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क्या अब हमारा मूत्र ही बचाएगा दुनिया को

दुनियाभर के कई देशों में मानव मूत्र से खाद बनाने के प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। उसमें भारत भी शामिल है। दुनियाभर के कई देशों में मानव मूत्र से खाद बनाने के प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। उसमें भारत भी शामिल है। अगर फ्रांस में हुए एक बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट की मानें तो आने वाले समय पूरी दुनिया में कृषि सेक्टर का खाद सिस्टम हमारे मूत्र पर आधारित होगा। टायलेट्स बदल जाएंगे।

टायलेट्स से निकली हमारी यूरिन सीधे टैंक के जरिए फैक्ट्रियों में पहुंचेगी और वहां इससे आर्गनिक खाद तैयार हो सकेगी, जो हम सबको जीवनदान देगी। कुछ साल पहले केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि मूत्र फटीर्लाइजर के तौर पर बहुत शानदार काम कर सकती है। तब उनकी इस बात काफी प्रतिक्रियाएं हुईं थीं। अब फ्रांस की आला रिसर्च कह रही है कि अगर दुनिया की कृषि यानि हमारे खाने को कोई बचा सकता है तो वो हमारी पेशाब यानि मूत्र ही होगी।

फ्रांस में एक रिसर्च का ये नतीजा निकला है कि मानव मूत्र में पौधों को जीवन और पोषण देने की ताकत है ताकि आने वाले समय में हमारे जीवन को दूषित करते हुए औद्योगिक कृषि से किनारा किया जा सके, जिसमें कृत्रिम खाद शामिल है। रिसर्च ने बहुत विस्तार से बात की है कि इसको कैसे अमल में लाया जाता है।

ये भी बताया गया है कि मानव मूत्र को अगर खाद में बदला जाए तो ये ना केवल आर्गनिक खाद का काम करेगा बल्कि कृषि पैदावार में इस्तेमाल होने वाले केमिकल के साथ पर्यावरण प्रदूषण को रोका जा सकेगा। फ्रांस की प्रमुख वेबसाइट फ्रांस24 ने विस्तार से रिपोर्ट दी है। पौधों को जिन पोषक तत्वों की जरूरत होती है- उसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम होते हैं। जब हम खाना खाते हैं तो हमारे भोजन के जरिए ये तीनों चीजें हमारे पेट में पहुंचती हैं। फिर हम इनका ज्यादा हिस्सा मूत्र के जरिए बाहर निकालते हैं।

पौधों को जिन पोषक तत्वों की जरूरत होती है- उसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम होते हैं।रिसर्च करने वाली टीम के अगुवा इंजीनियर फेबियन एस्कुलियर फ्रांस में ओसीएपीआई रिसर्च प्रोग्राम चलाते हैं। जो फूड सिस्टम और मानवीय अपशिष्ट प्रबंधन यानि ह्यूमन वेस्ट मैनेजमेंट के क्षेत्र में काम करता है।

सिंथेटिक नाइट्रोजन से क्या नुकसान है

फैक्ट्री में बनने वाली खाद में सिंथेटिक नाइट्रोजन से बनी होती है और इसके जरिए लंबे समय खेतों में कृषि को पोषण दिया जा रहा है ताकि उत्पादन बेहतर हो और मानव आबादी का पेट भरा जा सके। लेकिन लंबे समय से इनकी बड़ी मात्रा में इस्तेमाल से इनका असर नदियों और दूसरी जल संरचनाओं हानिकारक तौर पर हो रहा है। नदियों और जल में रहने वाले जंतुओं का जीवन खतरे में पड़ रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, कृषि अमोनिया का उत्सर्जन जब वाहनों के धुएं के साथ मिलता है तो घातक वायु प्रदूषण को जन्म देता है। यूं भी रासायनिक खाद ग्रीनहाउस गैसों जैसे नाइट्रस आक्साइड का उत्सर्जन करके क्लायमेट चेंज को बढ़ा रहा है। ये प्रदूषण केवल खेतों से भी आ रहा है।

तो यूरिन को ट्रीट करना होगा

आधुनिक दौर में सेनिटेशन के तौरतरीके भी न्यूट्रेंट प्रदूषण के वाहक बन रहे हैं. इस्तेमाल हो चुके पानी में जो 80 फीसदी नाइट्रोजन और आधी से ज्यादा फास्फोरस मिल रही है, उसके लिए मानव मूत्र ही ज्यादा जिम्मेदार है. अगर इससे और रासायनिक खाद से छुटकारा पाना है तो यूरिन को ट्रीट करना होगा।

क्या अब मानव मूत्र ही बचाएगा

सवाल है कि क्या मानव मूत्र कृषि को ज्यादा लंबे समय टिकाऊ रहने लायक बनाएगा। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े साइंटिस्ट मानते हैं, चूंकि सिंथेटिक नाइट्रोजन का उत्पादन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में खास भूमिका अदा करता है और फास्फोरस की मौजूदगी सीमित और गैर नवीकृत है इसलिए मानव मूत्र लंबे समय के लिए कृषि पैदावार के लिए संकटमोचक का काम कर सकता है।

