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नई दिल्ली: फ्लेक्सी-फ्यूल इंजन वाली गाड़ियों से 40% तक कम हो सकते हैं तेल के दाम

आज समाज डिजिटल, नई दिल्ली:
सोसाइटी आफ इंडियन आटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स और आटोमोबाइल कंपनियों के सीईओ से केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने फ्लेक्सी-फ्यूल इंजन मैन्युफैक्चर करने के लिए कहा है। हाल ही में केंद्र ने एथेनॉल को स्टैंडअलोन फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति भी दी है। फिलहाल भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा क्रूड आयल इम्पोर्ट करता है। एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से भारत की क्रूड आयल पर निर्भरता कम होगी और इम्पोर्ट में भी कमी आएगी। देश का पैसा देश में ही रहेगा। भारत सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 2030 तक पेट्रोल में एथेनॉल कंसंट्रेशन को बढ़ाकर 20% और डीजल में बायोडीजल के कंसंट्रेशन को बढ़ाकर 5% तक करना है। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी ये बड़ा कदम है।

फ्लेक्सी-फ्यूल व्हीकल्स होते क्या हैं?

आखिर फ्लेक्सी-फ्यूल व्हीकल्स होते क्या हैं? इसको लेकर आपके दिमाग में विचार आते होंगे। हम आपको बताते हैं कि ये दूसरों से कैसे अलग हैं और इससे भविष्य कैसे सुधर सकता है?
आपको बता दें कि अभी हम अपनी गाड़ियों में जो पेट्रोल यूज करते हैं उसमें 8.5% तक एथेनॉल मिला होता है। एथेनॉल एक तरह का यानी बायो फ्यूल है। पर फ्लेक्सी-फ्यूल इंजन में यह विकल्प होगा कि आप पेट्रोल और एथेनॉल दोनों को अलग-अलग अनुपात में इस्तेमाल कर सकें। इसके लिए आप 50% पेट्रोल और 50% एथेनॉल का उपयोग कर सकेंगे। ऐसी तकनीक तैयार हो रही है जिससे गाड़ी का इंजन खुद-ब-खुद फ्यूल में मौजूद अलग-अलग ईंधन का कंसंट्रेशन पता कर इग्निशन को एडजस्ट कर लेगा। ठीक वैसे ही जैसे सीएनजी के केस में होता है।

जानिए एथेनॉल क्या है?

असलीयत में एथेनॉल अल्कोहल बेस्ड फ्यूल है। एथेनॉल एक बायो-फ्यूल है। आपको बता दें कि इसे अलग-अलग मात्रा में पेट्रोल के साथ मिलाकर वाहनों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। ये सस्ता भी होता है और इससे पेट्रोल-डीजल के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है। इसे स्टार्च और शुगर के फर्मेंटेशन से बनाया जाता है। इसे बनाने में आमतौर पर गन्ना, मक्का और बाकी शर्करा वाले पौधों का इस्तेमाल किया जाता है।

बायो-फ्यूल के क्या फायदे हैं?

नितिन गडकरी ने हाल ही में बताया था कि बायो-फ्यूल की कीमत 60-62 रुपए प्रति लीटर होगी, जबकि पेट्रोल की कीमत 100 रुपए प्रति लीटर से ऊपर पहुंच चुका है। केंद्र का यह मानना है कि इसके इस्तेमाल से पेट्रोल के दाम 40% तक घट सकते हैं। यह पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है क्योंकि एथेनॉल के इस्तेमाल से कार्बन मोनोआॅक्साइड का उत्सर्जन 35 फीसदी तक कम होता है। साथ ही सल्फर डाईआक्साइड का उत्सर्जन भी कम होता है।

क्या नुकसान है इसका?

पेट्रोल-डीजल के मुकाबले एथेनॉल की फ्यूल एफिशिएंसी कम होती है। अगर आप अपने वाहन में 70% एथेनॉल का इस्तेमाल करेंगे, तो गाड़ी का माइलेज कम हो जाएगा। इससे रनिंग कॉस्ट में बढ़ोतरी हो सकती है। फ्यूल सिस्टम में बदलाव करने के कारण गाड़ियां महंगी होंगी। आटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे फोर-व्हीलर की कीमत 17 से 30 हजार रुपए तक बढ़ सकती है। वहीं, टू-व्हीलर व्हीकल की कीमतों में 5 से 12 हजार रुपए तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

फ्लेक्सी-फ्यूल का इस्तेमाल किन देशों में हो रहा है?

ब्राजील में फ्लेक्सी-फ्यूल इंजन की गाड़ियां सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जा रही हैं। वर्षों पहले से ही ब्राजील फ्लेक्सी-फ्यूल इंजन वाली गाड़ियों को प्रमोट कर रहा है। ब्राजील में 70% से भी ज्यादा कारों में फ्लेक्सी-फ्यूल का इस्तेमाल किया जा रहा है। यूरोप के 18 से भी ज्यादा देशों में फ्लेक्सी-फ्यूल व्हीकल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही कनाडा, अमेरिका और चीन भी फ्लेक्सी-फ्यूल के उत्पादन में प्रमुख देशों में शामिल हैं।

फ्लेक्सी फ्यूल इंजन वाली गाड़ियां भारत में कब उपलब्ध होंगी?

अभी तक भारत में सिर्फ ट्रायल के लिए ही कंपनियों ने फ्लेक्सी-फ्यूल इंजन वाले वाहन पेश किए हैं। टीवीएस ने 2019 में अपाचे का फ्लेक्सी-फ्यूल बेस्ड मॉडल पेश किया था। यह अभी तक शोरूम में उपलब्ध नहीं हो सका।

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