संपादकीय

बिना कांग्रेस मजबूत विपक्ष की परिकल्पना

बिना कांग्रेस मजबूत विपक्ष की परिकल्पना

देश की सियासत में आजकल तमाम तरह के उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं। पिछले दिनों एनसीपी प्रमुख शरद पवार के घर हुई विपक्षी दलों की बैठक में किसी भी....

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A sham-became-cow’s legacy! एक छलावा बन गई गाय की विरासत!

पिछले दिनों एक चर्चा गर्म थी, कि कोरोना वैक्सीन में बछड़े के सीरम का इस्तेमाल होता है। यह सूचना आते ही भाजपा नेता भड़क उठे और फिर वे पूर्व की भाँति ऐसा कहने वालों को वामी, कांगी और देशद्रोही का तमग़ा देने लगे। लेकिन नहीं इस्तेमाल होता, इसका भी वे पुख़्ता तौर पर खंडन नहीं कर सके। ख़ुद स्वास्थ्य मंत्रालय ने बयान दिया, कि नवजात बछड़े के सीरम का इस्तेमाल केवल वेरो सेल्स को तैयार करने और विकसित करने के लिए किया जाता है। लेकिन भाजपा को इसमें भड़कने कि कौन-सी बात थी? क्या यह सर्वविदित नहीं है कि सदियों से बछड़े को कृषि कार्यों में जोतने के लिए उसे बधिया किया जाता रहा है और आज भी होता है। बधिया यानी वंध्याकरण। नर गो-वंश के पौरुष को बाधित कर देते थे, जिस वजह से उसके अंदर की कामेच्छा का नाश हो जाता था। तब वह सिर्फ़ हल ही खींच सकता था। हम जिस युग में पले-बढ़े हैं, वहाँ गाय हमारी माता है, के स्लोगन बचपन से ही पढ़ाए गए थे। लेकिन ये हमारे किसानी संस्कार थे। इसके पीछे हो सकता है, कुछ लोगों के मन में धार्मिक संस्कार रहे हों। लेकिन अधिकांश के लिए गाय की वह उपयोगिता थी, जिसकी वजह से भारत जैसे देश में गाय सबके दिल में रच-बस गई थी। हालाँकि कुछ लोग कह सकते हैं, कि भैंस की भी उपयोगिता थी, फिर भैंस को यह सम्मान क्यों नहीं मिला? लेकिन नर भैंस उस तरह काम का नहीं होता जितना कि गो-वंश का नर, जिसे बधिया कर बैल बना लेते थे। फिर वह किसान के लिए ऐसा उपयोगी पशु बन जाता था, जिसकी मिसाल मुश्किल है। इसकी तुलना में नर भैंस सुस्त है और कृषि कार्य में उसकी उतनी उपयोगिता नहीं है, जितनी कि बैल में है। अलबत्ता वह शहरी उपयोगिता का पशु है। शहर की रोलिंग मिलों में माल ढुआई के लिए भैंसे का इस्तेमाल होता है क्योंकि वह बैल की तुलना में अधिक शक्तिशाली है, किंतु फुर्तीला नहीं।  लेकिन आज भारतीय जनता पार्टी और उसका पितृ-संगठन आरएसएस दोनों पर गाय पर सवार हैं। और गाय पर सवारी करते हुए वे गो-रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। गाय हमारे देश का एक ऐसा पशु है, जो हमारी हमारी किसान चेतना में इस तरह रचा-बसा है कि हर हिंदुस्तानी दूध का पर्याय गाय को समझता है। दरअसल गाय एक किसान की एक ऐसी ताक़त थी, जो उसकी समृद्धि का प्रतीक थी। उसका दूध उसके बछड़े उसे आत्म निर्भर बनाते थे और इससे वह ख़ुद आत्म गौरव में डूबता था। स्वयं मेरे अपने घर पर एक गोईं की खेती थी। किसान की समृद्धि या हैसियत उसके दरवाज़े पर बंधी बैलों की जोड़ी से आँकी जाती थी, जिसे गोईं कहते थे। ये बैल गाय के बछड़े होते थे। यानी गाय के बछड़े खेत जोतने के काम आते थे और मादा होगी तो दूध मिलेगा। हर किसान के मन में गाय रखने की कामना होती थी। अधिकतर सीमांत किसानों की यह हुलस पूरी नहीं हो पाती। ख़ुद मेरे पिताजी खेती गँवाते गए तो भला गाय कहाँ से ख़रीदते! गाँव छोड़ कर वे मज़दूरी के लिए शहर आए। लेकिन गाय नहीं ख़रीद सके। यह गाय वे कोई गोदान के वास्ते नहीं अपनी किसानी लालसा पूरी करने के लिए ख़रीदना चाहते थे। आज मेरे यहाँ ढाई तीन लीटर गाय का दूध रोज़ आता है लेकिन गाय रखने की इच्छा मेरी भी है। यह हमारी हज़ारों साल की किसान चेतना है, कोई धार्मिक आस्था नहीं। यकीनन हम अगर गाय ख़रीद लें तो उसके बुढ़ाने अथवा मर जाने पर वही करेंगे जो किसान करता आया है। और हमारे इस काम में धर्म आड़े नहीं आएगा।  लेकिन आज जिस तरह से गाय को एक राजनीतिक पशु बना दिया गया है, उससे हमारी किसानी, सामाजिक और आर्थिक चेतना गड्ड-मड्ड हो गई है। अगर आज मैं एनसीआर के क़रीब किसी गाँव में एक गाय ख़रीद कर रख लूँ, तो उसका दूध तब तक ही मिलेगा, जब तक वह अगली बार नहीं बियाती। एक सामान्य क़िस्म की देसी गाय के लिए कम से कम 50 हज़ार रुपए चाहिए। उत्तर प्रदेश में पशु-धन विभाग और कृषि विभाग अब नाम के बचे हैं। इसलिए ग़ाज़ियाबाद और नोएडा में कहीं भी गाय के गर्भाधान के लिए न तो उपयुक्त साँड़ मिलेंगे न ही कृत्रिम गर्भाधान के लिए किसी बलशाली साँड़ का वीर्य (सीमन)। मालूम हो कि पहले गाँवों में कुछ नर गोवंश को छुट्टा छोड़ दिया जाता है। इन्हें बधिया नहीं किया जाता था। ये गाँवों के पास के गोचरों में चरते और अगर कभी-कभार किसानों की फसलों पर भी मुँह मार लेते। लेकिन तब कोई इसका प्रतिरोध न करता था क्योंकि उस समय इनकी ज़रूरत थी और हर गांव में कुछ ज़मीन ऐसी थी, जिसे जोता-बोया नहीं जाता था। ये साँड़ ही गाय के साथ मीटिंग करते। किसान स्वयं अपनी गाय मीटिंग के लिए उन सांडों के क़रीब छोड़ आता था। अथवा गाँव के बाहर वे गाय को छोड़ देते थे। हृष्ट-पुष्ट साँड़ के साथ मीटिंग होने पर गाय पहली बार में ही गर्भवती हो जाती थी। इसके बाद फिर इन सांडों का वीर्य मशीनों से निकाला जाने लगा। तब किसान अपनी गाएँ इन कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों में ले जाते और इन्हें उन्नत क़िस्म के साँड़ के वीर्य को इंजेक्शन के ज़रिए मादा गोवंश की जननेंद्रिय में इंजेक्ट किया जाता।   वैसे वर्ष 2018 में ख़ुद मोदी सरकार एक फ़ार्मूला लेकर आई थी, जिसके मुताबिक़ गायों को ऐसी टेकनीक से गर्भित क़राया जाएगा, ताकि सिर्फ़ बछड़ी (मादा) ही पैदा हो। इसके पीछे सरकार का तर्क था, कि इस तरह देश में दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा और आवारा गो-वंश (नर) के पैदा होने पर रोक लगेगी। यह फ़ार्मूला पशु क्रूरता में तो आता ही था, हिंदू मान्यताओं के प्रतिकूल भी था। नर गो-वंश भगवान शिव का वाहन है। आंध्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में इस नर गो-वंश के मंदिर है। बंगलूरू का बुल टेंपल तो बहुत मशहूर और प्राचीन है। मज़े की बात कि उत्तराखंड और महाराष्ट्र में ऐसे गर्भाधान सेंटर खोले भी गए। एक कदम और बढ़ाते हुए सरकार ने गायों को कृत्रिम गर्भाधान कराने का फैसला लेने वाले किसानों को शुक्राणु में सब्सिडी देने का फैसला भी किया। पशुपालन, डेयरी विभाग के सूत्रों के अनुसार पहले यह सीमन किसानों को 600 रुपए में सेंटर से दिया जाता था। लेकिन अब केंद्र सरकार इस पर 200 रुपए की सब्सिडी देने की घोषणा हुई थी।  केंद्र सरकार ने प्रयोग के तौर पर पहले उत्तराखंड के ऋषिकेश और महाराष्ट्र के पुणे में कृत्रिम गर्भाधान के सेंटर खोले। इसके बाद सरकार ने केरल, हिमाचल, उत्तराखंड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलगांना और महाराष्ट्र में भी नए केंद्र खोले है। इस सेंटर में देसी गोवंशीय पशुओं में सिर्फ बछिया को पैदा करने वाले इंजेक्शन तैयार किए जाने लगे हैं। पहले इस तरह के इजेक्शन का विदेशों से आयात किया जाता था। लेकिन अब भारत में ही विदेशी नस्ल की फ्रिजियन, क्रॉसब्रीड, होलस्टीन गायों के साथ देसी नस्ल की गायों के सीमेन को फ्रीज कर गायों को कृत्रिम गर्भाधान कराया जा रहा है। बछिया पैदा करने के लिए तैयार होने वाला इंजेक्शन को लिक्विड नाइट्रोजन में माइनस 196 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाता है। इसे करीब 10 वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके एक डोज में मादा व नर पुश के बीस मिलियन स्पर्म रखे जाते है। अन्य देशों से आयात किए जा रहे सीमन की कीमत भारत में करीब पंद्रह सौ रुपए पड़ती है।  लेकिन कड़वी सच्चाई यह है, कि हरियाणा में गाँव वाले तीन-चार उन्नत क़िस्म के साँड़ रखते हैं। उनके लिए गोचर की भी व्यवस्था है। किंतु उत्तर प्रदेश में न तो गोचर हैं न अब ख़ाली ज़मीन है। ये आवारा गो-वंश फसलों को चर रहा है। बेचारा किसान रात-रात भर जग कर अपने खेतों की रखवाली करता है। और साँड़ भी अनुपयोगी हो गए हैं। पशुपालन विभाग में पशु चिकित्सक नहीं हैं। जो हैं, उनकी ड्यूटी गोशालाओं में लगी है। ऐसे में कृत्रिम गर्भाधान केंद्र ख़ाली पड़े हैं। वैसे नियम के अनुसार पशु चिकित्सक घर पर आकर भी ये इंजेक्शन लगा सकता है। इसके लिए 35 रुपए की फ़ीस निर्धारित है। मगर डॉक्टर मिलते नहीं और 300 रुपए लेकर झोला-छाप डॉक्टर होता है। उसके पास जो सीमन होता है, वह बेकार जाता है। इस तरह एक गाय जो पूरे जीवन में पाँच से आठ दफे तक बियाती है, वह हर बार फ़ाउल हो जाती है और एक या दो दफे ही वह गर्भवती होती है। ऐसे में गायों की उन्नत क़िस्म एक छलावा है।  

