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जंकफूड : बीमार हो रहा है समाज

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ललित गर्ग

दुनिया भर में सबसे ज्यादा लोग खानपान की विकृति की वजह से बीमार हो रहे हैं। खानपान की इस विकृति का नाम है जंकफूड और इससे पैदा हुई महामारी का नाम मोटापा है। स्थिति तब और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब हमें पता चलता है कि इनमें चैथाई तो बच्चे हैं। दिल्ली के स्कूली बच्चों के भोजन में सतर प्रतिशत जंक फूड है। और इसी जंक फूड से भारतीय महिलाएं मोटापा एवं अन्य घातक बीमारियों की शिकार हो रही है।

भारत में सबसे बड़ा जंक फूड समोसा, चिप्स और गोलगप्पे हैं जो गली-कूचे से लेकर बड़ी-बड़ी दुकानों में मिलते हैं। सरकार का प्लान चिप्स और समोसे पर जंक फूड की लेबलिंग करने का है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, ऐसे हर खाद्य पदार्थ को जंक फूड का लेबल देगा जिसमें मानक से ज्यादा नमक, शक्कर या चर्बी होती है। इसके अलावा स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों से इनकी पहचान अलग की जाएगी। हमारी दृष्टि में प्राधिकरण की यह अच्छी पहल है ये और ऐसे अन्य प्रभावी कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। जंकफूड के खिलाफ एक सशक्त आन्दोलन खड़ा किया जाना चाहिए।

दिल्ली के स्कूली बच्चों के भोजन में सतर प्रतिशत जंक फूड है। वडा पाव, समोसा, पिज्जा, बर्गर, रोल, चिली, फैंच फ्राइज-ये सब किसे नहीं पसंद? लेकिन इनका हमारे शरीर पर होने वाला घातक परिणाम भी कम नहीं हैं। बच्चों के मामले में तो यह और भी नुकसानदायक इसलिए है कि जंक फूड का ज्यादा इस्तेमाल हमारे दिमाग की क्षमता को कम करता है और अनेक बीमारियों को आमंत्रित करता है। हाल में चूहों पर किए गए रिसर्च से पता चला कि लगातार एक सप्ताह तक फास्ट फूड खाने से उनकी दिमागी क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, किसी व्यक्ति के हर रोज के आहार में ज्यादा से ज्यादा 2-2.5 ग्राम ट्रांसफैट हो सकता है। 30 ग्राम प्राकृतिक चीनी। 20 ग्राम अतिरिक्त चीनी और नमक की मात्रा पांच ग्राम से भी कम। जबकि हमारे देश की स्थिति यह है कि 40 फीसदी से अधिक आबादी रोजाना 10 ग्राम से अधिक नमक का इस्तेमाल अपने भोजन में करती है। नमक के इस्तेमाल से रक्तचाप और अन्य घातक बीमारियांे के खतरे का सीधा संबंध है। विकसित देशों तो इस मामले में जागरूक हो चुके हैं और वे कैंसर, दिल की बीमारियों, डायबीटीज और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों पर रोकथाम के लिए तत्पर हैं। कारण यह है कि इन मामलों में उन देशों की सरकारों की जिम्मेदारी होने के नाते उन्हें तमाम मरीजों के मेडिकल बिलों का भुगतान करना पड़ता है लेकिन हमारे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की क्या हालत है, यह किसी से नहीं छिपा।

पिज्जा बर्गर से तो लोगों को डरा सकते हैं, समोसे, चिप्स, गोलगप्पे से कैसे डराएंगे? क्योंकि अक्सर जिन चीजों पर नियंत्रण किया जाता है, दबाने की कोशिश की जाती है, वे ज्यादा प्रचलन में आते हैं। दरअसल इसके लिए सरकार को एक समग्र खाद्य नीति बनाने की जरूरत है। इसका मतलब यह नहीं कि प्राधिकरण का यह कदम बेकार है। प्राधिकरण का यह कदम उस समग्र खाद्य नीति की तरफ बढ़ाया हुआ पहला कदम भी हो सकता है। स्कूलों में बच्चों तक स्वास्थ्यवर्धक भोजन ही पहुंचे, इसका स्थायी इंतजाम हो।