सिंथेटिक नाइट्रोजन का उत्पादन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में खास भूमिका अदा करता है और फास्फोरस की मौजूदगी सीमित और गैर नवीकृत है, इसलिए मानव मूत्र एग्रीकल्चर सेक्टर में खाद के तौर पर खास भूमिका निभा सकता है।

वर्ष 2020 में संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिसर्च में भी ये कहा गया था कि पूरी दुनिया में जो वेस्टवाटर है वो वैश्विक तौर पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम की 13 फीसदी कृषि जरूरत को पूरा कर सकती है. इस मामले में माना जा रहा है कि मूत्र को खाद में बदलना ज्यादा आसान और बेहतर साबित हो सकता है।

भारत समेत कई देशों में चल रहे हैं पायलट प्रोजेक्ट्स

हालांकि ये बात सही है कि अगर इसे करना है तो टायलेट और सीवेज सिस्टम के बारे में फिर से सोचने की जरूरत होगी। वैसे इस बात को लेकर एक पायलट प्रोजेक्ट स्वीडन में 1990 के दशक के शुरू से चल रहा है। इसके लिए कुछ इको-विलेज का चयन भी किया गया है। अब ऐसे ही प्रोजेक्ट्स स्विट्जरलैंड, जर्मनी, अमेरिका, साउथ अफ्रीका, इथोपिया, भारत, मैक्सिको और फ्रांस में चल रहे हैं।

इसमें कुछ समस्याएं भी हैं, जिसे तकनीक स्तर से लेकर डिजाइन स्तर तक सुलझाने में कुछ स्विस कंपनियां लगी हुई हैं। 1990 में स्वीडन ने पेशाब अलग करने के प्रोजेक्ट को शुरू किया था। इसके वहां स्पेशल टॉयटेल और टैंक बनाए गए थे। वहां लोगों के घरों में ऐसे टैंक्स लगाने की योजना चली थी, जिसमें मूत्र अलग से इकट्ठा हो।

इस मामले पर विश्व में कई बार चर्चा पहले भी हो चुकी है। स्वीडन में साल 2006 में यूरीन डायवर्जन: वन स्टेप टूवर्ड्स सस्टेनबल सैनिटेशन विषय पर काफी काम हुआ. एक आंकड़े के अनुसार स्वीडन में साल 2006 तक करीब 10,000 खास किस्म ऐसे टॉयलटेल घरों में लगा दिए थे जिसमें यूरीन को अलग से स्टोर किया जा सके।

क्या दावा किया था गडकरी ने

केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने वर्ष 2019 में कहा था कि अगर भारत के लोग अपना मूत्र इकट्ठा करने लगें तो भारत की यूरिया की परेशानी को खत्म किया जा सकता है. उनके अनुसार अगर देशवासियों ने अपने मूत्र की अहमियतता को लेकर जागरुकता फैल गई तो हमें दूसरे देशों से यूरिया आयात नहीं करनी पड़ेगी।

केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने वर्ष 2019 में कहा था कि अगर भारत के लोग अपना मूत्र इकट्ठा करने लगें तो भारत की यूरिया की परेशानी को खत्म किया जा सकता है उन्होंने इससे पहले भी साल 2015 और 2017 में ऐसे दावे किए हैं कि उन्होंने अपने दिल्ली के बंगले में 50 लीटर मूत्र इकट्ठा करने का प्लांट बना रखा है। इसका इस्तेमाल कई पौधों व फूल पत्तियों को सींचने में किया जाता है। उन्होंने एक प्रयोग का रिजल्ट भी बताया था कि मूत्र से सींचे जाने वाले पौधों का विकास साधारण पानी की सिंचाई से कहीं अधिक हुआ।

मूत्रपान भी करते हैं लोग

दुनियाभर में बहुत सी शख्सियत मूत्रपान करती हैं और इससे खुद को निरोग रखने का दावा भी करती हैं। इसे स्वमूत्र चिकित्सा या स्वाम्बु चिकित्सा कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि पेशाब में इलाज करने की क्षमता होती है. इसके कई उदाहरण भी मौजूद हैं. रावजी भाई पटेल की एक किताब में यूरीन थेरेपी का जिक्र मिलता है।

पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजीभाई देसाई अमेरिकी पत्रकार डैन रैथर से अपने मूत्र पीने और इससे होने वाले फायदे पर 1 घंटे का लंबा इंटरव्यू दिया था। इसमें उन्होंने बताया था कि अपना मूत्र पीने वालों से बीमारियां चार कदम दूर रहती हैं। उन्होंने तब देश के गरीबों के बारे में कहा था कि जो लोग महंगी दवाइयों का खर्च नहीं उठा सकते, उनके लिए मूत्र पीना बेहतर विकल्प हो सकता है। उन्होंने मूत्र से आंख धोने वालों को कभी मोतियाबिंद ना होने का भी दावा किया था।

इसके अलावा मशहूर अमेरिकी गायिका मैडोना भी अपने पैरों पर पेशाब करने के लिए जानी जाती हैं। उनका मानना था कि ऐसा करने से उन्हें कभी स्किन की समस्याएं कम होती थीं। इसी तरह अभिनेत्री सराह माइली, बेसबॉल खिलाड़ी माओइस रोजास अलाऊ, मार्शल आर्ट करने वाले ल्योटो मचीडा और मशहूर अमेरिकी गायक जेडी सालिंगर भी अपने पेशाब के इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं।

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