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Politics-!राजनीति – पद व सत्ता पाने के लालच में तार-तार होते संबंध व रिश्ते-नाते!

दुनिया के बहुत सारे देशों की तरह भारत में आदिकाल से ही परिवार रिश्ते-नातों आपसी संबंधों को हमेशा से तरज़ीह देने की संस्कृति रही है, हमारे देश में आज भी अधिकांश....

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sanjay gandhi plane crash: संजय गांधी की विमान दुर्घटना के बाद हमेशा के लिए बदल गया राजनीति का रुख  

ठी क 41 साल पहले की बात है, जब 23 जून 1980 की सुबह 8.40 बजे मेरे पिता ने मुझे जगाया और बताया कि पुलिस पीआरओ लाइन फोन पर हैं।....

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learning age: सीखने की उम्र

पंजाब के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए नामचीन बिजनेस गुरू शिव खेड़ा ने स्वीकार किया कि दो साल पहले तक उन्हें ईमेल करना नहीं आता था।....

NANCHANG, Feb. 2, 2020 (Xinhua) -- Workers make protective masks at the workshop of a company in Jinxian County, east China's Jiangxi Province, Feb. 1, 2020. To help fight the outbreak of pneumonia caused by novel coronavirus, workers of many medical material companies rushed to work ahead of schedule to make protective equipment. (Xinhua/Wan Xiang/IANS)

Shouldn’t health be seen as a fundamental right? क्या स्वास्थ्य को एक मौलिक अधिकार के रूप में नहीं देखना चाहिए ? 

" आपदा प्रबंधन कानून, 2005 की धारा 12 (तीन) के तहत प्रत्येक परिवार चार लाख रुपये तक मुआवजा का हकदार है, जिसके सदस्य की कोरोना वायरस से मौत हुई।" यह कहना है सुप्रीम कोर्ट....

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economic revolution thirty years ago: तीस साल पहले की आर्थिक क्रांति

भारत को आजादी 1947 में मिल गई थी लेकिन उसके काफी सालों बाद तक भारत में मुक्त अर्थव्यवस्था की बात करने वालों की आवाज को गंभीरता से नही लिया गया।....

Do yoga, stay at home: योग करें, घर पर रहें

Do yoga, stay at home: योग करें, घर पर रहें

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित करने के भारत के प्रस्ताव को अंगीकृत किया था। यह दो कारणों से एक ऐतिहासिक क्षण....

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Utterkatha: After the great churning, it’s the turn of Mahasamar : उत्तरकथा : महामंथन के बाद महासमर की बारी !

यूपी में लंबी चली रस्साकशी का संदेश सामने है कि सब भुलाकर सामूहिक नेतृत्व में और पहले से ज्यादा संगठित होकर भारतीय जनता पार्टी सियासी समर में उतरेगी। विधानसभा चुनावों....

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Royalty, corruption and starvation! शाहखर्ची, भ्रष्टाचार और भुखमरी!

यूपी के शाहजहांपुर निवासी अखिलेश गुप्ता ने व्यवसायिक कर्ज न चुका पाने के कारण परिवार सहित आत्महत्या कर ली। लखनऊ की एक फ्लोर मिल में काम करने वाले महेश अग्रवाल....

Ram janam bhumi Mandir

The game of politics and donations in Ram Mandir! राम मंदिर में सियासत और चंदे का खेल!

एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र में धार्मिक स्थल बनवाना सरकार का काम नहीं है। फिर भी यदि उस स्थल से राष्ट्रीय स्वाभिमान जुड़ा हुआ है तो सरकार को अपने ख़ज़ाने से वह स्थल बनाना चाहिए किंतु पब्लिक के चंदे से नहीं। लेकिन अयोध्या में राम लला मंदिर को भारतीय जनता पार्टी ने अपना मुद्दा बनाया, इसी के बूते वह चुनाव जीती और मंदिर बनाने के लिए कोर्ट में लड़ी। वहाँ भी उसे जीत मिली। इसके बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट बना। राम मंदिर निर्माण के नाम पर पब्लिक से करोड़ों रुपए उगाहे गए और इसके बाद ज़मीन की ख़रीद में घोटाला हो गया। दो करोड़ की ज़मीन का सौदा साढ़े 18 करोड़ में हुआ। मज़े की बात यह ट्रस्ट सरकार ने बनाया था और उसमें भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के लोग हैं। ज़ाहिर है इस घोटाले की आँच सरकार पर भी आएगी। ख़ास कर उत्तर प्रदेश सरकार के लिए मुसीबत और बढ़ गई है, क्योंकि फ़रवरी 2022 में वहाँ विधानसभा चुनाव होने हैं।  आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने आरोप लगाया है कि 18 मार्च 2021 को जिस ज़मीन का सौदा दो करोड़ रुपयों में हुआ, वही ज़मीन कुल पाँच मिनट बाद ट्रस्ट ने साढ़े 18 करोड़ में ख़रीदी। यह तो चमत्कार हो गया कि महज़ कुछ ही मिनट में ज़मीन के दाम 9 गुना बढ़ जाएँ। बैनामे और रजिस्ट्री में एक ही गवाह हैं। 18 मार्च, 2021 को बाबा हरिदास के परिवार ने सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के नाम ज़मीन दो करोड़ में बेची। उसके दस मिनट बाद सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी ने राममंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट को 18.5 करोड़ में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट द्वारा ज़मीन बेच दी।  संजय सिंह के अनुसार 1,2080 वर्ग मीटर, यानी 1.208 हेक्टेयर में फैली एक ज़मीन, मौज़ा बागबी, हवेली अवध तहसील, सदर अयोध्या में है। जिसका गाटा संख्या 243,244 एवं 246 है। इसकी क़ीमत 5.79 करोड़ रुपये (क्षेत्र के सर्कल रेट के अनुसार) है। 18 मार्च 2021 को शाम 7 बज कर 10 बजे इस ज़मीन को 2 करोड़ में बेच दिया गया। ज़मीन का सौदा कुसुम और ऋषि पाठक और रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी के बीच हुआ। इसी तारीख को 18 मार्च 2021 को ठीक 5 मिनट बाद शाम सवा सात बजे बजे इस जमीन को 18.5 करोड़ रुपये में ट्रस्ट द्वारा राम मंदिर के लिए ख़रीद लिया गया। उत्तर प्रदेश के आप के प्रभारी संजय सिंह ने दावा किया कि दोनों लेन-देन ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के इशारे पर हुए। वहीं सपा के पूर्व विधायक पवन पांडेय ने भी मंदिर के निर्माण के लिए एकत्र किए गए धन में गबन का आरोप ट्रस्ट पर लगाया है। दिलचस्प बात यह है कि कि दोनों बार बिक्री समझौतों में ऋषिकेश उपाध्याय, मेयर अयोध्या और ट्रस्ट के ट्रस्टी अनिल मिश्रा गवाह हैं। उन्होंने कहा कि इसमें से 18.5 करोड़ रुपये की राशि में 17 करोड़ रुपये भुगतान आरटीजीएस के थ्रू हुआ। इसके अलावा यह भी दिलचस्प बात है की, रजिस्ट्री के लिए ट्रस्ट ने स्टांप पेपर शाम पाँच बज कर 11 मिनट पर ख़रीदे, जबकि तिवारी और अंसारी ने 10-11 मिनट बाद पाँच बज कर 12 मिनट पर ख़रीदे। संजय सिंह का कहना है कि "भारत सरकार को सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा इस मामले की जांच करानी चाहिए।” श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इस पूरे आरोप पर जो बयान दिया, वह बहुत ही हास्यास्पद है। उन्होंने कहा, “मैं पूरे मामले का अध्ययन करने के बाद गबन के आरोपों पर बोलूंगा।” उन्होंने कहा, "हम पिछले 100 वर्षों से आरोपों का सामना कर रहे हैं, हम पर महात्मा गांधी की हत्या का भी आरोप लगाया गया।” चंपत राय विहिप के उपाध्यक्ष भी हैं।  सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित परिसर के बारे में 9 नवंबर 2019 को एक फ़ैसला सुनाया था। फ़ैसले के अनुसार विवादित भूमि (2.77 एकड़) को एक ट्रस्ट को सौंपने का आदेश हुआ। इसी के लिए भारत सरकार द्वारा श्री राम जन्मभूमि, ट्रस्ट बना। मंदिर निर्माण की ज़िम्मेदारी इस ट्रस्ट को दी गई। इसी के साथ कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि सरकार उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को भी वैकल्पिक 5 एकड़ जमीन दे। जहां पर इस परिसर में पहले से स्थापित बाबरी मस्जिद के बदले एक नई मस्जिद का निर्माण क़राया जा सके। यहाँ की बाबरी मस्जिद के बारे हिंदुओं का आरोप था, कि इसे 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने यहाँ पर पहले से बने राम मंदिर को तोड़ कर बनाई थी। यह विवाद क़रीब दो सौ वर्षों से चला आ रहा था। 6 दिसंबर 1992 को यह मस्जिद उग्र कारसेवकों ने ध्वस्त कर दी।   चंपतराय ने पिछले दिनों कहा था -“शिकायत तब करनी चाहिए थी जब सोनिया गांधी राज कर रहीं थीं, तब वो हमारे ख़िलाफ़ एक जांच बिठा सकती थीं। आज करने का कोई फ़ायदा नहीं है।” अपनी सफाई में वे कहते हैं कि 9 नवम्बर, 2019 को श्रीराम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के पश्चात् अयोध्या में भूमि खरीदने के लिए देश के असंख्य लोग आने लगे, उत्तर प्रदेश सरकार अयोध्या के सर्वांगीण विकास के लिए बड़ी मात्रा में भूमि खरीद रही है, इस कारण अयोध्या में एकाएक जमीनों के दाम बढ़ गये। जिस भूखण्ड पर अखबारी चर्चा चलाई जा रही है वह भूखण्ड रेलवे स्टेशन के पास बहुत प्रमुख स्थान है। इससे पूर्व भी राम मंदिर के लिए आने वाले चंदे के बारे में जब जब सवाल किए गए हैं श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्य गोपाल दास कहते रहे हैं, “कितना पैसा आया, कितना नहीं आया, हमें नहीं मालूम, हमें ना पैसा लेना है ना देना है, हिसाब क्या लेना है। पैसे का हिसाब कारसेवक पुरम वाले ही रखते हैं। मेरा पैसे से कोई मतलब नहीं हैं।” महंत नृत्य गोपाल दास कहते हैं, “मेरे पास मंदिर का एक पैसा नहीं है, ना लेना है ना देना है, हमें मगन रहना है। हमें पैसों से मतलब नहीं है। मंदिर जनता और धर्माचार्यों के सहयोग से बनेगा।”  वीएचपी के कुछ नेता कई बार कुछ आँकड़ा बता देते हैं लेकिन उसका कोई आधार नहीं होता है। अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया जब ज़ोर-शोर से राम मंदिर आंदोलन चला रहे थे, उस दौरान जब भी उनसे चंदे के बारे में पूछा गया, उन्होंने नाराज़गी ही ज़ाहिर की। अब विश्व हिंदू परिषद को अपने खातों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, पारदर्शिता तो यही होती है। हाल के सालों में निर्मोही अखाड़े और हिंदू महासभा से जुड़े नेताओं ने श्रीराम जन्मभूमि न्यास को मिलने वाले चंदे पर सवाल उठाए हैं और जाँच की माँग की है। इस पर चंपतराय कहते हैं, “जिन लोगों को शिकायत है, उन्हें आयकर विभाग में शिकायत करनी चाहिए और जाँच की माँग करनी चाहिए। जो लोग हमसे हिसाब-किताब मांग रहे हैं, ये पैसा उनका नहीं है, ये राम का पैसा है।” उधर भ्रष्टाचार के आरोपों पर अयोध्या के हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास और रामलला के प्रधान पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने भी अपना विरोध दर्ज कराया है। आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर लगा आरोप निराधार है। उन्‍होंने कहा कि यह संभव नहीं है. यह राम भक्तों के द्वारा दान किए गए पैसे का अपमान है। अगर आरोप निराधार निकलते हैं तो आरोप लगाने वाले लोगों पर मुकदमा किया जाना चाहिए। हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास ने कहा कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। उन्होंने आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह पर हमला बोलते हुए कहा कि अगर इस मामले में आरोप गलत निकले तो 50 करोड़ रुपए के मानहानि का मुकदमा भी आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह पर करेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि कोई दोषी मिलता है तो उन दोषियों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। एक बात यह भी पता चली है कि संबंधित भूमि का चार मार्च 2011 को यानी 10 साल पूर्व ही मो. इरफान, हरिदास एवं कुसुम पाठक ने दो करोड़ में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट कराया था। तीन साल बाद इस एग्रीमेंट का नवीनीकरण भी कराया गया। यह भूमि 2017 में हरिदास एवं कुसुम पाठक ने भू स्वामी नूर आलम, महफूज आलम एवं जावेद आलम से बैनामा करा ली और हरिदास एवं कुसुम पाठक से यह भूमि 17 सितंबर 2019 को रविमोहन तिवारी, सुल्तान अंसारी आदि आठ लोगों ने एग्रीमेंट करा ली और रविमोहन एवं सुल्तान अंसारी ने ही 18 मार्च को यह भूमि बैनामा करा ली। इस तरह यह भूमि विवाद अब सियासत का खेल बनता जा रहा है।  कुछ सूत्रों से यह भी पता चला है कि अयोध्या के बाग बिलैसी में स्थित 180 बिस्वा (12,080 वर्ग मीटर) जमीन हरीश पाठक और कुसुम पाठक की थी। इसे उन्होंने सुल्तान अंसारी, रवि मोहन तिवारी, इच्छा राम, मनीष कुमार, रवींद्र कुमार, बलराम यादव और अन्य तीन के नाम 2019 में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट कर दिया था। इस जमीन का सौदा 26.50 करोड़ रुपये में तय हुआ। इसकी सरकारी मालियत करीब 11 करोड़ रुपये आंकी गई थी। 2.80 करोड़ रुपये हरीश पाठक और कुसुम पाठक के खाते में ट्रांसफर कर 80 बिस्वा जमीन की रजिस्ट्री कराई गई। बाकी 100 बिस्वा जमीन एग्रीमेंट धारकों ने अपनी सहमति से दो लोगों के नाम लिख दिया, जिनसे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 18.50 करोड़ में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट करवा लिया है। कुल मिला कर आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला जारी है। अभी तक कोई भी सक्षम अधिकारी इस संदर्भ में आधिकारिक बयान नहीं दे रहा है। लेकिन चुनावी माहौल को देखते हुए विपक्ष भाजपा सरकार पर आक्रामक है। विपक्ष माहौल बना रहा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा राम मंदिर चंदा घोटाले में घिर जाए। इससे जो उसका कोर वोट बैंक वह उससे छिटक जाए। लेकिन पुख़्ता तौर पर संजय सिंह एवं पवन पांडेय भी कोई बात नहीं कह पा रहे।  इस प्रकरण के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अजीबो-गरीब फ़ैसला किया है कि भविष्य में ज़िलाधिकारी भू-सम्पत्तियों के लिए स्टाम्प शुल्क का निर्धारण करेंगे। एक तरह से वह पूरे मामले को महज़ स्टाम्प शुल्क की चोरी से देख रही है। किंतु असली सवाल अपनी जगह है कि यह एक पूर्व नियोजित खेल था। अन्यथा महज़ पाँच मिनट के अंतराल में भूमि इतनी महँगी कैसे हो गई? यह कैसे पचेगा कि पाँच मिनट पहले जो ज़मीन दो करोड़ में बिकी उसकी पुनर्ख़रीद साढ़े 18 करोड़ में कैसे हुई। सच बात तो यह है कि इस ख़रीद-फ़रोख़्त में कई तरह के घोटाले हुए। उत्तर प्रदेश में शहरी आवासीय भूमि का एक सर्किल रेट होता है, जिसे डीएम सर्किल रेट कहते हैं। इसके अनुसार ज़मीन की रजिस्ट्री के लिए इसी सर्किल रेट के आधार पर स्टाम्प पेपर ख़रीदे जाएँगे। भले ही ज़मीन कम क़ीमत पर बिके या अधिक क़ीमत पर। सूत्रों के अनुसार 18 मार्च 2021 को जो ज़मीन दो करोड़ में बिकी, उसका सर्किल रेट 5,79,84000 रुपए था। इसलिए इसके लिए 40,56,900 रुपए के स्टाम्प पेपर ख़रीदे गए थे किंतु उसी दिन जब यह साढ़े 18 करोड़ रुपए में बिकी तब स्टाम्प 1,29,50000 रुपए के लगे। तब इस मामले में स्टाम्प चोरी का भी मामला बनाता है। और तिवारी व अंसारी पर मुक़दमा दर्ज होना चाहिए। लेकिन शासन ने डीएम की निगरानी में स्टाम्प शुल्क की बिक्री डाल कर खानापूरी कर ली है। अब अनावश्यक विलम्ब हुआ करेगा।  बाबर हिंदुस्तान में 1526 में आया था। उस समय दिल्ली में सुल्तान इब्राहिम लोदी का शासन था। उसने पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी को हराया और दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद वह आगरा, इटावा होते हुए अवध की तरफ़ चला गया। बाबर स्वयं तो अयोध्या नहीं गया था किंतु उसका सेनापति अयोध्या पहुँचा। कहा जाता है कि वहाँ उसने 1528 में एक मस्जिद बनवाई, जिसका नाम उसने बाबरी मस्जिद रखा। यह बाबर की हिंदुस्तान जीत के जश्न के तौर पर बनी। लेकिन बाबरनामा में इसका कोई ज़िक्र नहीं है न ही आइन-ए-अकबरी में। उस समय रामचरित मानस लिखने वाले तुलसीदास ने भी किसी मस्जिद अथवा मंदिर का ज़िक्र नहीं किया है। लेकिन बाद में यहाँ मस्जिद बनी क्योंकि 1717 में मुग़ल दरबार के एक हिंदू राजा जय सिंह ने मस्जिद के आसपास की ज़मीन ख़रीद ली। इसी ज़मीन पर चबूतरा बना। इसी चबूतरे पर रामलला की पूजा होने लगी। कहा गया कि राम जी की छठी इसी भवन में मानी थी। 1813–14 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक सर्वेयर फ़्रांसिस बुचानन ने कहा कि औरंगज़ेब ने कई मंदिरों को तोड़ कई मस्जिदें बनवाई थीं और यहाँ एक राम मंदिर था, उसे ध्वस्त कर यह मस्जिद बनी। बुचानन के दावे के बाद एक ईसाई पादरी ने भी कहा, कि राम का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। पत्थरों से यह पता चला है।  अंग्रेजों ने इसको तूल दिया और यहाँ कई बार झगड़े भी हुए। 1833, 1853 में कई बार इस मस्जिद को लेकर खूनी संघर्ष हुए। लेकिन अवध के नवाबों ने सख़्ती से इन झगड़ों को दबा दिया।  लगभग 150 साल पुराने अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद पर 9 नवम्बर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। इसके तहत अयोध्या की 2.77 एकड़ की पूरी विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बने और इसकी योजना तैयार की जाए। चीफ जस्टिस ने मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन दिए जाने का फैसला सुनाया, जो कि विवादित जमीन की करीब दोगुना है। चीफ जस्टिस ने कहा कि ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है। इस तरह देश के इतिहास के सबसे अहम और एक सदी से ज्यादा पुराने विवाद का अंत कर दिया। चीफ जस्टिस गोगोई, जस्टिस एसए बोबोडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने स्पष्ट किया कि मंदिर को अहम स्थान पर ही बनाया जाए। रामलला विराजमान को दी गई विवादित जमीन का स्वामित्व केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा।

