संपादकीय

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India should learn from Duterte’s unfamiliar love: भारत को डुटर्टे के अपरिचित प्रेम से सीखना चाहिए

फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटर्टे में आत्मविश्वास की कमी नहीं है लेकिन उनके अपने दोष हो सकते हैं। तो यकीन है कि वह अपने आकर्षण का प्रेरक प्रभाव था कि....

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The problem of refugees becomes serious: होती शरणार्थियों की समस्या

म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद सीमा पार से भाग कर मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर आने वाले शरणार्थियों की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। लेकिन केंद्र....

mamata modi

Breaking the limits are Sad for all of us ! मर्यादाएं टूटना हम सभी के लिए दुखद!

अयोध्या में राममंदिर के लिए भूमि की अदालती लड़ाई जीतने के बाद वहां मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हम जब राम मंदिर बनाने की बात करते हैं, तो....

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Corona management is nowhere to be seen! कोरोना प्रबंधन कहीं नहीं दिखा!

अनिल अम्बानी के बेटे अनमोल अंबानी ने ट्वीट किया है, कि सरकार की लॉक डाउन पॉलिसी से छोटे उद्योग ख़त्म हो रहे हैं। इसका लाभ बड़े उद्योगपतियों को मिलता है।....

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Utterkaha: Orgy of deadly poisoning continues! उत्तरकथा :  जारी है जानलेवा जहरीली शराब का तांडव  !

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव आते ही गांव गांव में कच्ची लहन की खुशबू फैल गयी है। अवैध शराब का धंधा उफान पर है तो नशे को दुगना करने के....

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Such decisions are nothing less than a thunderclap: ऐसे फैसले किसी वज्रपात से कम नहीं

ऐसे फैसले लेते समय सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि इन बचत खातों में अधिकतर माध्यम वर्ग ही निवेश करता है। यही बचत उसके बुढ़ापे या बुरे समय की पूंजी....

vaccination

Question of vaccine supply in poor countries?: गरीब मुल्कों में वैक्सीन आपूर्ति का सवाल?

कोविड-19 की दूसरी लहर एक बार फिर सरकार और लोगों की चिंता बढ़ा दी है। भारत और दुनिया के दूसरे मुल्कों में यह पुन: तेजी से पांव पसार रहा है।....

success

Talent, order and results: प्रतिभा, व्यवस्था और परिणाम

हमारे देश में हर वह व्यक्ति जो पैसे खर्च सकता है, अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिल करवाता है ताकि उन्हें अच्छी शिक्षा मिल सके। प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले....

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Mamta’s post poll posting: ममता की पोस्ट पोल पोस्टिंग

एक दर्जन विपक्षी नेताओं को लिखकर, पश्चिम के चुनावों के दूसरे चरण की पूर्व संध्या पर बंगाल विधानसभा, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दूसरों को यह बताया है कि वह होंगी....

letter

My friend Sharda wrote a letter during the Emergency: आपातकाल के दौरान मेरे मित्र शारदा ने लिखा था खत

जब 26 जून 1975 को आपातकाल घोषित किया गया था, मैं उप उच्चायुक्त था। मैं संपर्क में रहा मेरे करीबी दोस्त एचवाई शारदा प्रसाद, प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार थे 20....

kisan

Silence towards public movements in Lokshahi can make the movement violent: विमर्श – लोकशाही में जनआंदोलनों के प्रति चुप्पी आंदोलन को हिंसक बना सकती है.

भोजपुरी में नजरअंदाजी के लिये एक शब्द है, महठियाना। यानी चीजें सामने घट रही हैं, सुनाई दे रही है, फिर भी मूँदहू आंख कतहु कुछ नाहीं के भाव से, उसे....

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Corona spoiled the health of teenagers: कोरोना ने बिगाड़ी टीनएजर्स की सेहत

कोरोना वायरस ने समाज के हर तबके को संकट में डाल रखा है। बच्चे से बुजुर्ग तक इससे आहत है। कई वैश्विक अध्ध्य्यन रिपोर्टों में बताया गया है की कोरोना....

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Farmers movement takes action: अंगड़ाई लेता किसान आंदोलन

भारत सरकार व किसानों के प्रतिनिधियों के मध्य 22 जनवरी को हुई ग्यारहवें दौर की अंतिम वार्ता के भी विफल होने तथा उसके बाद 26 जनवरी को दिल्ली में किसानों....

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Conflict of 1962: Rift in friendship between India and China rar: 1962 का संघर्ष: भारत-चीन रार से बढ़ी दोस्ती में दरार

मुसीबत के समय में दोस्ती को परखा जाता है। 1962 में चीन-भारतीय संघर्ष में, सहायता के प्रस्ताव आए पीएलए ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री के भ्रम को समाप्त....

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kuhaase ke aar aur paar ; कुहासे के आर और पार

