For the first time in the history of democracy, government came to the minority: लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार कोई सरकार अल्पमत में आई

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अंबाला। इंदिरा गांधी के रूप में भारत को पहली और एक मात्र महिला प्रधानमंत्री भारत को मिली। पंडित नेहरू के बाद कांग्रेस की विरासत संभालने की जिम्मेदारी इंदिरा के कंधे पर थी। पर इंदिरा गांधी की हठधर्मिता के कारण कांग्रेस में बगावती सुर कई बार सामने आए। हालांकि इस बगावत को हमेशा दबा दिया गया। वैसे तो इंदिरा की हठधर्मिता के कई किस्से रहे हैं, लेकिन सबसे अधिक चर्चा 1969 के राष्टÑपति चुनाव की रही है। कल आपने पढ़ा था कि कैसे इंदिरा गांधी ने अपने पसंद का राष्टÑपति बनवाने के लिए कांग्रेस की नीतियों तक से समझौता कर लिया था। कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में जिस नाम पर मोहर लगी थी उसे हराने के लिए इंदिरा ने विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन दे दिया था।

इंदिरा गांधी की इस राजनीतिक हठधर्मिता के कारण कांग्रेस स्पष्ट रूप से दो भागों में विभाजित हो चुकी थी। 1967 में सरकार बनने के बाद कांग्रेस के हालात इतने खराब हो गए थे कि किसी को पता नहीं होता था कि कौन इंदिरा के साथ है कौन उनके विरोध में। हालांकि कई नेता घोषित रूप से इंदिरा के समर्थन में थे। पर कई पुराने दिग्गज कांग्रेसियों को इंदिरा की हठधर्मिता किसी रूप से स्वीकार नहीं थी।
इंदिरा गांधी के कारण कई पुराने कांग्रेसी ने अपनी अलग राह बना ली थी। कई दूसरी राह पकड़ने की तैयारी कर चुके थे। इसका सबसे अधिक असर सरकार की कार्यप्रणाली पर पड़ा।
बुजर्ग कांग्रेसी दिग्गजों ने कांग्रेस (संगठन) नाम से अलग पार्टी बना ली। इंदिरा गांधी के लिए यह बेहद मुश्किलों भरा दौर था।
भारतीय लोकतंत्र में यह पहली बार था कि कोई पूर्ण बहुमत की सरकार अल्पमत में आ गई। इंदिरा गांधी के तमाम प्रयासों के बावजूद कोई सार्थक रिजल्ट सामने नहीं आ सका। कांग्रेसी मानने को तैयार नहीं हुए।
सरकार के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव आ गया। सभी एकजूट होकर इंदिरा गांधी की सरकार गिराने की तैयारी कर चुके थे।
पर इंदिरा गांधी अपने प्रयासों से फौरी तौर पर कम्युनिस्टों को रिझाने में कामयाब रहीं। लोकसभा में कम्यूनिस्ट नेताओं के समर्थन से वे अपनी सरकार के खिलाफ लोकसभा में आए अविश्वास प्रस्ताव को नाकाम करने में सफल हो गर्इं।

समय से पहले चुनाव की घोषणा

सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान इंदिरा गांधी समझ चुकी थीं कि पर्याप्त बहुमत के वो अधिक दिन तक अपनी सरकार नहीं चला सकती थीं। कम्यूनिस्टों ने फौरी तौर पर उन्हें समर्थन तो दे दिया था, लेकिन इंदिरा को पता था कि उनकी राजनीति और कांग्रेस की राजनीति में जमीन आसमान का अंतर है। ऐसे में वे अपने मुताबिक सरकार नहीं चला सकती हैं। लिहाजा उन्होंने बिना वक्त गंवाए नया जनादेश लेने यानी निर्धारित समय से पहले ही चुनाव कराने का फैसला कर लिया। दिसंबर, 1970 में उन्होंने लोकसभा को भंग करने का एलान कर दिया। इस प्रकार जो पांचवीं लोकसभा के लिए चुनाव 1972 में होना था, वह एक साल पहले यानी 1971 में ही हो गया।

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