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Uttar Pradesh – In the election year, the “Brahmin Voter” became the focal point of politics! उत्तर प्रदेश – चुनावी वर्ष में “ब्राह्मण मतदाता” बने राजनीति का केंद्र बिंदु!

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jatin prasad

Jitin’ Prasad will make a hole in whose boat! जितिन प्रसाद  किसकी नाव में छेद करेंगे!

पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया और अब जितिन प्रसाद को अपनी पार्टी में लाकर भाजपा के नेता बहुत उत्साहित हैं। उनको लगता है, उन्होंने कांग्रेस और ख़ासकर राहुल गांधी की कोटरी में सेंध लगा दी है। इस तरह उन्होंने राहुल गांधी का क़द प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष और बौना कर दिया है। ऊपरी तौर पर यह कहा भी जा सकता है। किंतु कई बार चीजें वैसी नहीं होतीं, जैसी कि वे ऊपर से दीखती हैं। किसी भी राजनीतिक दल के जो आयाराम-गयाराम होते हैं, वे कब गच्चा दे जाएँगे पता नहीं। ये लोग पार्टी का संख्या बल ज़रूर बढ़ा देते हैं लेकिन उसकी शक्ति नहीं बढ़ाते। इस बात की भी पूरी संभावना बनी रहती है, कि ऐसे लोग ज़ान-बूझ कर प्रतिद्वंदी पार्टी द्वारा भेजे गए हों। इसलिए भाजपा के नेता जिस तरह से उलरे-उलरे घूम रहे हैं, कल को धड़ाम भी हो सकते हैं। क्योंकि ये दोनों युवा नेता जानते हैं कि भाजपा की जो रीति-नीति रही है, उसमें ये सदैव पराये ही रहेंगे। जिन सुषमा स्वराज ने भाजपा को सब कुछ सौंपा, उन्हें क्या मिला सिवाय वंचना, प्रताड़ना और उपेक्षा के। इसीलिए वे 67 की उम्र में ही चल बसीं। दूसरा उदाहरण गोपीनाथ मुंडे का है। महाराष्ट्र के इस तेज-तर्राक नेता, जो मोदी सरकार का कैबिनेट मंत्री था, को एक इंडिका गाड़ी टक्कर मार देती है और उनकी मृत्यु हो जाती है। आज तक उनकी मृत्यु की जाँच तक नहीं हुई। भाजपा में उसी के बल्ले-बल्ले हैं, जो नागपुर की पसंद हो। ऐसे में ये दोनों महत्त्वाकांक्षी नेता कहाँ खपेंगे! फिर प्रश्न उठता है कि ये गए ही क्यों? इसके कई मायने निकाले जा सकते हैं। हो सकता है, कि कांग्रेस में एक गुट युवा नेतृत्त्व को बढ़ावा नहीं देना चाहता, इसलिए इनको कांग्रेस के राहुल ख़ेमे में रह कर अपना भविष्य न दिख रहा हो। दूसरे यह भी हो सकता है, कि ये कांग्रेस द्वारा ही आरोपित पौधे हों। क्योंकि राजनीति खेलने में कांग्रेस के आगे अभी भाजपा पासंग ही है। तीसरे, भाजपा इन नेताओं को ब्लैकमेल कर अपने पाले में लाई हो। बहरहाल कुछ भी हो, लेकिन इतना तय है कि भाजपा ने जो सोच रखा है, वैसा नतीजा फ़िलहाल तो नहीं मिलने वाला है। जितिन प्रसाद का उपयोग भाजपा उत्तर प्रदेश में करना चाहती है, ताकि वह राज्य में ब्राह्मणों के बिगड़े सुरों को साध सके। इस लालच के फेर में जितिन आ सकते हैं। मगर जितिन को इस बात से मुँह फेर रखना चाहिए कि ख़ुदा-न-ख़ास्ता 2022 में भाजपा जीत भी गई तो पार्टी आला कमान उन्हें मुख्यमंत्री का पद सौंपेगा। वे अधिक से अधिक एक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल होंगे। मोदी-शाह-नड्डा की टोली उन्हें योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ एक बिजूके के रूप खड़ा कर रही है। उसकी उपयोगिता बस दिखाने भर की ही होती है। अगर जितिन प्रसाद इसे समझ रहे हैं, तब तो ठीक है। लेकिन यदि वे सीरियस हो गए तो फिर डूबना तय है।  भाजपा के केंद्रीय नेतृत्त्व को दो चीजों का ख़तरा दिख रहा है। एक तो यह कि बंगाल की पराजय के बाद यूपी में डूबना लगभग तय है। यहाँ पर पब्लिक का योगी सरकार से असंतोष तो है ही, किसानों का प्रदर्शन भी उसे डुबोएगा। ऊपर से कोरोना की दूसरी लहर को सँभालने में दोनों सरकारों की नाकामी भी। अगर यूपी में विधानसभा में हारे तो 2024 की लोकसभा में नरेंद्र मोदी का हारना पक्का। इसके अतिरिक्त यदि सारी नाकामियों के बावजूद यूपी में भाजपा योगी आदित्य नाथ की अगुआई में जीत गई तो फिर अगले प्रधानमंत्री के लिए योगी मोदी पर भारी पड़ेंगे। इसलिए येन-केन-प्रकारेण योगी के पर काटना मोदी की प्राथमिकता है। योगी के विरुद्ध एक आरोप तो यह है कि उन्होंने प्रदेश में जम कर राजपूतवाद चलाया है इसलिए भाजपा का एक सॉलिड वोट-बैंक ब्राह्मण बहुत नाखुश है। लेकिन भाजपा के अंदर कोई क़द्दावर ब्राह्मण चेहरा नहीं है, जो पूरी दबंगई के साथ योगी को टक्कर दे सके। बिकरू कांड से लेकर हाथरस और अब अलीगढ़ कांड तक योगी की प्राथमिकता राजपूत अधिकारियों को बचाने की रही है। किंतु योगी के ख़िलाफ़ प्रदेश में कोई खुल कर सामने नहीं आया। उत्तर प्रदेश मूल के और गुजरात कैडर के आईएएस अरविंद शर्मा को उत्तर प्रदेश विधान परिषद में भिजवा कर मोदी ने सोचा था, कि योगी के समानांतर वे अरविंद शर्मा को खड़ा कर लेंगे। लेकिन अफ़सरी अलग विधा है और राजनीति अलग। अरविंद शर्मा को कोई सपोर्ट नहीं मिला और वे टाँय-टाँय फिस्स रहे। ऐसे में भाजपा को लगा होगा कि कांग्रेस से किसी ब्राह्मण चेहरे को सामने लाया जाए और इसी रणनीति के तहत जितिन प्रसाद को लाया गया।  लेकिन जितिन प्रसाद को ख़ुद को ब्राह्मण साबित करना बहुत मुश्किल है। जितिन प्रसाद की न तो पत्नी ब्राह्मण हैं, न माँ न ही दादी। उनकी स्थिति ब्राह्मणों के बीच वैसी ही है जैसी राहुल गांधी की। हालाँकि राहुल गांधी की दादी ब्राह्मण थीं। जितिन प्रसाद का सरनेम सिंह है, जो राजपूत होने का संकेत देता है। उनके मामा हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह हैं। इस तरह वे कौन-से ब्राह्मण चेहरे होंगे। उत्तर प्रदेश में जाति एक कड़वी सच्चाई है। वह धार्मिक एकता से ऊपर है। अगड़ी जातियों में यहाँ ब्राह्मणों और राजपूतों में भारी टकराव रहता है। एक तो संख्या भी आसपास और ताक़त भी बराबर की। कोई किसी का दबैल नहीं। यह सच है कि मुलायम-अखिलेश और मायावती के समय ये ठाकुर-ब्राह्मण पावर बैलेंसिंग का खेल खेलते हैं। उस समय में वे अपनी संख्या के हिसाब से हिस्सा माँग कर इधर या उधर सेट हो जाते हैं। किंतु कांग्रेस व भाजपा के समय इन जातियों को लगता है कि ये अपने दबाव से सत्ता पा सकती हैं। 1989 के बाद से यहाँ कांग्रेस साफ़ हो गई और भाजपा ने पाँच बार सरकार बनाई। पहले 1991 में, तब विधान सभा में भाजपा को बहुमत मिला लेकिन सोशल इंजीनियरिंग के फ़ार्मूले के तहत पिछड़े समुदाय के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। इसके बाद तीन बार मायावती के साथ मिली-जुली सरकार बनी, उसमें एक बार कल्याण सिंह, एक बार रामप्रकाश गुप्ता और फिर एक बार राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने। 2017 में जब भाजपा प्रचंड बहुमत से विधानसभा में आई तब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इस तरह से पिछले 32 वर्षों से उत्तर प्रदेश में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना। उसके आख़िरी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी थे, जो कांग्रेस सरकार में थे।  यूँ भी जब कोई ग़ैर राजनीतिक व्यक्ति सरकार चलाएगा तो वह उन्हीं लोगों से घिरेगा, जो उसकी बिरादरी के होंगे। योगी उन लोगों से घिरते रहे, जिनके लिए बिरादरी के अतिरिक्त और कुछ नहीं। नतीजा यह हुआ कि ब्राह्मण अभी बीजेपी के साथ है लेकिन योगी से उसका मोह भंग हुआ है। अब भले ऊपरी तौर पर उत्तर प्रदेश में मुख्य सचिव और डीजीपी ब्राह्मण हो लेकिन सब को पता है कि सूत्रधार कोई और है। शायद अपनी इसी छवि को दुरुस्त करने के लिए योगी सरकार ने प्रदेश में मुख्य चुनाव आयुक्त अनूप पांडेय को बनाया है। लेकिन सच बात यह है कि शासन को नीचे तक ले जाने का काम डीएम-एसपी का होता है और उसमें अधिकतर संख्या एक ख़ास बिरादरी के अफ़सरों की है। यह अफ़सरशाही का फ़ेल्योर है कि अलीगढ़ में ज़हरीली शराब से 117 लोगों के मरने की सूचना है किंतु कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। इसी तरह गंगा में जब लाशें मिलीं तो गंगा तटवर्ती ज़िलों के अधिकारियों से पूछताछ नहीं हुई।  ऐसे में जितिन प्रसाद का पटाखा भाजपा के लिए ऐसी सीली हुई बारूद है जो उसके ही हाथों में फट सकती है। योगी उत्तर प्रदेश की नैया पार नहीं करवा सकेंगे और जितिन प्रसाद के पास अपना कोई वोट बैंक नहीं है। उधर पिछड़ा वोट बैंक अब योगी द्वारा केशव मौर्या की उपेक्षा के चलते फिसल गया है। जब वोट नहीं हैं तो मोदी किसके बूते अब 2024 की तैयारी करेंगे। हिंदू-मुस्लिम कार्ड की असलियत भी लोग समझ चुके हैं। योगी बस इतना अर्दब में आए कि वे दिल्ली आकर शाह और मोदी से मिल लिए।  