पिछले दिनों अपनी झारखंड यात्रा के दौरान मैंने पाँच दिन लातेहार ज़िले में बिताए। लातेहार में नक्सली गतिविधियाँ रही हैं और आज भी वहाँ के जंगल में ऐसे लोग सक्रिय हैं। बेतला से महुआडाँड़ जाते समय जिस तरह की सशस्त्र आर्म्ड पुलिस मुझे दिखी, उससे यह तो प्रतीत हुआ कि यहाँ सब कुछ सामान्य नहीं है। कोयल नदी के चौड़े पाट और साफ़ पानी के बीच बने टापुओं में नहाते आदिवासियों ने मुझे देख कर आश्चर्य प्रकट किया, कि हम अनजाने लोग यहाँ क्यों आए? ज़मीन ख़रीदने के वास्ते या जंगल में रह रहे लोगों की टोह लेने के लिए। उन्होंने कहा, मैं थाने जाकर बात करूँ। थाने ख़ुद ही अर्धसैनिक बलों से घिरे हैं। थानों के चारों तरफ़ बीस फुट ऊँची कँटीली जाली लगी है। इसके बावजूद ज़िंदगी में चहल-पहल है। गाँव हैं, बस्तियाँ हैं और लोग-बाग रात-बिरात निकलते भी हैं। नक्सल को यहाँ और इसके आगे के छत्तीसगढ़ में आतंकवादी कहा जाता है। पाँच दशक से अधिक हो गए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से उपजे नक्सल आंदोलन को। वह ख़त्म भी हो चुका। लेकिन सरकारें उसकी छाया से मुक्त नहीं हो सकीं।  दरअसल हर राज सत्ता को आतंकवाद शब्द से बहुत प्रेम होता है। और सदैव वह अपने दायरे में इसे गढ़ती है। लेकिन आज तक कोई भी इसकी व्याख्या नहीं कर सका। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र ने भी इसकी कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं लिखी। 1973 में संयुक्त राष्ट्र में बस इतना लिखा गया है, ‘‘आतंकवाद एक आपराधिक कार्य है जो राज्य के खिलाफ किया जाता है और इसका उद्देश्य भ्रम पैदा करना है। यह स्थिति कुछ व्यक्तियों, समूहों या जन सामान्य की भी हो सकती है।’’ अर्थात् राज सत्ता के विरुद्ध आंदोलन आतंकवाद है। जबकि इसे स्वीकार करने को कोई भी तैयार नहीं है।  मज़े की बात कि यह अपराध विज्ञान का एक ज्वलंत विषय है। एक ऐसा विषय जिसको समझा कोई नहीं पता। यह चर्चा में खूब रहता है। दुनियाँ भर की मीडिया रोज़ाना बार-बार इस शब्द का प्रयोग करती है। किंतु क्या है आतंकवाद या क्यों है आतंकवाद अथवा कौन है आतंकवादी? इसकी कोई ग्लोबल परिभाषा नहीं है। एक का आतंकवाद दूसरे के लिए राष्ट्रभक्ति है। फिर यह विषय अपराध विज्ञान में क्यों रखा जाता है? यह तो सीधे-सीधे राजनीति विज्ञान का विषय हुआ। प्रति वर्ष लाखों करोड़ों रुपए आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए खर्च होते हैं, वैश्विक संधियाँ होती हैं। भारी मात्रा में आर्म्स-डील होती हैं। लेकिन आतंकवाद जस का तस बना रहता है। इसका मतलब तो यही हुआ, कि आतंकवाद व्यवस्था का प्रिय विषय है और राज सत्ताएँ स्वयं इसे गढ़ती हैं।  इस शब्द के बहुत ही सूक्ष्म रूप को देखें। चार महीने पहले जब केंद्रीय कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ दिल्ली के आसपास पंजाब और हरियाणा के किसानों ने सिंधु बॉर्डर पर डेरा डाला तो मीडिया ने प्रचार किया कि ये ख़ालिस्तानी उग्रवादी हैं। कुछ ने कहा कि ये सिख आतंकी हैं। चूँकि सिखों की पहचान स्पष्ट है, इसलिए अपने विचार के विरोधी सिख को आतंकवादी या उग्रवादी बना देना आसान है। यह स्थिति हर उस धर्म और समाज की है, जो विश्व के किसी भी देश में अल्प संख्या में है। ये सिख भी हो सकते हैं, मुस्लिम भी, ईसाई भी और हिंदू भी। अल्पसंख्यक होने की सबसे भीषण यातना तो यहूदियों ने झेली है। किंतु इस आधार पर तो आतंकवाद कोई परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकती।  हालाँकि ऐसा नहीं है कि सभी अपराध विज्ञानी, समाज विज्ञानी अथवा राजनीति शास्त्र के ज्ञाता इस पर चुप रहे हों। श्वाजनबर्गर के अनुसार, ‘‘एक आतंकी की परिभाषा उसके तत्कालीन उद्देश्य से की जाती है। आतंकवादी शक्ति का प्रयोग डर पैदा करने के लिए करता है और दुबारा वह उस उद्देश्य को प्राप्त कर लेता है जो उसके दिमाग में है।’’ जबकि रिचार्ड शुल्ज लिखता है- ‘‘आतंकवाद राजनीतिक व्यवस्था के अन्दर क्रांतिकारी परिवर्तन लेने के उद्देश्य से अलग-अलग प्रकार के राजनीतिक हिंसा प्रयोग में लाने की तैयारी है।’’ आधुनिक समय में सभी प्रकार की आतंकवादी कार्यवाही में हिंसा तथा हिंसा का भय एक अनिवार्य तत्व के रूप में होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि आतंकवाद कुछ निश्चित राजनीतिक परिवर्तन लाने के लिए हिंसा या हिंसा की धमकी के द्वारा पैदा किया गया भय है। ये दोनों परिभाषाएँ एक-दूसरे की पूरक भी हैं और उनमें परस्पर विरोधाभास भी खूब है। इस शब्द की इतनी अधिक परिभाषाएँ हैं, कि सब गड्ड-मड्ड करती हैं। जिनके अंतर्विरोध के चलते कोई अनुशासन या मापदंड तय नहीं होता।  दूसरी तरफ़ गुटनिरपेक्ष देशों के अनुसार ‘‘आतंकवाद एक ऐसी हिंसक कार्यवाही है जो व्यक्तियों के एक समूह द्वारा की जाती है जिससे मानवीय जीवन खतरे में होता है जो मौलिक स्वतंत्रताओं के लिए घातक होता है तथा जो एक राज्य एक समिति नहीं होता।’’ और इनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज बताता है, ‘‘आतंकवाद एक हिंसक व्यवहार है जो समाज या उसके बड़े भाग में राजनीतिक उद्देश्यों से भय पैदा करने के इरादे से किया जाता है। यह एक ऐसा तरीका है जिसके द्वारा एक संगठित समूह या दल अपने प्रकट उद्देश्यों की प्राप्ति मुख्य रूप से हिंसा के योजनाबद्ध उपयोग से करता है।’’ योनाह अलेक्जेण्डर के अनुसार, ‘‘आतंकवाद चुने हुए नागरिक विद्वानों के विरूद्ध हिंसा की कार्यवाही या उसकी धमकी है जिससे कि राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए भय का वातावरण बनाया जा सके।’’ इसके विपरीत अलेक्स स्मिथ लिखता है, कि ‘आतंकवाद हिंसा का या हिंसा की धमकी का उपयोग है, तथा लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष। लड़ाई की एक विधि व रणनीति है एवं अपने शिकार में भय पैदा करना इसका प्रमुख उद्देश्य है। यह क्रूर है और मानवीय प्रतिमानों का पालन नहीं करता। इसकी रणनीति में प्रचार एक आवश्यक तत्व है।’’ एम शेरिफ बेइयानी के अनुसार, ‘‘आतंकवाद एक गैर कानूनी हिंसा की रणनीति है जो कि उन सामान्य अथवा एक समूह में आतंक फैलाने के लिए अपनाई जाती है। जिसका उद्देश्य किसी निर्णय को लेने के लिए अथवा किसी बात को प्रसारित करने अथवा किसी कमी को उजागर करना हो।’’ ब्रिटेन के आतंकवाद निरोधक अधिनियम 1976 में आतंकवाद से अभिप्राय ‘‘राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग में लाई गई हिंसा से है जिसमें कि वह सभी तरह की हिंसा सम्मिलित है जिसका उद्देश्य जनता को या समुदाय विशेष को भयभीत करना है।’ अमेरिका का प्रतिरक्षा विभाग मानता है, ‘‘समाज या सरकार के खिलाफ गैर-कानूनी बल प्रयोग करना या ऐसा न करके केवल धमकी देना ही आतंकवाद है।’ जिन दिनों सिख आतंकवाद से प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश में हत्याएँ हुईं तब उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सरकुलर जारी किया था, उसमें कहा गया था कि किसी व्यक्ति या संगठित गुट द्वारा समाज या सरकार पर जोर-जबरदस्ती करने या धमकाने के उद्देश्य से, गैकानूनी तरीके से हिंसा का इस्तेमाल करना आतंकवाद कहलाता हैआतंकवाद एक सामूहिक अपराध है जो एक आतंकवादी समूह द्वारा किसी व्यक्ति विशेष के विरूद्ध न होकर एक व्यवस्था, धर्म, वर्ग या समूह के विरूद्ध होता हैआतंक फैलाने तथा मनोवैज्ञानिक युद्ध की स्थिति निर्मित करने की तकनीक ही आतंकवाद हैकई बार तो यह लगता है कि आतंकवाद एक ऐसा कुहासा है जिसके न आर भी वही है और पार भी वही है। बस अपनी नाकामियों को छिपाने का यह एक अस्त्र है। 

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Lies will put an end to all of us! झूठ हम सभी को खत्म कर देगा!

एडाल्फ हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ़ गोयबल्स ने कहा था कि किसी झूठ को इतनी बार बोलो कि वह सच बन जाये। सभी उसी पर यक़ीन करने लगें। नाजियों के....

Rajnikanth

Rajinikanth Award and Tamil Politics: रजनीकांत को अवॉर्ड और तमिल सियासत

हर बात और हर काम में राजनीति अच्छी नहीं लगती। इस तरह के हालात को देखकर यह प्रतीत होता है कि सरकारों व पार्टियों का काम सिर्फ चुनाव जीतने के....

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Employment will not be made in this way: ऐसे नहीं बनेंगे रोजगार

भरत झुनझुनवाला सरकार को रोजगार बनाने की दूसरी नीतियां लागू करनी चाहिए। अपने देश में बड़ी कम्पनी के लिए 'ऊर्जा आडिट' कराना जरूरी होता है जिससे कि शेयर धारकों को....

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kuhaase ke aar aur paar: कुहासे के आर और पार

