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Muslim society should not be seduced by the Citizen Amendment Bill: नागरिक संशोधन विधेयक पर बहकावे में न आए मुस्लिम समाज

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ऐसा कहा जाता है कि जब बोलना चाहिए उस समय चुप रहना और जब चुप रहना हो उस समय बोलना साहस एवं समझदारी का घोर अभाव दिखाता है। जब सत्य बोलने की आवश्यकता हो उस समय डट कर सच के साथ खड़े हो जाना ही साहस और विवेक का परिचायक होता है। नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर कुछ लोगों का सड़क पर आ जाना, हिंसा का तांडव करना चिंता का विषय होने के साथ साथ अपेक्षित भी था। इस समय इन लोगों से भी ज्यादा सम्पूर्ण देश का रहस्यमयी चुपी धारण कर लेना ज्यादा चिंताजनक एवं चिंतनीय है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे देश हित सम्बधी विषयों पर इसी उदासीनता के स्वभाव के कारण हमें सदियों की गुलामी एवं भयंकर अत्याचार सहन करने पड़े थे। काफी समय बाद ही सही लेकिन अब इस विधेयक के समर्थन में देश भी खड़ा होता हुआ दिख रहा है, यह सन्तोष का विषय है। आवश्यकता सम्पूर्ण देश विशेषकर युवा की इस विधेयक को लेकर सरकार के साथ डट कर खड़े होने की है। उच्चतम न्यायालय द्वारा दंगाईयों को हिंसा छोड़ कर वार्ता की मेज पर आने के बाद ही उनकी बात सुनने को कहना प्रशंसनीय है।
विधेयक को समझने के लिए अतीत में झांकना होगा: इस विधेयक की आवश्यकता समझने के लिए 1947 के दौर में जाना पड़ेगा। हम सब जानते हैं कि महृषि अरविंद, श्री गुरू जी गोलवलकर एवं भीमराव अम्बेडकर जैसे सैकड़ों देशभक्त एव दूरद्रष्टा महापुरुषों की असहमति एव घोर विरोध के बाद भी तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने कट्टरपंथी मुस्लिम गुंडागर्दी के आगे घुटने टेकते हुए विभाजन के लिए हां भर दी थी। कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने अपने प्रिय देश भारत के विभाजन के लिए अपनी सहमति देकर न केवल करोड़ों देशवासियों के साथ विश्वासघात किया बल्कि देशभक्त मुस्लिमों को भी निराश किया। इतिहास तो कुछ ऐसा भी बताता है कि अलग देश पाकिस्तान की मांग का नेतृत्व करने वाले जिन्ना को भी मुस्लिम कट्टरता की तरफ धकेलने में कांग्रेस नेतृत्व की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ही जिम्मेवार थी। इतिहास के इन इशारों को भी नजरन्दाज नहीं किया जा सकता है कि सत्ता प्राप्त करने की जल्दबाजी भी कांग्रेस नेतृत्व को देश विभाजन की ओर खींच कर ले गई थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरू जी गोलवलकर ने कांग्रेस नेतृत्व को केवल कुछ समय हिम्मत एवं धैर्य रखने को कहा था। काश! सत्ता के लिए लार टपकाता कांग्रेस नेतृत्व श्री गुरू जी की बात मान लेता तो शायद हमारा भारत अखण्ड रह जाता।