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गजल गायक मेहंदी हसन का भारत से विशेष लगाव रहा था। उन्हे जब भी भारत आने का मौका मिलता वे दौड़े चले आते थे। राजस्थान में शेखावाटी की धरती उन्हें....

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Chor-chor mausere bhaee: चोर-चोर मौसेरे भाई

सन् १९८५ में ५२वें संविधान संशोधन ने राजनीतिक दलों के मुखिया को अपने द लके अंदर सर्वशक्तिमान बना डाला जिसने पार्टी सुप्रीमो की अवधारणा को जन्म दिया। "आयाराम, गयाराम" कीघटनाएंनहों,....

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The need for extreme caution in foreign policy: विदेश नीति में अत्यधिक सतर्कता की जरूरत

मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं कि विदेश नीति के मामलों को ब्लैक एंड व्हाइट में नहीं बल्कि भूरे रंग के रंगों में....

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To protect the environment, it is necessary to control the disorderly development that destroys nature! पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्रकृति का विनाश करने वाले अव्यवस्थित विकास पर नियंत्रण जरूरी!

ज़िंदगी में साँस लेने के लिए स्वच्छ प्राण वायु यानी ऑक्सीजन की क्या अहमियत होती है, यह बात अधिकांश देशवासियों को कोरोना की बेहद भयावह दूसरी लहर ने अपना प्रचंड....

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On 7 June 1893, Gandhi laid the foundation of the movement against apartheid:7 जून 1893, गांधी ने नस्लभेद के विरुद्ध आंदोलन की नींव रखी थी

इतिहास में कुछ तारीखें इतिहास और मानव चिंतन की धाराएं बदल कर रख देती हैं। ऐसी ही तारीखों में आज 7 जून की तारीख भी है, जब दक्षिण अफ्रीका के एक अज्ञात रेलवे....

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How was FY 2021 amid Corona pandemic? कोरोना महामारी के बीच कैसा रहा वित्त वर्ष 2021?

साल था 1979 का,भारत का  अधिकांश हिस्सा भयंकर सूखे की चपेट में था। दूसरी तरफ ईरानी क्रांति के कारण खाड़ी देशों में तनाव था। जिसके कारणवशआपूर्ति में व्यवधान ने कच्चे....

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It is necessary to clear the misconceptions of Central Vista Project: सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की भ्रांतियों को दूर करना जरूरी

भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सेंट्रल विस्टा परियोजना के मामले में आठ महीनों तक हुईं 28 सुनवाईयोंके बाद, 5 जनवरी 2021 को परियोजना के लिए मंजूरी दे दी। न्यायालय....

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Statesman builds the nation! स्टेट्समैन राष्ट्र बनाता है!

राष्ट्रीय सांख्यकी मंत्रालय के मुताबिक 2020-21 के वित्तीय वर्ष में जीडीपी 135 लाख करोड़ रही, जो पिछले साल 145 लाख करोड़ थी। इस वक्त हमारे देश की जीडीपी -7.3 फीसदी....

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world environment day special-विश्व पर्यावरण दिवस विशेष- प्रकृति के साथ छेड़छाड़़ का मतलब जीवन के साथ खिलावाड़ -राजेश कश्यप

नगरों-महानगरों में पर्यावरण प्रदूषण के कारण सांस लेना दूभर होता चला जा रहा है। कोरोना काल में आक्सीजन का संकट असंख्य जिन्दगियां लील रहा है। दिनोंदिन पृथ्वी गरम होती चली....

mamta alapan

Mamta, Modi and Front! ममता, मोदी और मोर्चा!