पिछले दिनों अपनी झारखंड यात्रा के दौरान मैंने पाँच दिन लातेहार ज़िले में बिताए। लातेहार में नक्सली गतिविधियाँ रही हैं और आज भी वहाँ के जंगल में ऐसे लोग सक्रिय हैं। बेतला से महुआडाँड़ जाते समय जिस तरह की सशस्त्र आर्म्ड पुलिस मुझे दिखी, उससे यह तो प्रतीत हुआ कि यहाँ सब कुछ सामान्य नहीं है। कोयल नदी के चौड़े पाट और साफ़ पानी के बीच बने टापुओं में नहाते आदिवासियों ने मुझे देख कर आश्चर्य प्रकट किया, कि हम अनजाने लोग यहाँ क्यों आए? ज़मीन ख़रीदने के वास्ते या जंगल में रह रहे लोगों की टोह लेने के लिए। उन्होंने कहा, मैं थाने जाकर बात करूँ। थाने ख़ुद ही अर्धसैनिक बलों से घिरे हैं। थानों के चारों तरफ़ बीस फुट ऊँची कँटीली जाली लगी है। इसके बावजूद ज़िंदगी में चहल-पहल है। गाँव हैं, बस्तियाँ हैं और लोग-बाग रात-बिरात निकलते भी हैं। नक्सल को यहाँ और इसके आगे के छत्तीसगढ़ में आतंकवादी कहा जाता है। पाँच दशक से अधिक हो गए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से उपजे नक्सल आंदोलन को। वह ख़त्म भी हो चुका। लेकिन सरकारें उसकी छाया से मुक्त नहीं हो सकीं।  दरअसल हर राज सत्ता को आतंकवाद शब्द से बहुत प्रेम होता है। और सदैव वह अपने दायरे में इसे गढ़ती है। लेकिन आज तक कोई भी इसकी व्याख्या नहीं कर सका। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र ने भी इसकी कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं लिखी। 1973 में संयुक्त राष्ट्र में बस इतना लिखा गया है, ‘‘आतंकवाद एक आपराधिक कार्य है जो राज्य के खिलाफ किया जाता है और इसका उद्देश्य भ्रम पैदा करना है। यह स्थिति कुछ व्यक्तियों, समूहों या जन सामान्य की भी हो सकती है।’’ अर्थात् राज सत्ता के विरुद्ध आंदोलन आतंकवाद है। जबकि इसे स्वीकार करने को कोई भी तैयार नहीं है।  मज़े की बात कि यह अपराध विज्ञान का एक ज्वलंत विषय है। एक ऐसा विषय जिसको समझा कोई नहीं पता। यह चर्चा में खूब रहता है। दुनियाँ भर की मीडिया रोज़ाना बार-बार इस शब्द का प्रयोग करती है। किंतु क्या है आतंकवाद या क्यों है आतंकवाद अथवा कौन है आतंकवादी? इसकी कोई ग्लोबल परिभाषा नहीं है। एक का आतंकवाद दूसरे के लिए राष्ट्रभक्ति है। फिर यह विषय अपराध विज्ञान में क्यों रखा जाता है? यह तो सीधे-सीधे राजनीति विज्ञान का विषय हुआ। प्रति वर्ष लाखों करोड़ों रुपए आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए खर्च होते हैं, वैश्विक संधियाँ होती हैं। भारी मात्रा में आर्म्स-डील होती हैं। लेकिन आतंकवाद जस का तस बना रहता है। इसका मतलब तो यही हुआ, कि आतंकवाद व्यवस्था का प्रिय विषय है और राज सत्ताएँ स्वयं इसे गढ़ती हैं।  इस शब्द के बहुत ही सूक्ष्म रूप को देखें। चार महीने पहले जब केंद्रीय कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ दिल्ली के आसपास पंजाब और हरियाणा के किसानों ने सिंधु बॉर्डर पर डेरा डाला तो मीडिया ने प्रचार किया कि ये ख़ालिस्तानी उग्रवादी हैं। कुछ ने कहा कि ये सिख आतंकी हैं। चूँकि सिखों की पहचान स्पष्ट है, इसलिए अपने विचार के विरोधी सिख को आतंकवादी या उग्रवादी बना देना आसान है। यह स्थिति हर उस धर्म और समाज की है, जो विश्व के किसी भी देश में अल्प संख्या में है। ये सिख भी हो सकते हैं, मुस्लिम भी, ईसाई भी और हिंदू भी। अल्पसंख्यक होने की सबसे भीषण यातना तो यहूदियों ने झेली है। किंतु इस आधार पर तो आतंकवाद कोई परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकती।  हालाँकि ऐसा नहीं है कि सभी अपराध विज्ञानी, समाज विज्ञानी अथवा राजनीति शास्त्र के ज्ञाता इस पर चुप रहे हों। श्वाजनबर्गर के अनुसार, ‘‘एक आतंकी की परिभाषा उसके तत्कालीन उद्देश्य से की जाती है। आतंकवादी शक्ति का प्रयोग डर पैदा करने के लिए करता है और दुबारा वह उस उद्देश्य को प्राप्त कर लेता है जो उसके दिमाग में है।’’ जबकि रिचार्ड शुल्ज लिखता है- ‘‘आतंकवाद राजनीतिक व्यवस्था के अन्दर क्रांतिकारी परिवर्तन लेने के उद्देश्य से अलग-अलग प्रकार के राजनीतिक हिंसा प्रयोग में लाने की तैयारी है।’’ आधुनिक समय में सभी प्रकार की आतंकवादी कार्यवाही में हिंसा तथा हिंसा का भय एक अनिवार्य तत्व के रूप में होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि आतंकवाद कुछ निश्चित राजनीतिक परिवर्तन लाने के लिए हिंसा या हिंसा की धमकी के द्वारा पैदा किया गया भय है। ये दोनों परिभाषाएँ एक-दूसरे की पूरक भी हैं और उनमें परस्पर विरोधाभास भी खूब है। इस शब्द की इतनी अधिक परिभाषाएँ हैं, कि सब गड्ड-मड्ड करती हैं। जिनके अंतर्विरोध के चलते कोई अनुशासन या मापदंड तय नहीं होता।  दूसरी तरफ़ गुटनिरपेक्ष देशों के अनुसार ‘‘आतंकवाद एक ऐसी हिंसक कार्यवाही है जो व्यक्तियों के एक समूह द्वारा की जाती है जिससे मानवीय जीवन खतरे में होता है जो मौलिक स्वतंत्रताओं के लिए घातक होता है तथा जो एक राज्य एक समिति नहीं होता।’’ और इनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज बताता है, ‘‘आतंकवाद एक हिंसक व्यवहार है जो समाज या उसके बड़े भाग में राजनीतिक उद्देश्यों से भय पैदा करने के इरादे से किया जाता है। यह एक ऐसा तरीका है जिसके द्वारा एक संगठित समूह या दल अपने प्रकट उद्देश्यों की प्राप्ति मुख्य रूप से हिंसा के योजनाबद्ध उपयोग से करता है।’’ योनाह अलेक्जेण्डर के अनुसार, ‘‘आतंकवाद चुने हुए नागरिक विद्वानों के विरूद्ध हिंसा की कार्यवाही या उसकी धमकी है जिससे कि राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए भय का वातावरण बनाया जा सके।’’ इसके विपरीत अलेक्स स्मिथ लिखता है, कि ‘आतंकवाद हिंसा का या हिंसा की धमकी का उपयोग है, तथा लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष। लड़ाई की एक विधि व रणनीति है एवं अपने शिकार में भय पैदा करना इसका प्रमुख उद्देश्य है। यह क्रूर है और मानवीय प्रतिमानों का पालन नहीं करता। इसकी रणनीति में प्रचार एक आवश्यक तत्व है।’’ एम शेरिफ बेइयानी के अनुसार, ‘‘आतंकवाद एक गैर कानूनी हिंसा की रणनीति है जो कि उन सामान्य अथवा एक समूह में आतंक फैलाने के लिए अपनाई जाती है। जिसका उद्देश्य किसी निर्णय को लेने के लिए अथवा किसी बात को प्रसारित करने अथवा किसी कमी को उजागर करना हो।’’ ब्रिटेन के आतंकवाद निरोधक अधिनियम 1976 में आतंकवाद से अभिप्राय ‘‘राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग में लाई गई हिंसा से है जिसमें कि वह सभी तरह की हिंसा सम्मिलित है जिसका उद्देश्य जनता को या समुदाय विशेष को भयभीत करना है।’ अमेरिका का प्रतिरक्षा विभाग मानता है, ‘‘समाज या सरकार के खिलाफ गैर-कानूनी बल प्रयोग करना या ऐसा न करके केवल धमकी देना ही आतंकवाद है।’ जिन दिनों सिख आतंकवाद से प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश में हत्याएँ हुईं तब उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सरकुलर जारी किया था, उसमें कहा गया था कि किसी व्यक्ति या संगठित गुट द्वारा समाज या सरकार पर जोर-जबरदस्ती करने या धमकाने के उद्देश्य से, गैकानूनी तरीके से हिंसा का इस्तेमाल करना आतंकवाद कहलाता हैआतंकवाद एक सामूहिक अपराध है जो एक आतंकवादी समूह द्वारा किसी व्यक्ति विशेष के विरूद्ध न होकर एक व्यवस्था, धर्म, वर्ग या समूह के विरूद्ध होता हैआतंक फैलाने तथा मनोवैज्ञानिक युद्ध की स्थिति निर्मित करने की तकनीक ही आतंकवाद हैकई बार तो यह लगता है कि आतंकवाद एक ऐसा कुहासा है जिसके न आर भी वही है और पार भी वही है। बस अपनी नाकामियों को छिपाने का यह एक अस्त्र है।  (लेखक वरिष्ठ संपादक हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

modi pm

Will this knowledge make India a global guru?: क्या यही ज्ञान भारत को विश्व गुरु बनाएगा?

