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क्या होता है थैलेसीमिया और भारत में क्यों बढ़ रहे हैं इस बीमारी के मामले

आज के इस दौर में लोग खून से जुड़ी कई तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं। थैलेसीमिया भी खून से संबंधित एक रोग हैं। थैलेसीमिया के अंतर्गत हीमोग्लोबिन बनने की प्रक्रिया बुरी तरह से अव्यवस्थित हो जाती है। जिसकी वजह से रेड ब्लड सेल्स की संख्या कम होने लगती है। थैलेसीमिया से पीड़ित रोगी एनीमिया की चपेट में भी आ सकता है।
भारत में थैलेसीमिया के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं :
माता-पिता की वजह से बच्चों को होता है थैलेसीमिया को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक जन्मजात बीमारी होती है जो किसी रोगी को उसके माता-पिता से मिलती है। कहने का सीधा मतलब ये है कि थैलेसीमिया एक जेनेटिक बीमारी है। जब माता-पिता में माइनर थैलेसीमिया होता है तो उनके बच्चे में मेजर थैलेसीमिया होने के चांस 50 फीसदी तक हो जाते हैं। थैलेसीमिया होने पर बच्चों को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत होती है। नॉर्मल हीमोग्लोबिन 12 से ऊपर होना चाहिए। जिन बच्चों का हीमोग्लोबिन 5-6 से होता है, उन्हें हर महीने खून चढ़ाने की जरूरत पड़ जाती है। जो लोग थैलेसीमिया से पीड़ित होते हैं, उनका इलाज किया जा सकता है।
शादी के बाद जरूर कराना चाहिए थैलेसीमिया का टेस्ट :
थैलेसीमिया का पता लगाने के लिए खून के हीमोग्लोबिन एचपीएलसी का एक टेस्ट किया जाता है। शादी के बाद पति और पत्नी को थैलेसीमिया का टेस्ट जरूर कराना चाहिए ताकि होने वाले बच्चे को इस बीमारी से बचाया जा सके। थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे को बहुत कमजोरी होती है, उसकी सांस फूलने लगती हैं, तिल्ली बढ़ने लगती है और चेहरे पर बदलाव होने लगता है। इन सभी लक्षणों से बीमारी की पहचान की जा सकती है। थैलेसीमिया, एनीमिया का ही एक प्रकार है।

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