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के अहम पर चोट की है। मुख्य सचिव आलापन वंद्योपाध्याय को न तो रिलीव किया और न उनके सेवा काल को एक्सटेंड करने का दोबारा अनुरोध किया। बल्कि उन्हें रिटायर हो जाने दिया और इधर रिटायरमेंट उधर ममता की तरफ़ से उनको विशेष सलाहकार का दर्जा। अर्थात् एक तरह से ममता ने मोदी को अंगूठा दिखा दिया है। दरअसल 1987 बैच के आईएएस आलापन वंद्योपाध्याय 31 मई को रिटायर हो जाने वाले थे। किंतु कोरोना की सेकंड वेव को देखते हुए उन्हें तीन महीने का एक्सटेंशन केंद्र की मंज़ूरी के मिला था। पर इसी बीच यास तूफ़ान के बाद राहत पैकेज हेतु कोलकाता में 28 मई को हुई प्रधानमंत्री की बैठक में न तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गईं न मुख्यसचिव आलापन वंद्योपाध्याय। अब केंद्र सरकार ममता से तो ऊँचा बोल नहीं सकती लेकिन अखिल भारतीय स्तर के अधिकारियों की नकेल केंद्र के पास होती है इसलिए तत्काल केंद्रीय गृह मंत्रालय के विभाग डीओपीटी (डायरेक्टोरेट ऑफ़ पर्सोंनल एंड ट्रेनिंग) ने आलापन को दिल्ली आकर जॉयन करने का निर्देश दिया। मालूम हो कि 1954 में बने एक क़ानून की धारा छह बटा एक के तहत केंद्र को यह अधिकार है। वहीं 1969 में बने एक क़ानून की धारा सात के तहत केंद्र में प्रतिनियुक्ति के पूर्व उस अधिकारी को राज्य सरकार से अनुमति लेनी भी आवश्यक है। ममता बनर्जी ने अनुमति नहीं दी। आलापन ने 31 मई को अपना रिटायरमेंट लिया और ममता ने उनके नुक़सान की भरपायी कर दी। अब केंद्र बुरी तरह भंनया हुआ है। पहली बार किसी राज्य सरकार ने ‘सर्वशक्तिमान’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुरी तरह मात दी है।  अगर हम इस तरह की बौखलाहट के पीछे के अहंकारों को देखें, तो कुछ-कुछ अंदाज़ा होगा। मानव मनोविज्ञान को समझना हर एक के वश की बात नहीं होती। इसके लिए काफ़ी उदार-चरित यानी बड़े दिल वाला होना पड़ता है। राजनेताओं में वही सफल समझा जाएगा, जिसे मानव मनोविज्ञान समझने में महारत हो। शायद इसीलिए पहले के शासकों को शतरंज के खेल में बहुत रुचि होती थी। प्रतिद्वंदी को कहाँ कैसे गिराना है, यह एक माहिर खिलाड़ी ही समझ सकता है। माहिर वह जो प्रतिद्वंदी कि अगली चाल को ताड़ ले। उसे पता होना चाहिए कि उसकी क्रिया की प्रतिक्रिया क्या होगी। लेकिन इसमें भी चतुर वह जो बिना अपने मनो-विकार व्यक्त किए चाल को अपने पक्ष में कर ले। हम इसीलिए अशोक और अकबर तथा जवाहर लाल नेहरू को बड़ा कहते हैं, कि उन्होंने बिना अनावश्यक रक्त-पात के माहौल अपने अनुकूल किया। इसके लिए किसी एकेडेमिक डिग्री की ज़रूरत नहीं पड़ती, इसके लिए अनुभव ही बहुत है।  अब इसमें कोई शक नहीं कि सत्तारूढ़ भाजपा शतरंज के शह और मात में माहिर है लेकिन मानव मनोविज्ञान समझने में मूढ़।क्योंकि उसकी हर चाल प्रतिद्वंदी को उत्तेजित करने में होती है। और इस तरह वह ध्रुवीकरण की राजनीति करती है। मगर अपने इस खेल में वह ममता बनर्जी से मात खा रही है। ममता बनर्जी उत्तेजित होती हैं और फिर ऐसा क़रारा जवाब देती हैं कि भाजपा और उसके प्रधानमंत्री चारों खाने चित! भाजपा को लगता है कि वह इसे प्रधानमंत्री के पद का अपमान के तौर पर प्रचारित करेगी और इसे भुना लेगी। लेकिन वह भूल जाती है, कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। ताज़ा मामला 28 मई का है। प्रधानमंत्री यास तूफ़ान से हुए नुक़सान का सर्वे करने ओडीसा और पश्चिम बंगाल गए। दोनों राज्यों की राजधानियों में वहाँ के मुख्यमंत्रियों तथा अधिकारियों के साथ उन्होंने आपात बैठक भी की। कोलकाता में हुई बैठक में नेता विपक्ष शुभेंदु अधिकारी तथा वहाँ के गवर्नर भी बुलाए गए। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर आपत्ति की और वे मीटिंग में नहीं गईं। वे आधा घंटे बाद अपने मुख्य सचिव आलापन वंद्योपाध्याय के साथ प्रधानमंत्री से मिलने पहुँचीं और उन्हें 10 हज़ार करोड़ के राहत पैकेज को देने की एक अर्ज़ी पकड़ा कर वापस लौट गईं।  भाजपा इसे प्रधानमंत्री पद का अपमान बता रही है। और इस बहाने ममता पर हमलावर है। उधर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि भाजपा राहत के बहाने राजनीति कर रही है क्योंकि आपदा में अवसर तलाशना उसकी सिफ़त है। अब पूरा पश्चिम बंगाल राजनीति का अखाड़ा बन गया और भाजपा से पहली बार कोई ऐसा दल टकराया है जो तुर्की-ब-तुर्की जवाब देना जानता है। तृणमूल के नेता भी कोई मुरव्वत नहीं करते। इसीलिए भाजपा अब अपनी चाल में मात खाने लगी है। तृणमूल ने इस पूरे प्रकरण को प्रधानमंत्री बनाम मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मोदी बनाम ममता बना दिया है। लोगों में इससे संदेश गया है कि ममता ने मोदी को औक़ात दिखाई। नतीजा यह है कि भाजपा सरकार वहाँ की अफ़सरशाही पर शिकंजा कसने लगी। मुख्यसचिव आलापन वंद्योपाध्याय को दिल्ली बुलाए जाने का आदेश हुआ। उधर ममता सरकार अड़ गई और उन्हें केंद्र जाने की अनुमति नहीं दी। मुख्य सचिव का कार्यकाल बस 31 मई तक ही था। मुख्यसचिव आलापन वंद्योपाध्याय के भाई अंजन वंद्योपाध्याय, जो कि जाने-माने न्यूज़ एंकर थे, का पिछले दिनों कोरोना से निधन हो गया था। केंद्र ने उनकी व्यथा को भी नहीं समझा। इससे नौकरशाही हतोत्साहित होगी और वह काम करने की बजाय सदैव इस द्वन्द में पिसेगी कि वह राज्य का साथ दे या केंद्र का। ऐसा ही एक मामला प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय भी हुआ था। उस समय तमिलनाडु में जय ललिता मुख्यमंत्री थीं। तब द्रमुक के अध्यक्ष करुणानिधि के साथ एक आला पुलिस अधिकारी ने दुर्व्यवहार किया। उस पुलिस अधिकारी के ऊपर जय ललिता का हाथ था। मामला पीएमओ तक आया तो उस अधिकारी को दिल्ली बुलाया गया किंतु जय ललिता अड़ गईं और प्रधानमंत्री ने बीच-बचाव कर मामला शांत कर दिया। अधिकारी वहीं रहा। यह प्रधानमंत्री का बड़प्पन था। लेकिन आज प्रधानमंत्री से ऐसे बड़प्पन की उम्मीद नहीं की जा सकती। हालाँकि अखिल भारतीय सेवा (आचार) नियम,1954 व आईएएस काडर नियम, 1954 की धारा 6(1) के अनुसार केन्द्रीय कार्मिक, पेंशन व लोक शिकायत मंत्रालय को यह अधिकार है कि वह अखिल भारतीय सेवा के किसी भी अधिकारी को राज्य से केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर बुला सकता है। भाजपा के लोग तर्क देते हैं, कि यह प्रधानमंत्री का बड़प्पन है कि वे पश्चिम बंगाल विधानसभा भंग नहीं करते जबकि ममता अभी से नहीं पिछली सरकार के वक्त से ही प्रधानमंत्री का अपमान करती आई हैं। ऐसे कुतर्कों का एक जवाब तो यह है, कि अब ऐसा संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने बोम्मई मामले में ऐसी व्यवस्था दी थी कि किसी भी सरकार का फ़ैसला फ़्लोर पर ही होगा। दूसरे मोदी बनाम ममता विवाद में यह कैसे संभव है? यह तो दो नेताओं का पारस्परिक विवाद है। इस पर केंद्र सरकार अपनी किस विशेष शक्ति का प्रयोग करेगी?  सच बात तो यह है कि राजनीति अब क्षुद्र होती जा रही है और राजनेता असहनशील। यह केवल नेताओं के चुनावी भाषणों में ही नहीं दीखता बल्कि उनके सामान्य शिष्टाचार में भी दिखने लगा है। प्रतिद्वंदी राजनेता को येन-केन-प्रकारेण तंग करना अब एक सामान्य प्रक्रिया हो गई है। और इसकी वजह है राजनीति अब समाज केंद्रित नहीं, अपितु व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है। राजनीति अब लाभ का सौदा है, उसके अंदर से सेवा भाव और राजनय लुप्त हो चला है। राजनीति में मध्यम मार्ग अब नहीं बचा है। पारस्परिक विरोध का हाल यह है कि न केवल प्रतिद्वंदी को पछाड़ने के लिए एक-दूसरे के फालोवर के सफ़ाये का अभियान चलाया जाता है बल्कि जो दल सत्ता में होता है, वह सत्ता की धमक का इस्तेमाल कर विरोधी को हर तरह से तंग करता है। पहले यह उन राज्यों तक सीमित था, जहां धुर वामपंथी या दक्षिणपंथी सरकारें थीं। क्योंकि सफ़ाया-करण की थ्योरी ही उनकी है। पर अब यह केंद्र तक आ धमका है। कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग, सीबीआई जैसी संस्थाएँ भी केंद्र के इशारे पर काम करने लगी हैं। कहाँ तो केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी एक जमाने में लोकपाल बिल लाने की माँग करती थी और कहाँ आज वह सारी सांवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करने पर तुली है। अब स्थिति यह है कि उसके विरोधी दलों के अंदर भी यही चिंतन हावी है।  पश्चिम बंगाल और केरल को इस तरह की राजनीति का गढ़ समझा जाता था। पश्चिम बंगाल में। वहाँ पर नक्सलबाड़ी आंदोलन से उपजे विचार और उसके कार्यकर्त्ताओं का हिंसक कैडर की मदद से संहार किया गया था। पकड़-पकड़ कर मारा गया था। ठीक इसी तरह नब्बे के दशक में पंजाब की बेअंत सिंह सरकार ने आतंकवादियों को ख़त्म करने के नाम पर पुलिस को असीमित अधिकार दिए थे। याद करिए, वहाँ के पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल ने किस तरह नौजवानों को घर से घसीट-घसीट कर मार दिया था। युवा शक्ति का ऐसा संहार पहले कभी नहीं देखा गया था। यही हाल कश्मीर में हुआ। जिस किसी ने नागरिक स्वतंत्रता की माँग की, उसे मार दिया गया अथवा जेलों में ठूँस दिया गया। जब हमारे विपरीत विचार वाले लोगों का उत्पीड़न होता है, तब हम खुश होते हैं और सोचते हैं कि यह देश-हित में हो रहा है। नतीजा एक दिन सत्ता का कुल्हाड़ा हमारे सिर पर भी गिरता है और हम उफ़ तक नहीं कर पाते। तब हमें बचाने के लिए भी कोई नहीं होता क्योंकि व्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक आज़ादी की माँग करने वालों को तो हम खो चुके होते हैं। यही असहिष्णुता है।  यह असहिष्णुता राजनेता और राजनीतिक दलों में इस कदर पैठ गई है, कि अब वे जनता के मन को समझने में भी नाकाम हैं। 

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Congress should encourage youth leadership: कांग्रेस को चाहिए कि वह युवा नेतृत्व को प्रोत्साहित करे

किसी भी पार्टी की ताकत संगठन में युवा तत्वों को प्रेरित करने की उसकी क्षमता बड़े राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करना में निहित होती है। वहीं यह ठीक नहीं हो....

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Waiting for the results of BJP’s ocean churning, still confused!: भाजपाई समुद्र मंथन के नतीजों का इंतजार, अभी असमंजस !

उत्तर प्रदेश में सरकार और संगठन को लेकर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व से लेकर मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ तक क़रीब दस दिनों से समुद्र मंथन में जुटा है। लगातार....

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Are we going towards idiot ie kakistocracy? क्या हम मूढ़तंत्र यानी काकिस्टोक्रेसी की ओर जा रहे हैं ? 

हर तरफ गवर्नेंस की विफलता दिख रही है। महंगाई बढ़ रही है, महंगाई भत्ते कम हो रहे हैं, इलाज के अभाव में लोग मर रहे हैं। दो नए वायरस डेल्टा....

corona

Cases of Covid-19 can be reduced only by better preparation and vaccination: बेहतर तैयारी और टीकाकरण से ही घट सकते हैं कोविड-19 के मामले

मार्च 2021 में डॉक्टर की भविष्यवाणियां  है कि ‘अस्पताल के अंदर मरीजों की संख्या पिछले साल की तुलना में काफी कम होगी और मृत्यु दर में कमी आएगी’ बेहतर तैयारी....

india amarica

What Jaishankar’s US visit reveals about India-US relations: एस. जयशंकर की यूएस यात्रा भारत-अमेरिका रिश्तों के बारे में क्या बताती है

भारत में टीकों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति के संबंध में बिडेन प्रशासन भारत-अमेरिका संबंध तब जांच के दायरे में आए जब जोए की ओर से प्रतिबद्धता की कमी....

em foster

Letters from EM Forster:ईएम फोर्स्टर के पत्र

ई एम फोर्स्टर 20वीं सदी के महान उपन्यासकारों में से थे। उनका जन्म 1 जनवरी 1879 को हुआ था और 6 जून 1970 को 91 वर्ष की आयु में उनका....

cycles

Bicycle helping in distress: संकट में साथ निभाती साइकिल

साइकिल हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। बच्चे सबसे पहले साइकिल चलाना ही सीखते है। 3 जून 2018 को विश्व में पहला विश्व साइकिल दिवस मनाया गया। तब से दुनिया में प्रतिवर्ष साइकिल दिवस....

unemployment

There was a serious problem of employment! रोजगार की भीषण होती समस्या!