दुनिया के किसी अन्य देश में तो नहीं परन्तु भारत में इस बात का दावा जरूर किया जाता रहा है कि भारतवर्ष किसी जमाने में 'विश्व गुरु' हुआ करता था।....

priyanka

Utterkatha: उत्तरकथा : प्रियंका की अगुवाई में  पश्चिम के रास्ते दिखती यूपी की मंजिल

उत्तर प्रदेश में इन दिनों विपक्ष की राजनीति का केंद्र पश्चिमी जिले बने हुए हैं। यूपी में चौथे नंबर की पार्टी पर बीते कुछ दिनों से विपक्षी राजनीति की धुरी....

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Police and Political Interference: विमर्श – पुलिस और राजनीतिक दखलंदाजी

2012 - 13 में जब सुप्रीम कोर्ट ने भरी अदालत में सीबीआई को एक पिजड़े का तोता कहा तो तब खूब हो हल्ला मचा। तत्कालीन सीबीआई प्रमुख से जब पत्रकारों....

loktantre

Do not kill the soul of democracy! लोकतंत्र की आत्मा को मत मारिये!

चंद दिन पहले हम अपने एक संपादक मित्र से मिले। उन्होंने हमसे सत्ता के कुछ फैसलों को लेकर चर्चा करते हुए कहा कि 70 साल में इस तरह हिम्मत कोई....

nuns

Nuns win hearts with your service! अपनी सेवा से दिल जीतती ननें!

दो साल पहले यानी 2019 की जुलाई में मैसूर से बंगलुरु जाते वक्त मालगुडी एक्सप्रेस ट्रेन में जो वेंडर मुझे इडली दे गया, उसके साथ न चटनी थी न सांभर। अब इसे गुटका कैसे जाए? मैं इसी ऊहापोह में था, कि इससे चटनी कैसे माँगी जाए। क्योंकि वेंडर न हिंदी जानता था न अंग्रेज़ी और मैं कन्नड़ में सिफ़र। मेरी स्थिति भाँप कर इसी ट्रेन में मेरे सामने की बर्थ पर बैठी दो ननों ने हिंदी में कहा कि आप चटनी और सांभर हमसे ले लीजिए। यह कह कर उन्होंने अपना टिफ़िन मेरे सामने कर दिया। एक अनजान मुसाफ़िर के प्रति उनका यह सौहार्द उनके अंदर के ममत्त्व को दर्शाता था। धर्म का आधार करुणा है। किंतु जब समाज उन्मादी हो जाता है, तब सबसे पहले करुणा ही हमसे दूर भागती है। और समाज तब और उन्मादी बनने लगता है, जब धर्म की राजनीति होने लगती है। हालाँकि दुनियाँ में राजनीति का नियंता भी धर्म है पर जब शासक के लिए जीत का आधार धर्म हो जाए तो उसका क्रूर चेहरा अपने नग्न रूप में हमारे समक्ष होता है। आज यही सब हो रहा है। पिछले दिनों झाँसी में दो नन्स को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के लोगों ने ट्रेन से उतार लिया क्योंकि उन्हें शक था कि वे दो लड़कियों को अपने साथ धर्म परिवर्तन हेतु ले जा रही थीं। इस तरह की हरकतें क्या दर्शाती हैं? क्या अब सिर्फ़ उसी की चलेगी जिसकी आबादी अधिक होगी? और उन लोगों के रास्ते में रोड़ा अटकाया जाएगा, जो बहुसंख्यक के धर्म को नहीं मानते? धर्म का यह उन्मादी रूप समाज को किधर ले जाएगा? ईसाई धर्म का जो रूप भारत में है, उसमें सेवा, करुणा, लगन और शिक्षा प्रमुख हैं। जहां-जहां ईसाई मिशनरी गईं, वहाँ-वहाँ आधुनिक शिक्षा और धर्म व जाति से ऊपर उठ कर सेवा करने का भाव भी गया। मदर टेरेसा के पहले कौन था, जो कुष्ठ रोगियों की सेवा करता था। समाज से वे लोग बहिष्कृत थे और उन्हें कोई छूता तक नहीं था। महाभारत में एक अश्वथामा नाम का पात्र है, वह कुष्ठ रोगी की ही कथा है। अश्वथामा को एक तरफ़ तो अमरत्त्व का वरदान मिला दूसरी तरफ़ उसकी नियति लुंज-पुंज पड़े हुए एक व्यक्ति की है। उसे यह रूप धारण करने का श्राप इसलिए मिला क्योंकि उसने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भस्थ शिशु को मारने का प्रयास किया था। अर्थात् यह मान लिया गया कि कुष्ठ रोगियों ने भ्रूण-हत्या की होगी इसलिए वे उस पाप कर्म को भुगत रहे हैं। और चूँकि हिंदू धर्म में किसी के भी कर्म फल को बाधित नहीं किया जा सकता इसलिए किसी कुष्ठ-रोगी की सेवा का भाव यहाँ असम्भव था। मदर टेरेसा ने अपने मिशन के ज़रिए इन कुष्ठ रोगियों के बीच जा कर काम करना शुरू किया। वे अपने इस अभियान में इस कद्र सफल रहीं कि एक अल्बेनियाई परिवार में जन्मी आन्येज़े गोंजा बोयाजियू को भारत में माँ का दर्जा ही नहीं मिला बल्कि 1980 में उन्हें भारत रत्न से भी नवाजा गया। अपनी सेवा भावना से लोगों का दिल जीत लेने वाली ईसाई नन्स के साथ ऐसा व्यवहार शर्मनाक है। आज भी ईसाई मिशनरीज़ द्वारा संचालित स्कूलों में हर आदमी अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बेचैन रहता है। यहाँ तक कि बजरंग दल और हिंदू महासभा तथा आरएसएस के नेतागण भी। तब ऐसा सलूक क्यों? केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने झाँसी की इस घटना की पूरी जाँच और उसके बाद दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने का बयान दिया है, किंतु किसे नहीं पता कि एबीवीपी के लोग किस राजनैतिक दल के इशारे पर काम करते हैं। यूँ भी वह आरएसएस की छात्र इकाई है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने ठीक ही कहा है, कि गृह मंत्री किसे बरगला रहे हैं। केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसीलिए गृह मंत्री लीपापोती कर रहे हैं। झाँसी में एबीवीपी के लोगों द्वारा उत्कल एक्सप्रेस से उतारी गई ननें केरल की हैं और इस मामले में एक कड़ा पत्र केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने केंद्र को भेजा भी है। केरल में ईसाई आबादी काफ़ी है और वहाँ की ननों के साथ बदसलूकी भाजपा को महँगी पड़ सकती है। घटना 19 मार्च की है। इसका वीडियो जारी होते ही तहलका मच गया। हरिद्वार-पुरी उत्कल एक्सप्रेस से चार ईसाई महिलाएँ राउरकेला जा रही थीं। इन चार में से दो नन थीं, और उनके वस्त्र भी वैसे थे। दो महिलाएँ सादे कपड़ों में थीं। उसी ट्रेन में एबीवीपी के कुछ छात्र सवार थे। उनका आरोप था, कि ये नन सादे कपड़े पहने महिलाओं को धर्मांतरण के लिए ले जा रही थीं। इससे तहलका मच गया। झाँसी में उन्हें उतार लिया गया। झाँसी के रेलवे पुलिस अधीक्षक ने उन छात्रों को एबीवीपी का बताया है। उनके मुताबिक़ सादे वस्त्रों वाली महिलाएँ ईसाई ही थीं। इस वीडियो के वायरल होते ही तहलका मच गया। अब भाजपा को मुँह छिपाना मुश्किल हो रहा है। केरल में भाजपा ईसाई वोटरों को लुभाना चाहती है। भले ही वह वहाँ ई. श्रीधरन को चेहरा बनाए, लेकिन उसे पता है कि नम्बूदरी, नायर और नयनार मतदाता उसकी तरफ़ झुकने से रहे। इसके अलावा इझवा और दलित वोट भी माकपा को जाते हैं। मुस्लिम और ईसाई वहाँ टैक्टिकल वोटिंग करते हैं। मुस्लिम भाजपा के पाले में आने से रहे इसलिए उसकी उम्मीद मछुआरों, जो अधिकतर ईसाई हैं, पर टिकी है। ऐसे में इन सीरियन ईसाई ननों के साथ एबीवीपी की बदसलूकी भाजपा को केरल में बहुत महँगी पड़ जाएगी। असम और पश्चिम बंगाल में उलझी भाजपा के लिए केरल का गढ़ भेदना आसान नहीं है। लेकिन भाजपा ने जाति, धर्म और समुदाय की खाई इतनी चौड़ी कर दी है, कि निकट भविष्य में उसका भरा जाना मुश्किल है। याद करिए पिछली एनडीए सरकार के वक्त भी ईसाई मिशनरियों पर हमले तेज हो गए थे। ओडीसा के मनोहर पुर गांव में 22 जनवरी 1999 को पादरी ग्राहम स्टेन और उनके दो बेटों की जला कर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद सूरत में मिशनरीज़ पर हमला ख़ूब चर्चा में रहे थे। इसमें कोई शक नहीं कि अटल बिहारी वाजपेयी की छवि एक उदार राजनेता की थी पर आरएसएस पर उनका कमांड नहीं था। अब तो प्रधानमंत्री की छवि भी वैसी उदार नहीं है। ऐसे में इस तरह की उन्मादी हरकतों पर कैसे अंकुश लगेगा, कहना मुश्किल है। सच बात तो यह है, कि आरएसएस ऊपर से भले सख़्त मुस्लिम विरोधी दिखे किंतु अंदर से उसके टॉरगेट पर ईसाई मिशनरीज़ हैं। उनको भी पता है, कि उनके हिंदुत्त्व के एजेंडे को असल चुनौती ईसाई मिशनरीज़ से मिल रही है। दरअसल इन मिशनरीज़ ने अपना काम आदिवासी बहुल इलाक़ों में बड़े ही सुनियोजित तरीक़े से चला रखा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और अपनी सेवा के बूते वे उन इलाक़ों में ख़ूब लोकप्रिय हैं। उत्तरपूर्व के राज्यों के अलावा ओडीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी उनका काम है। आरएसएस के लोगों का कहना है कि ईसाई मिशनरियाँ सेवा की आड़ में आदिवासियों के धर्मांतरण का करती हैं। संघ के लोग इन पर नक्सली गतिविधियों को हवा देने का भी आरोप लगाते हैं। वर्ष 2008 की जन्माष्टमी पर जब ओडीसा के कंधमाल ज़िले में वीएचपी नेता लक्ष्मणानन्द शास्त्री की हत्या हुई थी, तब बीजेपी का आरोप था, कि चूँकि शास्त्री मिशनरीज़ की राह में रोड़ा थे, इसलिए उनकी हत्या की गई। जबकि कहा जा रहा था कि उस झगड़े में सवर्ण हिंदू और ईसाई दलित संलिप्त थे। ज़ाहिर है, ईसाई मिशनरीज़ अपनी सेवा भावना से हर किसी का दिल जीत लेते हैं, इसलिए हिंदुत्त्व के प्रचारकों को उन्हें नक्सल बता देना या धर्मांतरण में संलिप्त बता देना आसान होता है। इसकी आड़ में वे इनके विरुद्ध जन-मत बनाने का काम करते हैं। लेकिन सोचने की बात यह है, कि आरएसएस इस बात पर क्यों नहीं विचार करता कि अगर उसे ईसाई मिशनरीज़ को ही काउंटर करना है तो वह भी अपने अंदर वैसी ही सेवा भावना, लगन, आधुनिक शिक्षा का प्रसार और मुफ़्त चिकित्सा लोगों को सुलभ कराए।