आधुनिक बीमारियों, दुःख एवं तनाव का बड़ा कारण हमारा खानपान है। कहावत है ‘‘जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन।’’ भोजन तीन प्रकार का होता है- सात्विक, तामसिक और राजसिक। सात्विक भोजन जहां मन को शुद्ध करता है, वहां तामसिक और राजसिक भोजन मन में एक प्रकार की उत्तेजना पैदा करते हैं, जिससे शरीर की ऊर्जा का अपव्यय होता है। इसलिए आहार-शास्त्र में सात्विक भोजन की सिफारिश की गई है और तामसिक तथा राजसिक भोजन से बचने का आग्रह किया गया है। जंकफूड तो तामसिक भोजन ही है और इसे व्यावसायिक हितों के तहत षडयंत्रपूर्वक देश में प्रचलित किया जाता रहा है।

हमारे देश में शुद्ध एवं सात्विक आहार की समृद्ध परम्परा एवं प्रचलन रहा है। लेकिन बाजारवाद एवं विदेशी कम्पनियों ने जंकफूड को महिमामंडित करके जनजीवन में प्रतिष्ठापित किया गया है। जबकि हमारे यहां तो तरह-तरह के तनाव एवं बीमारियों को दूर करने के लिए गीता में शुद्ध आहार की बात कही गयी है। अर्थात् हमें सात्विक भोजन करना चाहिए और पूरी निद्रा लेनी चाहिए। जंकफूड़ मनुष्य की वृत्तियों को उत्तेजित करता है और निद्रा का पूरा न होना मन को बेचैन करता है। भोजन का संयम न हो तो शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता। भोजन में कम खाने एवं सात्विक खाद्य का महत्व है। कहा गया है कि जितने आदमी भूख से मरते हैं, उससे अधिक ज्यादा खाने एव विकृत खानपान से मरते हैं। आहार का संतुलित एवं संयमित होना जरूरी है।

वडा पाव, समोशा, पिज्जा,बर्गर, रोल, चैमिन,चिली, फैंच फ्राइ और कोलड्रिंक आदि ने लोगों के शुद्ध एवं स्वास्थ्यवर्द्धक खानपान पर कब्जा कर लिया है। आज लोग पौष्टिक आहार को कम फास्ट फूड या जंक फूड को ज्यादा तवज्जों देने लगे हैं। लेकिन इस जंक फूड से हमारी जिंदगी को कितना नुकसान पहुंच रहा है आपको अंदाजा नहीं है।

जंक फूड का सेवन इतना नुकसानदेह है कि निरंतर इसके सेवन से शरीर शिथिल होता है, खुद को थका हुआ महसूस करते हैं। आवश्यक पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट की कमी की वजह से फास्ट फूड ऊर्जा के स्तर को कम कर देता है। जंक फूड का लगातार सेवन टीनेजर्स में डिप्रेशन का कारण बनता है। बढती उम्र में बच्चों में कई तरह के बायोलॉजिकल बदलाव आने लगते हैं। जंक फूड जैसे चाऊमिन, पिज्जां, बर्गर, रोल खाना बढ़ते बच्चों के लिए एक समस्या बन रहा है और वे डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। मैदे और तेल से बने ये जंक फूड पाचन क्रिया को भी प्रभावित करते हैं। इससे कब्ज की समस्या उत्पन्न होती है। इन खानों में फाइबर्स की कमी होने की वजह से भी ये खाद्य पदार्थ पचने में दिक्कत करते हैं। ज्यादा से ज्यादा फास्ट फूड का सेवन करने वाले लोगों में 80 फीसदी दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस तरह के आहार में ज्यादा फैट होता है जो कोलेस्ट्रॉल के उच्च स्तर में भी योगदान देता है। वसा से भरपूर खाद्य पदार्थ हृदय, रक्त वाहिकाओं, जिगर जैसे कई बीमारियों का कारण हैं। कैफीन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे कॉफी, चाय, कोला और चॉकलेट, सफेद आटा, नमक-ये कुछ ऐसी चीजें है जो तनाव को बढ़ाने में मदद करती है।

