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‘Hindi-speaking Hindiist’? ‘हिंदीभाषी कि हिंदीवादी?’

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अन्य वर्षों की तरह इस बार भी 14 सितंबर आया और गया। टीवी-अखबारों ने सवेरे-सवेरे याद दिलाया कि आज हिंदी दिवस है। फिर क्या था? सोशल मीडिया से चिपके सूरमाओं ने गूगल पर हल्ला बोल दिया। हिंदी के शान में अपलोड फोटो-विडीओ संदेशों को डाउनलोड किया और पहले से ही गुड मोर्निंग, जय श्रीराम और अल्लाहो-अकबर की मार झेल रहे लोगों पर दस-बीस व्हाट्सएप ऊपर से दाग दिया। फिर फेसबुक और ट्विटर की तरफ मुड़े। पांच-दस उधर भी दे मारा। इस महासमर के बाद ये सोचकर फैल गए कि लो जी हमने हिंदी को चांद पर पहुंचा दिया।
एक स्वाभाविक सवाल है कि आखिर 14 सितंबर को ही हिंदी क्यों याद आती है? इतिहास के पन्नों में झाकें तो पता चलता है कि इसी दिन वर्ष 1949 में संविधान सभा ने सर्वसम्मति से फैसला किया था कि हिंदी भारत की राजभाषा होगी। ये दिन हिंदी के प्रसिद्ध पैरवीकार व्योहार राजेंद्र सिन्हा का पचासवां जन्म-दिन भी था। उन्होंने काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी एवं सेठ गोविंददास के साथ मिलकर हिंदी को राजकीय भाषा बनाने के लिए कड़ा संघर्ष किया था।
1953 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने सरकार से आग्रह किया कि 14 सितंबर को पूरे देश में  हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाय। सरकार मान गई। साल का एक और दिन विशेष हो गया।
इस दिन और बस इसी दिन हिंदी के प्रचार-प्रसार की बात होती है। नामचीन भाषा-सेवकों को पुरस्कार मिलता है। देश में भाषा के आधार पर तलवारें खिंची हैं सो कोई ना कोई ब्रेकिंग न्यूज चला ही देता है कि फलां ने गैर-हिंदी भाषियों पर हिंदी थोपने की बात की है। फिर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ता है।
संवैधानिक स्थिति ये है कि हिंदी भारत की राजभाषा है। संविधान के सत्रहवें अध्याय के धारा 343 (1) के अनुसार ‘संघ की राष्ट्रभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।’ धारा 343 (2) में ये कहा गया है कि हिंदी के साथ अंग्रेजी अगले पंद्रह साल तक राजभाषा बनी रहेगी। धारा 351 में राज्य से अपेक्षा की गई है कि वे हिंदी को बढ़ावा देंगे जिससे कि ये अंग्रेजी की जगह ले ले। कहते हैं कि जब गैर-हिंदी भाषियों ने बवाल काटा तो फैसला हुआ कि सरकारी कामकाज हिंदी के अलावा अंग्रेजी और 22 अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी होगा। आज के दिन हिंदी बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, मिजोरम, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल राज्यों और दिल्ली, अंडमान-निकोबार और दादर और नागर हवेली केंद्र शासित प्रदेशों की राजभाषा है। इसके राष्ट्रभाषा होने के सवाल पर गुजरात उच्च न्यायालय ने 2010 ने ये फैसला दिया किया कि हिंदी के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 52.43 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं। ये आबादी का 43.63 प्रतिशत है। इसके बाद बंगाली (9.72 करोड़) एवं मराठी (8.3 करोड़) भाषा का स्थान आता है। चीनी, स्पैनिश और अंग्रेजी के बाद दुनियां में हिंदी चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। चीनी 13, स्पैनिश 31 और अंग्रेजी 137 देशों में बोली जाती है। हिंदी भारत के अलावा मोरिशस, सूरीनाम, नेपाल, त्रिनिनाद एवं टोबगो, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, फिजी और यूगांडा में प्रचलित है।
भाषा के इतिहासकार की माने तो वेदिक संस्कृत से उत्पन्न होकर हिंदी सौरसेनी प्राकृत और सौरसेनी अर्प्भ्नस के रास्ते वर्तमान स्वरूप में अट्ठारहवीं सदी में आई है। 1881 में बिहार ने उर्दू की जगह हिंदी को एकमात्र राजकीय भाषा बना दिया। आगे चलकर दिल्ली और आसपास के इलाके में बोली जाने वाली खड़ीबोली को हिंदी मान लिया गया। इस क्रम में अवधी, मैथली और व्रज बोली कहीं पीछे रह गई। हिंदी शब्दों में तत्सम (संस्कृत से आए), तद्भव (इंडो-आर्यन से उपजे), देशज (गैर-इंडोआर्यन से आए) एवं विदेशी (विदेशी भाषा से आए) शुमार हैं। इसपर परसियन भाषा का भी अच्छा-खासा प्रभाव है। ये तेजी से इंटर्नेट पर भी अपनी जगह बना रही है। हिंदी विकिपीडिया में एक लाख लेखों का आँकड़ा छूने वाली ये पहली भारतीय भाषा है। गूगल के मुताबिक हिंदी कांटेंट में तेजी से वृद्धि हो रही है। 21% भारतीय हिंदी कांटेंट को तवज्जो देते हैं।
इस बार भी हिंदी दिवस के दिन भाषा का महिमामंडन हुआ। जिम्मेवार लोगों ने कहा कि ये भारत की पहचान है, इसका शिद्दत से प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। फिर क्या था? ट्विटर, टीवी और अखबार पर बहस छिड़ गई। कहा गया कि तीन-भाषा के फॉमुर्ले – हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय क्षेत्रीय भाषा में सरकारी कामकाज को नहीं छेड़ा जाना चाहिए। इससे गैर-हिंदी भाषी की भावनाएं आहत होगी। मामला बिगड़ सकता है।
जहां तक मुझे समझ आता है, अंग्रेजी एक समृद्ध भाषा है। 137 देशों में प्रचलित है सो इसके सबसे कारगर सम्पर्क-भाषा होने में भी कोई संदेह नहीं है। लेकिन ये कहना कि यही ज्ञान है, इसी से तरक्की का द्वार खुलता है ठीक नहीं है। आखिर जापान, रूस, जर्मनी, चीन, फ्रÞांस, हॉलेंड़, इटली कोरिया जैसे देश अपनी भाषा में काम कर रहे हैं और फल-फूल रहे हैं। एक देश के रूप में हमें किसी एक भाषा को लेकर आगे बढ़ना ही होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अंग्रेजों ने भाषा का इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया। अंग्रेजी बोलने वालों का एक वर्ग खड़ा किया जो अंग्रेजी-ज्ञान को ही ज्ञान समझते हैं। अंग्रेजों की नकल करते हैं। अपने ही लोगों से घृणा करते है क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती।  क्षेत्रीय भाषाओं को फूलने-पनपने का वातावरण मिलना चाहिए लेकिन एक कारगर राष्ट्रभाषा तो हमें चाहिए ही चाहिए जो विश्वपटल पर हमें एक अपनी पहचान दे। अंग्रेजों की नकल आखिर हम कब तक बने रहेंगे?

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