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Panchayat elections: Politics stuck with a break: पंचायत चुनाव : ब्रेक से फंसी सियासत

उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनावों का मामला उलझने से सियासी हलकों में चिंता की लकीरे साफ दिखाई देने लगी हैं। विधान सभा चुनावों में अब महज एक साल....

antelliya mukesh ambani

Who is the political mentor of Sachin Vazh?: सचिन वझे का सियासी संरक्षक कौन?

विस्फोटक की खोज के सिलसिले में सहायक सब इंस्पेक्टर सचिन वझे की गिरफ्तारी उद्योगपति मुकेश अंबानी के मुंबई स्थित आवास के पास स्कॉर्पियो एसयूवी, और बाद में द वाहन मालिक....

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Corruption in public life and letter of Paramveer Singh: विमर्श – सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और परमवीर सिंह की चिट्ठी 

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और महाराष्ट्र के वर्तमान डीजी होमगार्ड परमवीर सिंह का एक पत्र आज कल चर्चा में बना हुआ है। इस संबंध में ताज़ी खबर यह है....

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Our Country seeping in poison of pollution : प्रदूषण से जहरीला होता हमारा देश!

एक वक्त था हम कहते थे, “सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा”। अब हालात इतर हैं। देश की आवोहवा बेहद जहरीली हो चुकी है। जो हमें तिल तिल कर मार रही....

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paanee ka paanee to rakh lete! पानी का पानी तो रख लेते!

