Homeधर्मयोग से कर्मों में कुशलता ही इसका मूल सिद्धान्त है

योग से कर्मों में कुशलता ही इसका मूल सिद्धान्त है

ब्रम्हाकुमारी शिवानी
योग का अर्थ ही है जोड़-सम्बन्ध या मिलन। दुनियावी सम्बन्धों के लाभ-हानि से तो सभी परिचित हैं। सच में परमात्मा से आत्मा का स्मृति द्वारा मिलन ही सर्वोच्च योग है। इसी से आत्मायें परमात्मा समान विश्व हितकारी सो विश्व महाराजन तक बन सकती हैं। सारी चाहतें उस एक से ही मिट सकती हैं। गुणां के सागर से योग लगाने पर हमारे शुभ मन का तन पर भी  सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
इसी प्राचीन भारतीय राजयोग में मगन रहने से, पावर हाउस से बैटरी के चार्ज होने की तरह सुप्रीम पावर हाउस शिव बाबा से आत्मायें चार्ज हो जाती हैं। पतित पावन परमात्मा से जुड़कर आत्मा जितनी-जितनी पावन बनती, पवित्रता-सुख-शान्ति-आनंद उतना ही उसके गले का हार बनता जाता है। फिर तो अन्य अनेकानेक रिद्धियाँ-सिद्धियाँ भी उसे हस्तगत होने लगती हैं। बैटरी का निगेटिव-पाजिटिव तार जितना समय पावर हाउस से जुड़ा रहता उतनी ही वह चार्ज होती है। इसी ही प्रकार हमारे मन -बुद्धि रूपी तार जितना- जितना  परम पिता परमात्मा की याद में मगन रहते तो आत्मा भी उतनी गुण-शक्ति सम्पन्न  होकर चारों युगों में उच्च पद  की अधिकारी बनती है।
अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष में योग शब्द का प्रयोग विश्व भर में अलग-अलग तरीके से किया जा रहा है। जबकि भारतीय प्राचीन राजयोग प्राय लोप हो गया है। योग शास्त्र  कही जाने वाली सर्व शास्त्र शिरोमणि गीता में आसन- प्राणायाम, ब्रत-उपवास या मुद्रा को कहीं भी योग नहीं कहा गया है। गीता में आत्मा और परमात्मा का ही विस्तृत वर्णन है। सदगुणी जीवन, शुद्ध भोजन, ब्रह्मचर्य तथा कार्य -व्यवहार में कमलवत उपरामता के लिए ही निर्देश दिये गये हैं। नष्टोमोहा बनकर ईश्वरीय स्मृति से परमानन्दमय जीवन बनाने को ही विजयी बनना बताया है।
योग से कर्मों में कुशलता ही इसका मूल सिद्धान्त है। बाकि कहे भी तीर-तलवार, गदा-भाला वाली लड़ीई का उल्लेख नहीं है। हर कोई अपने द्वारा सिखाये जा रहे योग को सर्व श्रेष्ठ घोसित कर रहे हैं परन्तु जो फल गीता में वर्णित राजयोग का है, उसे ही व्यवहारिक जीवन में उतारने के लिए विश्वव्यापी ब्रह्माकुमारी संस्थान दिन -रात प्रयत्नशील है। दूसरे योग तो विनाशी शरीर को ही सुगढ़ – सुन्दर और स्वस्थ बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। जबकि अवगुणी या सतगुणी होने पर शरीर नहीं आत्मा ही पापात्मा या देवात्मा कहलाती है। जिस प्राचीन भारतीय राजयोग को सिखलाने के लिए स्वयं सर्वशक्तिवान, आदित्यवर्ण, योग-योगेश्वर भगवान को धरा पर खुद अवतरित होना पड़े, भला उस योग से श्रेष्ठ दूसरा योग कैसे हो सकता है? हम चेतन प्राणी हैं और हमारी चेतना शरीर में नहीं; आत्मा में ही है। अविनाशी आत्मा के शरीर से निकलते ही जड़ शरीर को जला या दफना दिया जाता है। परम चैतन्य परमात्मा भी आत्माओं की ही तरह इतने सूक्ष्म हैं कि आॅखो से देखा नहीं जा सकता है। हाँ, बुद्धि रूपी नेत्रां२ से अनुभव किया जा सकता है। विशाल सृष्टि में हम आत्माओं का परम पिता परमात्मा के साथ कल्प-कल्पान्तर खेल चला ही करता है। योग तो अनेकों प्रकार के हैं परन्तु प्राचीन भारतीय योग की महिमा सारे विश्व में है क्योंकि  परमात्मा के साथ हम आत्माओं के योग युक्त होने पर तमोप्रधान-दु:खदायी दुनिया फिर से सतोप्रधान-परम सुखदायी स्वर्ग बन जाती है।
