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पंजाब के बाद उत्तराखंड कांग्रेस में भी संकट

हरीश रावत को चेहरा बनाने को लेकर है दुविधा
अजीत मैंदोला, नई दिल्ली:
कांग्रेस आलाकमान की मुश्किलें कम होने का नाम ही नही ले रही। पंजाब में तो नवजोत सिह सिद्दू ने पूरी पार्टी को परेशानी में डाला हुआ है। अब दूसरे चुनाव वाले राज्य उत्तराखण्ड में भी संकट बढ़ गया। उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा संकट यही है चुनाव के लिये चेहरा किसे बनाया जाए। पुराने नेताओं में एक मात्र पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ही रह गए हैं। वे एक साल से कोशिश में भी लगे है उन्हें चेहरा बनाया जाए।लेकिन उनकी पार्टी आलाकमान ने अभी तक सुनी नही।अब उनके स्वास्थ्य को लेकर आशंका जताई जाने लगी है।कोरोना से ठीक होने के बाद उसके साइड इफेक्ट ने उनके स्वास्थ्य पर असर डाला है। उन्हें एक बार फिर इलाज के लिये एम्स में भर्ती होना पड़ा है। आलाकमान रावत को चेहरा बनाता, लेकिन बीजेपी ने बड़ी दुविधा खड़ी कर दी।

बीजेपी ने चुनाव से पहले दो ऐसे फैसलें कर दिए,जिससे कांग्रेस दुविधा में फंस गई। बीजेपी ने गढ़वाल मंडल की उपेक्षा कर कुमाऊँ मंडल को ज्यादा महत्व दे दिया। पहले मुख्यमंत्री  कुमाऊँ से बनाया फिर केंद्र में  मंत्री भी कुमाऊँ मंडल से ही लिया। जब से उत्तराखंड का गठन हुआ पहली बार गढ़वाल की अनदेखी की गई है। जबकि 70 सीटों वाली उत्तराखण्ड विधानसभा में  सबसे ज्यादा 41 सीट गढ़वाल से आती हैं।बीजेपी ने कांग्रेस को बड़ा मुद्दा तो दे दिया, लेकिन कांग्रेस का संकट यही है कि वह गढ़वाल से नेता कहां से लाये।जितने प्रमुख नेता थे वे सब बीजेपी में चले गए। पूर्व प्रदेश अध्य्क्ष किशोर उपद्याय ओर मौजूदा प्रदेश अध्य्क्ष प्रीतम सिंह ही गढ़वाल मंडल में बड़े नेता रह गए हैं।अब अगर हरीश रावत को पार्टी स्वास्थ्य ठीक न होने पर भी नेता बनाती है। दोहरा संकट खड़ा हो जाएगा। एक तो हरीश रावत भी कुमाऊँ मंडल से आते हैं।उनके नेता बनते ही गढ़वाल की उपेक्षा वाला मुद्दा खत्म हो जायेगा।

दूसरा हरीश रावत अभी मौजूदा अध्य्क्ष प्रीतम सिंह व पूर्व प्रदेश अध्य्क्ष किशोर के खिलाफ हैं।सूत्रों का कहना है हरीश रावत अपने समर्थक को अध्य्क्ष बनाना चाहते हैं। इंदिरा ह्रदयेश के निधन से खाली विधायक दल के नेता पद भी इसी खींचतान के चलते फैसला नही हो पा रहा है।पँजाब की तरह ही उत्तराखण्ड का फैसला कांग्रेस  आलाकमान के लिये परेशानी वाला बन गया है।पँजाब में मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह के बिना कांग्रेस कुछ कर पाने की स्थिति में नही है।दूसरी तरफ अपनी ही सरकार की खिलाफत अनुशासनहीनता कर रहे सिद्दू को राहुल और प्रियंका छोड़ ना नही चाहते। क्योकि उन्हें लगता है कांग्रेस में सिद्दू ही ऐसा नेता है जो प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ खुल कर बोलते है।दूसरे नेता रणदीप सुरजेवाला हैं। हालांकि सिद्दू के नेगेटिव प्रचार से कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ पर राहुल ऐसा नही मानते हैं।अब यही सब कारण कांग्रेस को पंजाब ओर उत्तराखण्ड में परेशानी में डाल सकते हैं।

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