Home खेल क्रिकेट Delhi’s acumen dreams to do well in Tokyo Olympics: दिल्ली के कुशाग्र का सपना है टोक्यो ओलिम्पिक में अच्छा प्रदर्शन करना

Delhi’s acumen dreams to do well in Tokyo Olympics: दिल्ली के कुशाग्र का सपना है टोक्यो ओलिम्पिक में अच्छा प्रदर्शन करना

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दिल्ली के कुशाग्र रावत ने इस साल मार्च में टोक्यो ओलिम्पिक के लिए क्वॉलिफाइंग इवेंट्स में बी स्तर को पार किया है, तब से उन पर देश की नज़रे लगी हुई हैं लेकिन उसके बाद से कोविड-19 ने उनकी तैयारियों पर एक तरह से ग्रहण लगाया हुआ है। 20 साल के कुशाग्र को उम्मीद है कि उनका टोक्यो ओलिम्पिक में भाग लेने और वहां अच्छा प्रदर्शन करने का सपना ज़रूर साकार होगा।

कुशाग्र को सुबह-शाम राजपथ पर दौड़ते हुए देखा जा सकता है। वह घर की छत पर लम्बा वर्कआउट करते हैं। एसआरसीसी कॉलेज के कुशाग्र राजधानी की ग्लेनमार्क स्विमिंग एकेडमी में अभ्यास करते हैं। उनकी दिली इच्छा है कि अन्य देशों की तरह एहतियात बरतते हुए भारत में भी स्विमिंग पूल शुरू किए जाने चाहिए। उनका कहना है कि लॉकडाउन में उन्हें अपने पिता से अपनी फिटनेस को बनाए रखने में काफी मदद मिली जो एक समय स्टेट बैंक के लिए फुटबॉल खेला करते थे।

कुशाग्र कहते हैं कि 13 साल पहले उन्होंने अपने स्विमिंग करियर की शुरुआत की। सेंट ज़ेवियर के एसके शर्मा उनके पहले कोच थे। शुरुआती दिनों में कई दिक्कतें भी आईं लेकिन चार साल पहले श्रीलंका में सार्क तैराकी में चुना जाना और वहां दो गोल्ड जीतना उनके यादगार अनुभव रहे। कुशाग्र कहते हैं कि जब उन्होंने इस चैम्पियनशिप और उससे अगले साल ताशकंत (उज्बेकिस्तान) में एशियाई एज ग्रुप तैराकी में मेडल जीते तो ये क्षण उनके लिए हमेशा यादगार रहेंगे। इसके अलावा उन्होंने मलयेशियाई एज ग्रुप तैराकी में दो गोल्ड और एक सिल्वर और 2017 की एशियाई एज ग्रुप तैराकी  में एक गोल्ड, दो सिल्वर और एक ब्रॉन्ज़ हासिल किए। दसवें एशियाई एज ग्रुप तैराकी में पांच गोल्ड जीतकर प्रतियोगिता का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने जाने से भी यह अहसास हुआ कि उनकी तैयारियां सही दिशा में चल रहीहैं। पिछले साल काठमांडू में कुशाग्र साउथ एशियन गेम्स में एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ तैराक बने। टोक्यो की तीन क्वॉलिफाइंग प्रतियोगिताओं में खरा उतरना भी उनकी बड़ी उपलब्धि रही। इन सबका श्रेय कुशाग्र अपने कोचों को देते हैं।

कुशाग्र कहते हैं कि सात साल के बच्चों को आगे की ट्रेनिंग के लिए चुनना जाना चाहिए। कोचों को नवीनतम तकनीकों के साथ उन्हें ट्रेनिंग देनी चाहिए। इस सबके लिए कोचों के लिए कैम्प भी नियमित होने चाहिए। मुझे खुशी है कि सरकार खेलो इंडिया और स्कॉलरशिप के ज़रिए खेलों को बढ़ावा दे रही है। मैं तैराकों को यही कहूंगा कि खुद पर भरोसा रखें।

मीनाक्षी पाहूजा

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के एलएसआर कॉलेज में सहायक प्रोफेसर हैं और जानी मानी तैराक हैं)

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