कभी अर्थविद् जॉन मेनार्ड केंज ने सिखाया था कि रोजगार ही मांग की गारंटी है, लोग खर्च तभी करते हैं जब उन्हें पता हो कि अगले महीने पैसा आएगा। पिछले....

INDIA-HEALTH-VIRUS

Corona: The medical field will have to be prepared according to the treatment of children!: कोरोना: बच्चों के इलाज के अनुसार करना होगा चिकित्सा क्षेत्र को तैयार!

कोरोना वायरस की दूसरी प्रचंड लहर ने भारत में शहर से लेकर गांव तक जमकर तांडव मचाया है। इस लहर ने भारत में उपलब्ध चिकित्सा क्षेत्र को ध्वस्त करके रख....

nehru ji

Nehru’s ideology is the need of the hour! समय की जरूरत है नेहरू की विचारधारा!  

“आज एक सपना खत्म हो गया है। एक गीत खामोश हो गया है। एक लौ हमेशा के लिए बुझ गई है। यह एक ऐसा सपना था, जिसमें भुखमरी, भय-डर नहीं था। यह....

democracy indian

Opposition should be respected in democracy: लोकतंत्र में विरोध को सम्मान मिलना चाहिए

राजनीति अब क्षुद्र होती जा रही है और राजनेता असहनशील। यह केवल नेताओं के चुनावी भाषणों में ही नहीं दीखता बल्कि उनके सामान्य शिष्टाचार में भी दिखने लगा है। प्रतिद्वंदी राजनेता को येन-केन-प्रकारेण तंग करना अब एक सामान्य प्रक्रिया हो गई है। और इसकी वजह है राजनीति अब समाज केंद्रित नहीं, अपितु व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है। राजनीति अब लाभ का सौदा है, उसके अंदर से सेवा भाव और राजनय लुप्त हो चला है। राजनीति में मध्यम मार्ग अब नहीं बचा है। पारस्परिक विरोध का हाल यह है कि न केवल प्रतिद्वंदी को पछाड़ने के लिए एक-दूसरे के फालोवर के सफ़ाये का अभियान चलाया जाता है बल्कि जो दल सत्ता में होता है, वह सत्ता की धमक का इस्तेमाल कर विरोधी को हर तरह से तंग करता है। पहले यह उन राज्यों तक सीमित था, जहां धुर वामपंथी या दक्षिणपंथी सरकारें थीं। क्योंकि सफ़ाया-करण की थ्योरी ही उनकी है। पर अब यह केंद्र तक आ धमका है। कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग, सीबीआई जैसी संस्थाएँ भी केंद्र के इशारे पर काम करने लगी हैं। कहाँ तो केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी एक जमाने में लोकपाल बिल लाने की माँग करती थी और कहाँ आज वह सारी सांवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करने पर तुली है। अब स्थिति यह है कि उसके विरोधी दलों के अंदर भी यही चिंतन हावी है। पश्चिम बंगाल और केरल को इस तरह की राजनीति का गढ़ समझा जाता था। क्योंकि दोनों जगह धुर वामपंथी सरकारें बहुत पहले से आ गई थीं। ख़ासकर पश्चिम बंगाल में। वहाँ पर नक्सलबाड़ी आंदोलन से उपजे विचार और उसके कार्यकर्त्ताओं का मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नीत वाममोर्चा सरकार के नेताओं ने पुलिस और अपने हिंसक कैडर की मदद से संहार किया था। पकड़-पकड़ कर मारा था। ठीक इसी तरह नब्बे के दशक में पंजाब की बेअंत सिंह सरकार ने आतंकवादियों को ख़त्म करने के नाम पर पुलिस को असीमित अधिकार दिए थे। याद करिए, वहाँ के पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल ने किस तरह नौजवानों को घर से घसीट-घसीट कर मार दिया था। युवा शक्ति का ऐसा संहार पहले कभी नहीं देखा गया था। यही हाल कश्मीर में हुआ। जिस किसी ने नागरिक स्वतंत्रता की माँग की, उसे मार दिया गया अथवा जेलों में ठूँस दिया गया। जब हमारे विपरीत विचार वाले लोगों का उत्पीड़न होता है, तब हम खुश होते हैं और सोचते हैं कि यह देश-हित में हो रहा है। नतीजा एक दिन सत्ता का कुल्हाड़ा हमारे सिर पर भी गिरता है और हम उफ़ तक नहीं कर पाते। तब हमें बचाने के लिए भी कोई नहीं होता क्योंकि व्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक आज़ादी की माँग करने वालों को तो हम खो चुके होते हैं। यही असहिष्णुता है। दुःख है कि अब यह केंद्रीय सत्ता कर रही है और उन सब लोगों को किसी न किसी तरह जेल ठूँस रही है, जिनके साथ उसकी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता है। राज को स्थायी बनाए रखने के ये चालू नियम हैं। जो हिटलर ने अपनाए थे, इंदिरा गांधी ने अपनाए थे और आज मोदी अपना रहे हैं। अर्थात् सरकार अपनी शक्तियों का इस्तेमाल अपने विरोधियों पर करना उचित मानती है। अभी पिछले महीने हुए चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल में बुरी तरह हार गई, जबकि बंगाल का क़िला फ़तेह करने के लिए उसने पूरी ताक़त लगा दी थी। ममता बनर्जी ने फिर से सरकार बना ली और वह भी प्रचंड बहुमत के साथ। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को विधान सभा चुनाव में 214 सीटें मिलीं और भाजपा को 76 तथा कांग्रेस और माकपा को एक-एक। वहाँ विधानसभा में 294 सीटों पर चुनाव होते हैं और अब तक की परंपरा के अनुसार एक सीट एंग्लो-इंडियंस के लिए आरक्षित है। इस बार 292 सीटों पर मतदान हुआ था, क्योंकि दो सीटों पर उम्मीदवारों की कोरोना के चलते मृत्यु हो गई थी, यहाँ अब बाद में चुनाव करए जाएँगे। पश्चिम बंगाल में ममता को परास्त करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने पूरी ताक़त लगा दी थी। पिछले विधान सभा चुनाव (2016) के बाद से ही वहाँ कैलाश विजयवर्गीय की नियुक्ति कर दी गई थी, ताकि पाँच साल बाद आने वाले चुनाव में ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेंका जाए। भाजपा ने दो साल पहले से ही सघन प्रचार अभियान शुरू कर दिया था। और 2021 की फ़रवरी में जैसे ही केंद्रीय चुनाव आयोग ने वहाँ विधान सभा चुनाव की घोषणा की तत्काल केंद्र की मोदी सरकार ने कोविड के सारे प्रोटोकाल तोड़ कर सघन प्रचार अभियान शुरू कर दिया था। जबकि ममता अकेली थीं। कांग्रेस और वाम दलों ने उनसे दूरी बना रखी थी। बल्कि वे स्वयं ममता बनर्जी के विरुद्ध मोर्चा खोले थे। इसके बावजूद ममता ने इस चुनाव में भारी सफलता अर्जित कर ली। भाजपा को यह सहन नहीं हुआ। नतीजा, उधर ममता सरकार बनी इधर केंद्र सरकार की सारी शक्तियाँ ममता के उत्पीड़न में लग गईं। पहले तो वहाँ के राज्यपाल ने हिंसा को लेकर राजनीतिक बयान देने शुरू किए। उन्होंने वहाँ के दौरे भी शुरू कर दिए, जहां हिंसा हुई और ममता को बार-बार अनावश्यक कोंचने लगे कि उन्हें हिंसा रोकने को वरीयता देनी चाहिए। इशारे-इशारे में वे ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के कैडर को इस हिंसा का ज़िम्मेवार बता रहे थे। इसके बाद सरकार बने अभी एक सप्ताह भी नहीं गुजरा था कि सीबीआई ने ममता सरकार के दो मंत्रियों और कुछ बड़े नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया। अब इस पर कितनी भी लीपा-पोती की जाए, कोई भी यह नहीं मानेगा कि यह गिरफ़्तारी सीबीआई ने किसके इशारे पर की होगी। हर एक को पता है, कि सीबीआई किसका ‘तोता’ होता है। ममता बनर्जी चूँकि संघर्ष के बूते ही मुख्यमंत्री बनी हैं। 2010 में उन्होंने पश्चिम बंगाल में 34 वर्ष से सत्तारूढ़ वाम मोर्चे की सरकार को उखाड़ फेंका था। यह कोई आसान काम नहीं था। वे सड़कों पर उतरीं। माकपा राज ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया। उन पर हमले करवाए और जिस कांग्रेस पार्टी में वे थीं, उसके नेताओं ने उनसे किनारा कर लिया। तब 1997 में में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनायी और अपने बूते उसको गाँव-गाँव फैलाया। कैडर बनाए। नतीजा सामने है, ममता बनर्जी तीसरी बार लगातार मुख्यमंत्री ही नहीं बनीं बल्कि केंद्रीय सत्ता को ही चुनौती दे दी है। यही बात भाजपा को बेचैन किए है क्योंकि उनका क़द अब केंद्र से टकराने का हो गया है। अब जिस नारद कांड में उनके मंत्रियों को गिरफ़्तार किया गया वह दरअसल पाँच वर्ष पुराना एक स्टिंग आपरेशन है, जिसे नारद डॉट काम पोर्टल के मैथ्यू सैमुअल ने किया था और इसमें उस वक्त कुछ लोगों को पैसा लेते हुए दिखाया गया था। कहा गया था, कि ये लोग फिरहाद हाकिम, सुब्रत मुखर्जी हैं। इस पर हंगामा हुआ और मामला हाई कोर्ट पहुँचा। तब हाई कोर्ट ने जाँच सीबीआई को सौंपी। सीबीआई ने पिछले हफ़्ते 17 मई को ममता सरकार के दो क़ाबीना मंत्रियों- परिवहन मंत्री फिरहाद हाकिम और पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी तथा एक विधायक मदन मित्रा एवं पूर्व मेयर शोभन चटर्जी को गिरफ़्तार कर लिया। ममता ग़ुस्से में आकर कोलकाता के सीबीआई दफ़्तर के सामने धरने पर बैठ गईं। तब हाई कोर्ट ने इन लोगों को हाउस अरेस्ट (घर पर नज़रबंद) करने के आदेश दिए। सीबीआई हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट पहुँची। सुप्रीम कोर्ट ने 25 मई को आदेश दिए कि हाई कोर्ट के फ़ैसले पर वह कोई टिप्पणी नहीं करेगी अतः सीबीआई को हाई कोर्ट के निर्देश मानने होंगे। अलबत्ता उसने ममता बनर्जी के आचरण की निंदा की और कहा कि मुख्यमंत्री को क़ानून की रक्षा करनी चाहिए। उन्हें सीबीआई को अपना काम करने से रोकने का अधिकार नहीं है। लेकिन साथ ही सीबीआई को यह मामला अब बंगाल में ही चलाना होगा। बंगाल से बाहर ले जाने का मामला ख़ारिज हो गया। आमतौर पर सीबीआई थुक्का-फ़ज़ीहत से बचने के लिए ऐसे मामले मनचाहे स्थानों पर ट्रांसफर करवा लेती है, ताकि स्थानीय विरोध का सामना उसे नहीं करना पड़े। लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट ने इसमें दख़ल देने से मना कर दिया। अकेले पश्चिम बंगाल ही क्यों, महाराष्ट्र और झारखंड भी केंद्र की इस भेदभाव पूर्ण और बदले की कुटिल नीति के शिकार हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को घेरने की कोशिश रोज़ की जाती है। उनके बेटे आदित्य ठाकरे के विरुद्ध जाँच का मामला है ही। इसी तरह कोरोना के मामले में केंद्र की मोदी सरकार ने ग़ैर भाजपाई सरकारों के साथ भेदभाव किया। पहले तो सारी व्यवस्थाएँ केंद्र ने स्वयं अपने हाथ में लीं, उसके बाद टीकों से लेकर लॉक डाउन तक का मामला राज्यों के मत्थे मढ़ दिया गया। तमिलनाडु, आंध्र, तेलंगाना, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान और पंजाब तक सभी ग़ैर भाजपाई सरकारें परेशान हैं। देश में को-वैक्सीन तथा कोवि-शील्ड का उत्पादन पर्याप्त नहीं है। और उस पर भी आधी सप्लाई केंद्र अपने हाथ में रखती है। उधर ग्लोबल टेंडर निकाले जाने के बावजूद विदेशी कंपनियाँ राज्यों के साथ कोई सौदा करना नहीं चाहतीं क्योंकि उसमें तमाम तकनीकी अड़चनें हैं। इसके अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को केंद्र सरकार ने इतना कमजोर कर दिया है, कि उनकी स्थिति एक नगर प्रमुख जैसी हो गई है। केंद्र की मोदी सरकार को बदले की राजनीति खूब सूट करती है।