किसी आकस्मिक लालसा से व्यक्ति का विवेक क्षण भर में ही हर लिया जाता है
स्वामी क्रियानंद
प्रत्येक व्यक्ति, जब तक वह ईश्वर को प्यार नहीं करता, एक प्रकार से मूर्ति पूजक है। किसी व्यक्ति या वस्तु को प्यार करना चूँकि वह उसे ईश्वर का स्मरण कराती है, यह एक गुण है, दोष नहीं।
सबसे ऊँची मंजिल पर जाने के लिए व्यक्ति को अन्य मंजिÞलों से चढ़कर ऊपर जाना होगा। कोई भी व्यक्ति सबसे ऊँचे स्थल पर छलाँग मार कर नहीं जा सकता। जैसे ईश्वर हैं, निराकार और नर्वैयक्तिक, इस रूप में उनसे प्रेम करना मनुष्यों के लिए लगभग असंभव है। पर ऐसा प्रेम स्वाभाविक रूप से वे लोग कर पाते हैं जो दिव्य पूर्णता को किसी मानव रूप में देखते हैं। इस प्रकार की पूजा या भक्ति में यह सदा स्मरण रखना व्यक्ति के लिए महत्त्वपूर्ण है कि वह जिस आकार (या जीवित व्यक्ति) को प्रेम करता है, वह उस असीम ईश्वर का एक झरोखा मात्र है। इच्छा को, विशेष रूप से जहाँ तक तीव्र इच्छा का संबंध है, स्वयं में पहचाना बहुत कठिन है।
किसी आकस्मिक लालसा से व्यक्ति का विवेक क्षण भर में ही हर लिया जाता है। ऐसी परिस्थिति में बुद्धिमत्तापूर्ण आचरण की कुंजी है कि व्यक्ति अपने हृदय की भावनाओं का निरीक्षण करे। कवि वर्डस्वर्थ लिखते हैं, जब मैं आकाश में इन्द्रधनुष को देखता हूँ तो मेरा हृदय (आनन्द से) उछलता है। वस्तुत: जब व्यक्ति अचानक किसी वस्तु के तीव्र आकर्षण में फँस जाता है, तब बिल्कुल यही होता है जो वो यहां कह रहे हैं। इन्द्रधनुष तो जल्दी गायब हो जाता है पर भाव रह जाते हैं। अचानक आकर्षित करने वाली वस्तुएँ सभी गायब हो जाती हैं, पर हृदय का उछलना कुछ समय तक रहता है। हम देख चुके हैं कि शक्ति का यह ऊर्ध्व प्रवाह वस्तुत: इच्छित है और आध्यात्मिक जागृति के लिए बहुत जरूरी भी है। परन्तु यह प्रवाह शान्त होना चाहिए। भावों का ऊपर की ओर उछाल, ध्यान की वाता का लक्षण है। अपने हृदय का निरीक्षण करो, क्या इसके भाव अचानक उठने वाली लालसाओं के कारण उछलने लगते हैं। अगर ऐसा है तो उन्हें ललकारो! अपने विवेक को किसी ऐसी वस्तु से मूढ़ न होने दो, जो भावों को भक्ति से नहीं बल्कि भावात्मक उद्वेलन से ऊँचा उठाती है। अन्तत: जो लोग अपने भावों को भावुकता में बहने देते हैं वे प्राय: संवेदनाओं के व्यापारियों से अत्यधिक प्रभावित होते हैं।
वे एक सम्प्रदाय से दूसरे सम्प्रदाय के चक्कर में पड़े रहते हैं, धार्मिक सम्मेलनों में जाते हैं, चमत्कार करने वालों के पास जाते हैं। शहर में आने वाले हर नए भाषण देने वाले को उत्कण्ठा से सुनने जाते हैं। यह सब क्रियाएँ अज्ञान के रोग के लक्षण हैं: आन्तरिक प्रेरणा की बजाए वा उद्दीपन पाने की इच्छा है।

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