ग़ाज़ियाबाद ज़िले में डासना के क़रीब एक मंदिर में जब दूसरे समुदाय का एक बच्चा पानी पीने गया तो मंदिर के सेवादार शृंगी यादव ने उसे पकड़लिया और उसका नाम पूछा। यह पता चलते ही कि वह अन्य समुदाय का है शृंगी ने अपने एक साथी को बुलाया और उसे पीटना शुरू कर दिया।जब वह अधमरा हो गया, तब छोड़ा। और इस पिटाई कांड का वीडियो भी सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। इस तरह की घटनाएँ सन्न करदेती हैं। कैसा होता जा रहा हमारा समाज, जिसमें किसी को पानी पीने देना भी गुनाह है। अभी कोई ज़्यादा समय नहीं बीता, जब दिल्ली मेंजगह-जगह पौशाले दिख जाते थे। चिलचिलाती धूप और गर्मी में लोग वहाँ जाकर अपनी प्यास बुझाते। कई जगह तो गुड़ भी मिलता। येपौशाले प्रशासन भी खुलवाता और कुछ चैरिटी वाले भी। लेकिन फिर पानी बिकना शुरू हुआ। और पाँच-दस पैसे फ़ी गिलास शुरू हुआ पानी20 रुपए बोतल तक पहुँच गया। पानी का धंधा अब इतना बड़ा हो गया है, कि अब लोग मरते हुओं के मुँह में भी पानी न डालें। लेकिन ग़ाज़ियाबाद की यह घटना थोड़ी अलग है। यह मामला एक दीगर धर्म के मानने वाले को पानी पीने से मना करने का है। हमारा समाज अबइतना असहिष्णु हो गया कि अब किसी भिन्न समुदाय के व्यक्ति को पानी नहीं पीने देंगे। जबकि पानी का नल सार्वजनिक है। एक ऐसे समाज सेकैसे उम्मीद की जाए कि आने वाले वर्षों में वह आधुनिक होगा। वह बराबरी, समरसता अथवा सहिष्णुता का वाहक बनेगा? ऐसा धर्म किस मुँहसे विश्व-गुरु होने अथवा लोक कल्याण कारी होने का दावा करता है। मुझे ख़ुद याद है, कि हमारे बचपन में किसी प्यासे को लोग घर से मँगा करपानी पिला देते थे। अब क्या संभव है, कि कोई प्यास व्यक्ति किसी का दरवाज़ा भड़भड़ा कर पानी की माँग करेगा? इस संदर्भ में पानी को लेकर मैं एक कथा सुनाना चाहूँगा। यह 1972 की बात है। हमारे चाचा इटावा जिले के गांव मेंहदी पुर में ग्रामसेवक के पद पर नियुक्त थे। उसी साल गर्मियों की छुटिटयों में जब मैंगांव गया हुआ था मेरी दादी ने कुछ काम से मुझे उनके पास भेजा। लंबा सफर था और बस पकडऩे के लिए ही चार कोस यानी आठ मील अर्थातकरीब 13 किमी दूर मूसानगर जाना था जो यमुना किनारे मुगल रोड पर बसा एक कस्बा है। उमर भी तब कोई खास नहीं थी इसलिए दादी को डरभी था कि लड़का उतनी दूर पहुंच जाएगा। खैर मैं सुबह चार बजे घर से निकला। साढ़े छह बजे मूसानगर पहुंच गया और सात बजे वाली बस मिलगई जो इटावा जा रही थी। भोगनीपुर, सिकंदरा, औरय्या, अजीतमल होती हुई बस जब महेवा पहुंची तब तक डेढ़ बजे चुके थे। भूख और प्यासदोनों तेज लगी थी और जेब में पैसे किराया निकाल देने के बाद बस दो या तीन रुपये बचे थे। तब होटल तो होते नहीं थे और पानी की बोतलें नहींमिला करती थीं। कुएं पर पानी भरती कोई घटवारिन पानी पिला दे तो ठीक पर ऐन जेठ की दुपहरिया को कौन पानी भरने आता। सो अजीब-सेपशोपेश में मैं रहा। किसी के घर का दरवाजा खटखटाने में झिझक हो रही थी। एक जगह एक नीम के पेड़ के नीचे एक बूढ़ा आदमी बैठा था।सफेद दाढ़ी-मूंछ बेतरतीब रूप से बिखरे, लंगोट नुमा एक कपड़ा शरीर पर और एकदम काला। मैने उसके पास जाकर कहा- बाबा प्यास लगीहै। पानी मिलिहै? वह जो मेरे करीब आते ही उठ खड़ हुआ था बोला- साहब हम तो चमार हैं आप यादव जी के घर चले जाओ। उसने रास्ता भीबता दिया। मैने कहा बाबा प्यास बड़ी जोर से लगी है मुझे पिलाय देव। वह बोला- साहब कोहू ने देख लओ तौ तुम्हाओ तो कछू न हुइहै पै हमाईचमड़ी उधेर दीन जइए। उसकी जिद के चलते मुझे प्यासा ही आगे बढऩा पड़ा। किसी तरह थूक चाटते हुए मैं आधा मील बढ़ा होऊँगा तो पाया कि खेतों की सीमा खत्म होने लगी और अब बीहड़ व ऊबड़-खाबड़ रास्ता मिलनेलगा। माथे पर हथेली टिकाकर मैने दूर तक देखने की कोशिश की तो गांव तो क्षितिज तक बस बीहड़। या ऊँचे-ऊँचे कगार। यह जमना के किनारेका इलाका था जो मीलों तक फैला था। मैं यूं ही टहलते हुए जमना तक जा सकता था पर जमना कितनी दूर है पता नहीं और अगर भटक गया तोकहां जाकर लगूंगा कुछ पता नहीं। न खाने को कुछ न पीने को ऊपर से डकैतों का डर अलग। पर अब जाता तो कहां और मेंहदीपुर गांव का पतापूछता तो किससे। अजीब मुसीबत थी। हिम्मत जवाब देने लगी और लगा कि यहां अगर भूख प्यास से तड़प कर मर भी गया तो महीनों तक पतातक नहीं चलेगा कि कोई मर भी गया। सांसें जवाब देने लगी थीं। कब तक जीभ को थूक से लथेड़ता। गर्म लू भी चल रही थी। और छाया के नामपर न तो आम या इमली, नीम या पीपल के पेड़ न कोई और पौधा जो करील थे भी वे बस टांगों तक आते। अगर कगार के नीचे जाऊँ तो क्या पताकि कहां कौन सा जानवर बैठा होगा। और करील की पत्तियां चबाई नहीं जा सकती थीं। एक बड़ा-सा बबूल का पेड़ दिखा। मैं उसी के नीचे बैठगया। आसपास कांटे बिखरे पड़े थे उन्हें किसी तरह हटाया और आराम से पसर गया। आध घंटे बाद फिर आगे बढऩे की सोची। अचानक एक कगार से उतरते ही मुझे कुछ लोगों के बतियाने की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही मुझे लगा कि जैसे मेरे प्राण लौट आए हैं।भागते हुए वहां पहुंचा जहां आवाजें आ रही थीं। वह एक पौशाला थी। एक झोपड़ी बनी थी और दो बड़े-से मटके जमीन में गड़े थे जिनमें पानी भराथा। वहां एक और आदमी था और वे दोनों बतिया रहे थे। मैने जाते ही कहा- बाबा पानी पिलाओ। बूढ़े ने एक लोटा भरकर मुझे दिया और मैंनेपीने के वास्ते चिल्लू बनाया। वह बोला- रुको लल्ला गुर तो खाय लेव। यानी पानी के पहले उसने मुझे एक भेली गुड़ दिया और उसके बाद मैनेपूरा लोटा पानी पिया। लगा जैसे जान मिली। तब दोनों की ओर मैने देखा। पानी पिलाने वाला एक बुजुर्ग था और वह एक अधेड़ आदमी सेबतिया रहा था। मैने उससे पूछा कि बाबा मेंहदीपुरा कहां है। उसने कहा कि बस आध कोस है और वो देखो मेंहदीपुरा के खेत दिखाई देत हैं। फिरउसने पूछा कि किसके यहां जाना है? मैने चाचा का नाम लिया तो बोला कि ग्रामसेवक बाबू सुबह तो आए थे। चले जाओ। मैं आधा घंटे बादमेंहदीपुरा पहुंच गया। चाचा चाची और भाईबहनों से मिला। चाचा को प्याऊ के बारे में बताया तो उन्होंने सूचना दी कि यह पौशाला एक नामीडकैत ने खुलवाई हुई थी और गुड़ का इंतजाम वही करता था और उस पौशाले वाले बुजुर्ग को 50 रुपये महीना भी देता था। यह सही है कि यहपौशाला डकैतों के भी काम की थी मगर मेरे जैसे भटके राहगीरों के लिए तो यह ईश्वरीय वरदान थी। अगर वह पौशाला न मिलती और ठंडा पानीन मिलता तो शायद यह लिखने के लिए मैं जिंदा नहीं रह पाता। पहले दिल्ली शहर में भी सेठ लोग पौशाला खुलवाते थे। पेठा भी मिला करता था लेकिन अब बोतल खरीदो। पहले हर जिले में डीएम भी पौशालेखुलवाया करता था साथ सत्तू-पानी भी पर अब रेलवे ने एक रुपया गिलास पानी देना शुरू कर दिया है।

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Descent falling in the country of the country is worrisome: देश की दुनिया मे गिरती हुयी क्षवि, चिंताजनक है

दुनिया मे जब भी उदार परंपराओं, विरासत, संस्कृति और समाज की चर्चा होती है तो, भारत का नाम सबसे पहले लिया जाता है। पाश्चात्य संसार ने भले ही 1789 की....

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Test the level of totalitarianism in India: भारत में अधिनायकवाद के स्तर को परखें

सवाल यह है कि यदि देश से लोकतंत्र खत्म हो जाएगा तो उसका लाभ किसे होगा। यह इसलिए पूछना पड़ रहा है कि पहले अमेरिका के फ्रीडम हाउस और अब....

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Gandhi’s Dandi March was the foundation of democracy: लोकतंत्र की नींव था गांधी का दांडी मार्च

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साबरमती आश्रम से महात्मा गांधी के दांडी मार्च के 91 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव की शुरूआत की। उन्होंने रानी लक्ष्मी बाई, मंगल पांडे, तात्या टोपे, महात्मा गांधी, सुभाष....

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Participation of women in the agricultural system : कृषि व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी

यदि एक शब्द में इस सौ दिन से चल रहे किसान आन्दोलन की उपलब्धि बतायी जाय तो वह है जनता का तंद्रा से उठ खड़ा होना। यानी जाग जाना, जागरूकता।....

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Congress’s future without Nehru-Gandhi family? नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का भविष्य?

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी इन दिनों निश्चित रूप से संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी को इस समय जहां भारतीय जनता पार्टी....

rahul gandhi

Know the ideological difference between RSS and Rahul Gandhi: आरएसएस और राहुल गांधी में वैचारिक अंतर को जानें

राहुल गांधी को लगता है कि उन्हें एक ऐसे फामूर्ले पर चोट लगी है जिससे उन्हें उम्मीद है कि वह विकल्प के रूप में उन्हें स्थापित करेंगे भाजपा और प्रधानमंत्री....

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Congress should take a lesson from its history! अपने इतिहास से ही सबक ले कांग्रेस! 

पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। देश की सबसे पुरानी और आजादी दिलाने वाली कांग्रेस पार्टी संकट में दिख रही है। केरल में लेफ्ट....

dharm

Why is everything the same! सब कुछ एक जैसा ही क्यों हो!

कानपुर के जिस गोविंद नगर मोहल्ले में मैं पला-बढ़ा, उसमें पश्चिमी पंजाब (जो बाद में पाकिस्तान बना) से आए पंजाबी रिफ़्यूजी रहते थे। उनमें से दो बुड्ढों को सब लोग....

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Budget support in comparison to farmer movement: किसान आंदोलन के मुकाबले बजट का सहारा

दिल्ली में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसानों के आंदोलन की आंच अब पश्चिम के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी महसूस की जा रही है। आंदोलन....