द्वि राष्ट्र सिद्धान्त से हुआ देश विभाजन : जिन्ना की दो राष्ट्र सिद्धान्त के अनुसार मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान एव हिंदुओं के लिए भारत इस आधार पर देश का विभाजन हुआ। अंग्रेज प्रेरित इस षड्यन्त्र के कारण करोड़ों निर्दोष हिन्दू, सिखों एव मुस्लिमों का रक्त बहा। शायद विश्व की यह सबसे बड़ी मानव रचित त्रासदी थी जिसमे करोड़ों लोग बलि चढ़े, अरबों रुपए की सम्पत्ति नष्ट हुई एवं करोड़ों लोग अपनी खेती एवं घर छोड़ कर (बहुत लोगों के तो परिवार ही बिछुड़ गए थे) परिवार सहित दर दर की ठोकरें खाने को बेबश हुए। सामान्य लोगों को नेताओं के पापों की सजा भुगतनी पड़ी। जब देश विभाजन हुआ तो हिन्दू भारत आने लगे एव मुस्लिम पाकिस्तान जाने लगे लेकिन इसी बीच नेतृत्व ने तय किया कि जो लोग जहां रहना चाहें रह सकते हैं। दोनों देश धर्म निरपेक्ष होंगे। सभी को अपने धर्म के पालन की स्वतन्त्रता होगी। अपने नेताओं द्वारा छले जाने के बाबजूद अपने घर जमीन छोड़ कर दूर जाने की इच्छा न रखने वाले लोगों ने राहत की सांस ली। यद्यपि लोग परेशान थे कि यदि यही करना था फिर देश के विभाजन की क्या आवश्यकता थी? क्योंकि विभाजन का स्पष्ट आधार ही यही था कि कुछ मुस्लिमों ने कहा कि हम भारत में हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते हमें अलग देश चाहिए।
हिंदुओं से हुआ धोखा – आजादी के बाद कांग्रेस ने अपने पापों को दबाने के लिए विभाजन की त्रासदी से कुछ भी सीखने को मना कर दिया। जो मुस्लिम लीग देश विभाजन की मुख्य खलनायक थी उसके साथ निर्लज्जतापूर्वक सत्ताभोग प्रारम्भ कर दिया। हमने अर्थात दिल्ली ने धर्म निरपेक्षता को अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त बना लिया। इतना ही नहीं इस सिद्धान्त की आड़ में कांग्रेस एवं कांग्रेस गोत्र की पार्टियों ने बेशर्मी से मुस्लिम तुष्टिकरण प्रारम्भ कर दिया। सत्तामद में डूबे हमारे इन राजनेताओं ने पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान में हिन्दू सिखों की स्थिति की ओर आंख ही मूंद ली। परिणाम अत्यंत भयंकर हुआ। पाकिस्तान में हिन्दू सिख लगभग समाप्त हो गए। बंगलादेश में समाप्ति के कगार पर हैं। मुस्लिम कट्टरता के बीच पिसते गए इन निर्दोष हिन्दू सिखों की चीख पुकार भी इन बहरे राजनेताओं के कान नहीं खोल सकी।
नागरिकता संशोधन विधेयक वरदान बन कर आया : इस पृष्ठभूमि के बिना आजके इस नागरिकता संशोधन विधेयक को समझना थोड़ा कठिन है। आज करोड़ों बंगलादेशी, पाकी एवं अफगानिस्थानी हिन्दू मोदी एवं शाह की जोड़ी को हृदय की गहराईओं से आशीष दे रही है। आखिर देर से ही सही लेकिन इन लोगों की आवाज दिल्ली ने सुनी है। उन्हें जीवन जीने की हिम्मत एव आस बंधी है। आखिर विचार करें कि मुसलमान के आंसू पोंछने के लिए 57 देश हैं वहीं ईसाईयों के लिए आंसू बहाने वाले 150 से ज्यादा देश हैं लेकिन हिन्दू सिख आशा भरी नजरों से भारत की ओर नहीं देखेंगे तो किसकी ओर देखेंगे? विचार करने का विषय है कि इस विधेयक से किसके पेट में दर्द हो रही है? आज अगर नया भारत इस्लामिक कट्टरता से पीड़ित अपने हिन्दू सिखों, बौद्धों एवं ईसाई समाज की सुरक्षा के लिए कमर कसता है तो किसी को परेशानी क्यों होनी चाहिए?

विजय कुमार नड्डा

(यह इनके निजी विचार हैं।)

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