बीमारियों पर नियंत्रण के लिए आवश्यक है कि हमारी इन्द्रियां हमारे काबू में रहें, जिह्वा पर नियंत्रण रहे, मन स्थिर हो, खानपान शुद्ध एवं सात्विक हो और बुद्धि निर्मल हो। तभी हमारे सारे क्लेश, बीमारियां दूर हो सकती हैं और हम स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

एक बार आचार्य विनोबा भावे से किसी ने प्रश्न किया, ‘‘मैं बढ़िया मुद्रण करना चाहता हूं। उसके लिए क्या करूं?’’ विनोबा जी ने उत्तर दिया, ‘‘लौकी की सब्जी खाओ और गाय का दूध पीओ।’’ यह उत्तर सुनकर आदमी बड़ी हैरानी में पड़ा। उसने सोचा कि विनोबाजी ने प्रश्न को ठीक से सुना नहीं। उसने अपने प्रश्न को दोहरा कर कहा कि मुझे इसका जवाब दीजिए। विनोबा जी ने कहा, ‘‘मैंने इसी प्रश्न का ही तो जवाब दिया है। लौकी की सब्जी खाओगे तो पेट साफ रहेगा। गाय का दूध पीओगे तो बुद्धि निर्मल होगी। यदि पेट साफ है, और बुद्धि निर्मल है तो जो भी काम करोगे, वह अच्छा होगा।’’

शरीर और मन का संयम बुद्धि को भी संयमित कर देता है। मन काबू में आ जाता है तो बुद्धि स्वतः ही हमारे वश में हो जाती है। उसे तब भले-बुरे के बीच भटकना नहीं पड़ता। निर्मल बुद्धि की आंखों पर से चश्मा उतर जाता है। उसे अच्छा-ही-अच्छा दिखाई देता है। उसके स्पंदनों का प्रभाव सारे वातावरण पर पड़ता है। जिस प्रकार किसी देवालय के भीतर का वातावरण पावन-पवित्र होता है, उसी प्रकार निर्मल बुद्धि से व्यक्ति के चारों ओर पवित्रता फैल जाती है। जिसके फलस्वरूप जीवन बीमारियों से मुक्त होकर स्वस्थता से ओतप्रोत हो जाता है।

आज हम भोगवादी सभ्यता में जी रहे हैं। हमारा तन नाना प्रकार की सुविधाएं चाहता है। धन चाहता है, वैभव की आकांक्षा करता है और क्षणिक सुख के पीछे दौड़ता है। इसी तरह मन भी बेकाबू होकर छलांग लगाता है, भांति-भांति की चीजों की ओर ललचाता है। जहां तक बुद्धि का संबंध है, उसका दायरा बहुत सिमट गया है, सिकुड़ गया है। वह असार को देखती है और सार को गौण मान लेती है। निरोगी जीवन के लिए आवश्यक है कि हमारी इन्द्रियां हमारे काबू में रहें, मन स्थिर हो और बुद्धि निर्मल हो। तभी हमारे सारी बीमारियां दूर हो सकती हैं और हम स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

हर मनुष्य स्वस्थ जीवन की आकांक्षा रखता है। लेकिन विडम्बना है कि लालसा सुख की और जीवन की दिशाएं दुख की, सबसे ज्यादा जिह्वा की लालसा ने भी अनेक बीमारियों का सृजन किया है। इसका कारण बुद्धि भी है, उसका दायरा बहुत सिमट गया है, सिकुड़ गया है। वह असार को देखती है और सार को गौण मान लेती है। जब बुद्धि पर स्वार्थ का चश्मा चढ़ जाता है तो यही स्थिति बन जाती है, वह असलियत को नहीं देख पाती। ऐसी बुद्धि सुख का नहीं, दुख का कारण बनती है, बीमारियों का कारण बनती है। जरूरत जीवन पर मंडरा रहे इस खतरे से सावधान होने की है।

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