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Ayesha not in Sabarmati, drowned humanity …! साबरमती में आयशा नहीं, डूब मरी इंसानियत…!

हेलो, अस्सलाम वालेकुम। मेरा नाम है आयशा आरिफ खान। मैं जो कुछ भी करने जा रही हूं, अपनी मर्जी से करना चाहती हूं। किसी के जोर, दबाव में नहीं। ये....

democracy indian

Mandate must always be respected: जनादेश का हमेशा सम्मान करना चाहिए

राहुल गांधी का हालिया अवलोकन, जिसने अपने पिछले निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं की तुलना करने की मांग की और वर्तमान में, कांग्रेस हलकों में व्यापक रूप से आलोचना की गई....

farmers

Hundred Days of Farmer Movement and History of Farmer Movements: किसान आंदोलन के सौ दिन और किसान आंदोलनों का इतिहास 

किसान आंदोलन अपने सौ दिन पूरे करने जा रहा है। सरकार का स्टैंड अब भी वही है कि बातचीत से ही रास्ता निकलेगा, पर न तो बातचीत हो रही है....

rahul

Even if they kill, there is no discussion! वह कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती!

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पिछले दिनों तिरुअनंतपुरम में एक सभा में यह कह दिया कि - 'पहले के 15 साल मैं उत्तर भारत से सांसद था। मुझे वहां दूसरे....

g 20

G20 Summit and India’s share: जी-20 समिट और भारत की हिस्सेदारी

चतुर्भुज गठबंधन, एक साझेदारी जो सार्वजनिक रूप से अपना नाम नहीं बोलने की हिम्मत करता है, का गठन किया गया था इंडो-पैसिफिक में चुनिंदा देशों के लिए एक साथ काम....

pm modi

Stop blaming, be self reliant! दोष देना बंद कीजिए, आत्मनिर्भर बनये!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कहा कि बिजनेस करना सरकार का काम नहीं है। उनकी सरकार रणनीतिक क्षेत्र में कुछ सीमित सरकारी उपक्रमों को छोड़कर बाकी सभी सरकारी कंपनियों....

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Market and social relations! बाजार और सामाजिक संबंध!

बाजार अब हमारे घर में घुस चुका है। हम बाजार से आकर्षित होते हैं और बाजार को अपने घर बुलाने लगते हैं। बाजार पहले भी घर में मौजूद था किंतु....

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Freedom of expression is the soul of democracy: लोकतंत्र की आत्मा है अभिव्यक्ति की आजादी

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने जलवायु एक्टिविस्ट दिशा रवि को एक लाख के निजी मुचलके पर चर्चित 'टूलकिट' मामले में तिहाड़ जेल से रिहा करने का आदेश दिया है।....

democracy indian

What kind of India do we want! कैसा भारत चाहते हैं हम!

भारत में सब कुछ ठीक-ठाक है, गुलाबी-गुलाबी है, बढिय़ा दिखता है, लेकिन सिर्फ तब अगर हम शीर्षासन करें, उलटे होकर देखें, वरना तो यही समझना मुश्किल है कि ठीक करना....

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Sharma will be remembered for his true allegiance to Rajiv Gandhi: राजीव गांधी के प्रति सच्ची निष्ठा के लिए याद आएंगे शर्मा

कैप्टन सतीश शर्मा सोनिया गांधी के अलावा एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें दुर्लभ अंतर मिला था गांधी परिवार के राजनीतिक गढ़ माने जाने वाले रायबरेली और अमेठी दोनों का प्रतिनिधित्व....

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Education has to be saved from becoming Chinese …शिक्षा को चाइनीज होने से बचाना होगा…

दुनिया की सबसे महान शक्ति बनने के लिए चीन कोई मौका नही छोड रहा। सभी देशों में हर छोडे-बडे क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाने के लिए चीन एक बहुत बडी....

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Is it fuel or gold: यह ईंधन है या सोना!

15 दिसंबर 2020 को मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें मैंने ईंधन कि बढ़ती कीमतों के बारे में लिखा था। उसी लेख में मैंने शेक्सपियर के जूलियस सीजर में....

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Budget going away from public welfare 2021 – 22: लोक कल्याण से दूर होता हुआ बजट 2021 – 22

7, लोक कल्याण मार्ग प्रधानमंत्री का सरकारी आवास है। यह पहले रेसकोर्स रोड कहा जाता था। यह भी एक विडंबना है कि, जब से यह नाम बदल कर 7, लोक....

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Cairn, Vodafone Matters: Socialism as Nationalism: केयर्न, वोडाफोन मामले: राष्ट्रवाद के रूप में समाजवाद

कल्पना कीजिए कि अंतर्राष्ट्रीय जल में भारतीय जहाजों को समुद्री डाकू या चीन की नौसेना द्वारा पाकिस्तान लेकिन एक निजी कंपनी द्वारा और वह भी कानूनी तौर पर जब्त नहीं....

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Human causes of Chamoli tragedy: चमोली त्रासदी की इंसानी वजहें

सूचना सही समय पर तपोवन में पहुंच जाती तो शायद वहां टनल से तुरंत लोगों को निकाला जा सकता था। लेकिन हमारे पास आपदा से जुड़े इस तरह के सूचना....

kisan

jaahe vidhi raakhe raam, taahi vidhi rahie: जाहे विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए

पिछले दिनों किसान आंदोलन के बीच पंजाब में स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न हुए। इसमें कांग्रेस पार्टी की अकाल्पनिक विजय इतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी कि भारतीय जनता पार्टी की....

disha ravi

Greta’s protest and direction arrested under questions: सवालों के घेरे में ग्रेटा का विरोध और दिशा की गिरफ्तारी

ग्रेटा थुनबर्ग ने एक विरोध ‘टूलकिट’ का खुलासा किया जिसमें यह सुनिश्चित करने के लिए डिजाइन की गई योजना थी कि चाई और योग भारत की छवि को कम सौम्य....

pm modi

Now we too will remain silent ..! अब हम भी मौन ही रहेंगे..!

मेरी बड़ी बेटी के जन्म के समय ही पिताजी ने अदिति के नाम से संबोधित किया। नामकरण संस्कार का वक्त आया, तो कुछ अन्य नाम सामने आए मगर हमने पिछले नाम....

Playing with the mountains of Uttarakhand: उत्तराखंड के पहाड़ों से खिलवाड़!

Playing with the mountains of Uttarakhand: उत्तराखंड के पहाड़ों से खिलवाड़!