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In UP only the questions of the loved ones – BJP is in trouble! उत्तरकथा :  यूपी में अपनों के ही सवाल – भाजपा बेहाल !

उत्तर प्रदेश में कोरोना के कष्टकाल में उपजे हाहाकार, घरों से लेकर सड़क तक चीत्कार,  नदियों में उतराती लाशें और अस्पतालों में बेड आक्सीजन के लिए हुयी मारामारी ने न....

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Catastrophic disaster! Will public health be a priority for the government? भयावह आपदा! जन स्वास्थ्य, सरकार की प्राथमिकता में आएगा ?

कोरोना महामारी की इस दूसरी लहर ने जो तबाही मचाई है और जिस प्रकार से तीसरी लहर की आशंका व्यक्त की जा रही है, उसे देखते हुए यह अपरिहार्य हो....

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Modi government’s PM Kisan Yojana and self-reliant India: मोदी सरकार की पीएम किसान योजना और आत्मनिर्भर भारत

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‘Seva Parmo Dharma’ or crime? ‘सेवा परमो धर्म’ या अपराध?

2015 में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम मामूली सा कम होने का श्रेय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेने के इच्छुक थे, तभी उन्होंने स्वयं को 'नसीब वाला '....

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Why accuse Yogi of spreading hatred: योगी पर क्यों लगते हैं नफरत फैलाने के आरोप

सहस्राब्दियों से चली आ रही शिक्षाएँ इंगित करती हैं कि  शिक्षाओं में बलिदान (त्याग) की अवधारणा है प्राचीन भारत के संत केवल उन कुछ लोगों के लिए प्रासंगिक थे जिन्होंने....

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Twitter quarrel on toolkit: टूलकिट पर अब ट्विटर से तकरार

इसे ही कहते हैं शर्माई बिल्ली खंभा नोचे। इस कोरोना काल में केन्द्र सरकार की हो रही कथित बदनामी को कांग्रेस से जोड़कर देखने वाली भाजपा को ट्विटर ने करारा....

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Religion teaches humanity not opportunism! मौकापरस्ती नहीं, मानवता सिखाता है धर्म! 

“अगर मुमकिन हुआ होता, बुझाकर रख लिया होता, अमीरों ने कहीं सूरज छुपाकर रख लिया होता”। हमारे मित्र अशोक रावत की गजल की ये पंक्तियां और डॉ रूपचंद्र शास्त्री की गजल, “ये गद्दार मेरा....

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Transparency and accountability: पारदर्शिता और जवाबदेही

अस्सी के दशक की बात है, मैं कानपुर में एक मित्र के पास गया हुआ था। मेरे उन मित्र का छोटा भाई पीडब्ल्यूडी-बीएंडआर में ठेकेदारी करता था। मेरे मित्र के....

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Suggestions regarding the improvement of cremation grounds: शमशान घाटों के सुधार बारे सुझाव

20 मई के आज समाज में मैंने एक लेख-  ‘कोरोना  और शमशान घाटों की समस्याएं’ के माध्यम से कोविड महामारी के दौरान मृतकों के संस्कार के काम में कई गुना....

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The world after lockdown! लॉकडाउन के बाद की दुनियां!

अशोक जी 70 के करीब हैं, लेकिन बहुत ही फुतीर्ले और उत्साही पत्रकार रहे हैं और आज भी लिखते-पढ़ते रहते हैं। कल फोन आया तो बताने लगे कि घुटने एकदम....

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 Pink picture of figures and statements of dead bodies in rivers! उत्तरकथा – आंकड़ों की गुलाबी तस्वीर और नदियों में उतराती लाशों के बयान !

इधर एक पखवारे के दौरान यूपी के हमीरपुर, बलिया, गाजीपुर और उन्नाव में यमुना और गंगा में बहती लाशों के ढेर नजर आए हैं। उन्नाव में गंगाघाट पर हर रोज....

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Will help in strengthening the capacity of the economy: अर्थव्यवस्था की क्षमता को फिर से मज़बूत बनाने में मिलेगी मदद

अगर संक्रमण के प्रसार को नियंत्रित करने की प्रबल क्षमता हो तो बड़े पैमाने पर निर्माण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को जारी रखने की स्थिति को भी बल मिलता है।....

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A letter from Han suyin: हॉन सुयिन का एक पत्र

मैं आज 92 साल का हो गया हूं। अपने जीवन के पिछले 70 वर्षों में, मैंने इंदिरा गांधी, ई.एम. से प्राप्त पत्रों को संरक्षित किया है। फोर्स्टर, द पैसेज टू....

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Two Economies and Their Perspectives! दो अर्थव्यवस्थाएं और उनका दृष्टिकोण!

2014 में नरेंद्र मोदी मिनिमम गवर्नमेंट, अधिकतम गवर्नेंन्स के नारे के साथ सत्ता में आए थे। और 2019 के बाद से, प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका को कम....

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Corona vaccination: a big challenge in front of the government! कोरोना टीकाकरण: सरकार के सामने बड़ी चुनौती!

‘हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम। तू क्यों सोचे बंदे सब की सोचे राम॥’ हमारे देश में रोजमर्रा में बोली जाने वाली उपरोक्त कहावत हमें विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में....

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The second wave of the epidemic can bring horrific unemployment.: महामारी की दूसरी लहर, भयावह बेरोजगारी ला सकती है. 

आर्थिकी के प्रभाव का अंदाज़ा तुरन्त नही होता है, बल्कि यह समय लेता है। मार्च 2020 के तीसरे हफ्ते में एक दिन का ताली थाली मार्का लॉक डाउन लगा था तो वह एक....

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Fear of ‘talk’ amid Corona epidemic: कोरोना महामारी के बीच ‘तौकते’ का खौफ

एक ओर जहां पूरा देश कोरोना महामारी की दूसरी लहर के कहर से जूझ रहा है, वहीं एक और बड़ी आफत परेशानी का सबब बनने आ रही है। दरअसल अरब....

isreal

Where does so much hate come from? इतनी नफरत कहां से आती है?

मध्य एशिया क्षेत्र में इस्राईल व फिलिस्तीनियों के मध्य छिड़ा संघर्ष इन दिनों खतरनाक दौर में प्रवेश करता जा रहा है। जहाँ फिलिस्तीनियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले लड़ाकू....