे दिए CBI से जांच कराने के आदेश, 12 साल से लटका था मामला*

हरियाणा में अपात्र, मृतकों व अस्तित्वहीन लोगों को पेंशन बांटने के मामले में साल 2011 की रिपोर्ट के बावजूद अभी तक कोई कार्रवाई न होने पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने सरकार के लचर रवैये को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी है। हाई कोर्ट ने कहा कि दोषी कोई भी हो किसी को किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जाएगा।
आरटीआई कार्यकर्ता राकेश बैंस की ओर से वकील प्रदीप रापड़िया हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर हाईकोर्ट को पेंशन वितरण घोटाले की जाँच की माँग की थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि कैग रिपोर्ट के अनुसार पेंशन वितरण में बड़ा घोटाला हुआ। याचिकाकर्ता ने यह हरियाणा एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) पर संदेह जताते हुए इस पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई से करवाए जाने की माँग की थी।

इस मामले में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने अदालत को बताया कि अपात्रों से 45,17,223 रुपये की वसूली की जा चुकी है तथा 6722 लोगों से 7,57,57,085 रुपये की वसूली लंबित है। राज्य के विभिन्न जिलों के समाज कल्याण अधिकारी (DSWO) के रूप में कार्यरत सात जिला स्तरीय अधिकारियों समेत नौ के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है।
हरियाणा एसीबी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने बताया कि प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों से पेंशन घोटाले के मामले में दर्ज एफआईआर की जानकारी मांगी गई थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश भर में 10 मुक़दमे दर्ज की गई हैं। हाईकोर्ट ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि पिछले एक दशक से अधिक समय से यह मामला संज्ञान में होने के बावजूद केवल 10एफआईआर दर्ज की गई हैं, जो यह दर्शाता है कि अधिकारी इस मामले की जांच में कितना गंभीर हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया गया कि पिछले पांच साल से इस मामले की जांच से जुड़ी फाइल को छेड़ा भी नहीं गया है। कोर्ट के सख्त रवैये के बाद ही कुछ हलचल हुई है। कोर्ट को यह भी बताया गया कि कुछ अधिकारियों व कर्मचारियों को सेवानिवृत्त हुए चार साल से ज्यादा समय हो चुके हैं, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कोर्ट ने सवाल किया कि ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ समय से कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

5. गर्मी की छुट्टियों में सीबीएसई क्लासेस पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक, कहा बच्चों को टीवी देखने दें, नाचने दें और पसंदीदा खाना खाने दें।

केरल हाईकोर्ट से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को झटका लगा है। हाई कोर्ट सीबीएससी के स्कूलों को 14 साल से ज्यादा आयु के बच्चों के लिए वेकेशन क्लासेस (गर्मियों की छुटियों में पढ़ाना) संचालित करने की अनुमति देने वाले अंतरिम आदेश को बढ़ाने से इनकार किया है। कोर्ट ने कहा, एक व्यस्त शैक्षणिक साल के बाद छात्रों को एक ब्रेक की जरूरत होती है, इसीलिए छात्रों को गर्मी की छुट्टी दी जाती है। छात्रों को छुट्टियों का आनंद लेना चाहिए और अगले शैक्षणिक वर्ष के लिए तैयार करना चाहिए।

हाई कोर्ट ने यह भी कि बच्चों को अपने परिवार और दोस्तों के साथ खाली समय का आनंद लेने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा छात्रों को अपने परिजनों के साथ समय बिताने और मानसिक आराम के लिए समर वेकेशन जरुरी है। केवल स्कूली किताबों पर ध्यान देना ही बच्चों के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी में यह भी कहा किबच्चों को गाने दें, उन्हें नाचने दें, उन्हें उनका पसंदीदा खाना खाने दें, उन्हें उनके पसंदीदा टीवी प्रोग्राम का आनंद लेने दें, उन्हें क्रिकेट, फुटबॉल या पसंदीदा खेल खेलने दें और उन्हें अपने रिश्तेदारों के साथ सफ़र का आनंद लेने दें।

न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीवी कुन्हीकृष्णन ने कहा, एक व्यस्त शैक्षणिक साल आ रहा है। उससे पहले छात्रों के लिए एक ब्रेक जरूरी है। 10वीं क्लास और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के छात्रों को निश्चित रूप से अपने जीवन में अपने निर्णायक शैक्षणिक वर्ष में प्रवेश करने से पहले एक ब्रेक की बेहद जरूरत होती है।

दरसअल हाई कोर्ट ने सीबीएसई स्कूलों में वेकेशन क्लासेस करने की अनुमति देने के लिए सीबीएसई के क्षेत्रीय निदेशक को अंतरिम निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर यह आदेश पारित किया गया। राज्य के सामान्य शिक्षा निदेशक (डीजीई) ने वेकेशन क्लासेस पर आपत्ति जताते हुए एक सर्कुलर जारी किया और इसके खिलाफ सीबीएसई स्कूल प्रबंधन संघ ने सर्कुलर के खिलाफ कोर्ट का रुख किया।

6. हरियाणा के फतेहाबाद जिला अदालत में जजों की कमी से वादकार परेशान, वकीलों ने शुरू कर दी अनिश्चित हड़ताल*

हरियाणा के फतेहाबाद में जिले की अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की कमी के खिलाफ शुक्रवार से जिला बार एसोसिएशन से जुड़े सभी वकील अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। वकीलों ने जिला अदालत के आगे अपनी मांगों को लेकर धरना भी दिया। धरने का नेतृत्व बार एसोसिएशन के प्रधान नरेश सोनी ने किया। वकीलों के हड़ताल पर जाने से अदालतों का कामकाज ठप रहा और वादियों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। जिन लोगों के केस पेडिंग थे या जिनकी तारीखें थी, उनको वापस जाना पड़ा।

जिला बार एसोसिएशन के प्रधान नरेश सोनी ने बताया कि लंबे समय से फतेहाबाद में जजों की कमी होने की वजह से मुकदमों की नियमित रूप से सुनवाई प्रभावित हो रही है। इससे वकीलों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई केस लंबे खींचे चले आ रहे हैं, क्योंकि अदालत में पर्याप्त जज नहीं हैं। जिस कारण उनके मुवक्किलों को भारी दिक्कतें होती हैं।

जजों की कमी से केस की तारीख़ें लगती रहती है और केस लंबा चलने से मुवक्किल वकीलों से सवाल जवाब करते रहते हैं और लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल रहा है। जजों की कमी की मांग को लेकर बार एसोसिएशन का एक प्रतिनिधिमंडल फतेहाबाद सेशन डिविजन के निरीक्षक जज सहित अन्य जस्टिस से मुलाकात कर चुका है। इससे पहले फतेहाबाद बार में आए तत्कालीन निरीक्षक जज जस्टिस सुवीर सहगल से भी जजों की कमी पूरी करने की मांग की गई थी, लेकिन आज तक उनकी मांगों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

बार अध्यक्ष ने बताया कि निर्णय लिया गया है कि जो भी वकील बार के इस फैसले का उल्लंघन करेगा उसको 2100 रुपये का अर्थदंड लगाया जाएगा। वकील की सदस्यता खत्म करने का कड़ा फैसला भी लिया जा सकता है।

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