धौलीगंगा रुष्ट हो गईं और उन्होंने भारी विनाश कर दिया। चमोली स्थित तपोवन विष्णुगाड का पॉवर प्लांट तहस-नहस हो गया। और उसकी टनल्स में मौजूद क़रीब डेढ़ सौ लोगों का अभी तक पता नहीं चला है। जबकि इस हादसे को दो हफ़्ते से ऊपर हो चुके हैं। आईटीबीपी और एनडीआरएफ एवं एसडीआरएफ की टीमों ने खूब प्रयास किया लेकिन लापता लोगों में से कुल 40 शव ही ढूँढ़ सकी। तपोवन हाइडिल परियोजना और उसके समीप बना डैम सब तबाह हो गए। सात फ़रवरी की सुबह सवा दस बजे एक धमाका हुआ और उसके बाद पानी और मलबे का जो बीस फुट ऊँचा सैलाब उमड़ा, उसने जोशीमठ से ऊपर के इलाक़े के गाँव, पुल, सड़क और पॉवर प्लांट्स आदि सबको नष्ट कर दिया। इस हादसे के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का एक विचित्र बयान आया कि चमोली में आई इस विपदा को मैन-मेड विपदा न बताया जाए। यह एक प्राकृतिक आपदा है। उनका कहना था कि इसे मैन-मेड हादसा बताने से उत्तराखंड के विकास कार्यों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।  लेकिन मुख्यमंत्री महोदय यह स्पष्ट नहीं कर सके, कि कभी कोई प्राकृतिक हादसा स्वतः नहीं होता, उसके पीछे मनुष्यों के अपने कर्म होते हैं। लाखों वर्ष से पहाड़ ऐसे ही खड़े हैं। बारिश, तूफ़ान और क्लाउड बर्स्ट (बादल फटना) को झेलते हुए। और इसकी वजह रही कि पहाड़ की वनोपज का संतुलन कभी नहीं बिगड़ा। यानी पहाड़ की जैव विविधता व प्राकृतिक संतुलन से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई। लेकिन जैसे ही पहाड़ों का व्यापारिक लाभ के लिए दोहन शुरू हुआ, उसका संतुलन गड्ड-मड्ड हो गया। एक दशक के भीतर यह दूसरा बड़ा हादसा था। अगर छोटे-मोटे भूकंपों को छोड़ दिया जाए तो भी 2013 और 2021 में इतना बड़ा हादसा हुआ, जिसकी मिसाल ढूँढ़नी मुश्किल है। इन दोनों ही हादसों को मिलाकर कई हज़ार जानें गईं।  उत्तराखंड में पिछले 2016 के बाद से इस तेज़ी से उत्खनन हुआ है, कि हिमालय के कच्चे पहाड़ लगभग रोज़ ही दरकते हैं। ख़ासकर गढ़वाल रीज़न में चार धाम परियोजना के तहत 900 किमी तक 15 मीटर चौड़ी सड़क बनाने का लक्ष्य है। ये सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण बनवाएगा। यह सड़क दो लेन की होगी और बद्रीनाथ-केदारनाथ तथा यमुनोत्री-गंगोत्री को परस्पर जोड़ेगी। ज़ाहिर है, इसके लिए पहाड़ों को खोदा जा रहा है। ऊपर से पत्थर सड़क पर न गिरें इसलिए 15-20 फ़िट ऊँची पत्थरों की दीवाल बनाई जा रही है और इस ऊँचाई के ऊपर लोहे के तारों का जाल। एक नज़र में यह परियोजना बड़ी अच्छी लगती है। पहाड़ों की यात्रा सुगम और सरल हो जाएगी तथा पत्थरों के गिरने का ख़तरा भी कम होगा। ऋषिकेश से चंबा तक का क़रीब 68 किमी की सड़क इस परियोजना के तहत बन चुकी है और यह दूरी अब मात्र सवा घंटे में पूरी हो जाती है, जिसे तय करने में पहले दो-ढाई घंटे लगते थे। मगर इसके लिए जिस तरह पहाड़ों का स्वरूप बिगाड़ा गया है, उनकी हरियाली नष्ट की गई है तथा पानी बाह जाने के रास्ते बंद हो चुके हैं, उससे ये चमाचम सड़कें कितने दिन चल पाएँगी, यह कहना बहुत कठिन है।  यात्री तो आया और चला गया। किंतु वहाँ के गाँवों और क़स्बों का क्या हाल होगा, इसकी चिंता सरकारों को नहीं होती। क्योंकि राजनेताओं को कमीशन मिलता है और इज़ारेदार कारपोरेट घरानों को व्यापार की सुविधा। बर्बाद हो जाते हैं वहाँ के रहवासी। सात फ़रवरी को जो हादसा हुआ उससे चमोली ज़िले का रेणी गाँव पूरी तरह समाप्त हो गया। उसको जोड़ने वाला पुल भी। हिमालय का एक ग्लेशियर शिखर से टूट कर ऋषिगंगा और उसके बाद जो भयानक पानी उमड़ा वह धौलीगंगा के संगम पर जाकर बीस फुट ऊँचा हो गया। इसके बाद उछाल मारते हुए इस पानी ने अपने साथ आसपास के पहाड़ों से गिरे मलबे को लपेटे में लिया। तेज़ी से हरहराता हुआ यह पानी तपोवन पहुँचा। वहाँ पर डैम के गेट बंद थे। इस पानी ने डैम के किनारों को तोड़ते हुए उससे कुछ दूरी पर स्थित पॉवर प्लांट के टनल्स पर निशाना साधा। पंद्रह फुट ऊँचे गेट वाले इन टनल्स के भीतर पानी और मलबा घुस गया। इनमें से टनल नंबर एक ज़्यादा लम्बी है और नंबर दो कम। लेकिन लोगों दोनों टनल्स के अंदर थे। उनकी निकासी का दरवाज़ा बंद हो गया। इसी के साथ आक्सीजन जाने का रास्ता भी। कुछ ही लोग बचाए जा सके।  इस हादसे को प्राकृतिक कैसे माना जाए? प्राकृतिक कह देना तो भोलेपन की निशानी है। अगर इसे प्रकृति का कोप भी मानें तो यह तय है कि प्रकृति किसी वजह से कुपित हुई होगी। यह वजह मनुष्य निर्मित ही रही होगी, वर्ना जाड़े में ग्लेशियर नहीं गिरते। और वह भी लाखों टन वज़नी ग्लेशियर। हालात ये हैं, कि यदि आप ऋषिकेश से जोशीमठ की तरफ़ जाने वाली रोड पर बढ़ें तो देवप्रयाग तक के पूरे रास्ते पर तोड़-फोड़ जारी है। दासियों ज़ेसीबी लगी हैं, जो पहाड़ खोद रही हैं। जगह-जगह ऊपर से पत्थर गिर रहे हैं। देव प्रयाग से रुद्र प्रयाग तक चार धाम परियोजना की सड़क बन गई है। मगर आगे कर्ण प्रयाग और नंद प्रयाग तक हाल वैसा ही ख़राब है। इतनी ऊँचाई पर पहाड़ काटने का मतलब प्रकृति को बर्बाद करना ही है।  नदी का अपना एक प्रवाह होता है और इसे समझना बहुत ज़रूरी है। जगह-जगह उस पर डैम बनाना उसकी धारा को अवरुद्ध करना है। पहाड़ पर सिंचाई के लिए पानी की ज़रूरत नहीं लेकिन बड़े-बड़े बाँध बना कर उनसे बिजली उत्पादन एक बड़ा मुनाफ़े का सौदा है। एक-एक पॉवर प्लांट का ठेका हासिल करने के लिए कंपनियों में खूब युद्ध होते हैं। प्रति मेगावाट नेताओं का कमीशन तय है। अब इस युद्ध और कमीशनखोरी में कौन क्या कर जाए, पता नहीं। मज़े की बात कि उत्तराखंड को बिजली की ज़रूरत नहीं। उसके छोटे-छोटे बाँधों से ही पर्याप्त बिजली मिल जाती है। किंतु बिजली का देशव्यापी मार्केट है। इसलिए हर छोटी बड़ी नदी पर बाँध बनाकर पानी रोका जाता है। ऋषिगंगा जब धौलीगंगा में गिरती है तो आगे इसका नाम धौलीगंगा हो जाता है। जब दो नदियों का संगम होता है तो जो नदी ज़्यादा गहरी और विशाल होती है, उसी का नाम आगे की धारा को मिलता है। किंतु यदि गहराई सामान है तो दूसरा नाम मिलता है।  यह धौलीगंगा जोशीमठ के क़रीब विष्णु प्रयाग में बद्री पर्वत से नक़ल कर आई विष्णुगंगा से मिलती है। चूँकि दोनों की गहराई सामान है इसलिए अब को बढ़ी नई धारा को नाम मिला अलकनंदा। इसके बाद नंद प्रयाग में नंदाकिनी नदी इसमें मिली किंतु नाम अलकनंदा ही रहा। कर्ण प्रयाग में पिंडारी नदी इसमें मिलती है और रुद्र प्रयाग में केदार पर्वत से निकल कर आई मंदाकिनी मिलती है। पर नाम अलकनंदा ही रहता है। देव प्रयाग में इस अलकनंदा में भागीरथी नदी मिलती है। मगर यहाँ दोनों की गहराई और विशालता समान है इसलिए नाम मिला गंगा। अब गंगा का जन्म होने के पहले ही हर 20 किमी पर बाँध बनाकर उनका पानी रोक लिया जाता है। पहाड़ों के धसकने के कारण पॉवर हाउस पहाड़ों को खोखला कर उनके अंदर बनाए गए हैं। इस तरह हिमालय के कच्चे पहाड़ों को इस तरह खोद दिया गया है, कि कभी भी कोई हादसा हो सकता है। अभी 2013 की केदार त्रासदी को लोग भूले नहीं हैं। जब मंदाकिनी ने हज़ारों लोगों को लील लिया था। अगर विकास की इस कारपोरेटी प्रतिद्वंदिता को न रोका गया तो कैसे रुकेंगे हादसे! इस त्रासदी के चलते गंगा तक इतनी गाद आ गई है, कि सैकड़ों प्रकार के जलीय जंतु नष्ट हो गए। जैव विविधता को भारी नुक़सान पहुँचा है। पर मुख्यमंत्री इस विनाशकारी विकास को नहीं रोकना चाहते। न ही केंद्र में बैठी सरकार। 

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