Home संपादकीय A year of ‘Modi 2.0’ amidst the tumult: कमाल-बेहाल के बीच ‘मोदी 2.0’ का एक साल

A year of ‘Modi 2.0’ amidst the tumult: कमाल-बेहाल के बीच ‘मोदी 2.0’ का एक साल

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मई 2019 की 30 तारीख को नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद के लिए दूसरी बार शपथ ली। यानी मोदी 2.0 का एक साल 30 मई को पूरा हो गया। 2019 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा की 303 सीटें और उसके गठबंधन एनडीए को 353 सीटों पर जीत हासिल हुई। पीएम के शपथ ग्रहण समारोह में देश भर से भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता बुलाए गए थे और पार्टी का आत्मविश्वास चरम पर था। लेकिन साल भर बाद 30 मई 2020 को वह उत्साह और आत्मविश्वास कमजोर दिख रहा है। पार्टी दूसरे कार्यकाल के एक साल की बजाय मोदी सरकार के छह साल का जश्न मना रही है। आखिर कोविड-19 महामारी के चलते लागू देशव्यापी लॉकडाउन के बाद पैदा हुई प्रतिकूल सामाजिक और आर्थिक स्थितियां भयावह मुकाम पर जा पहुंची हैं। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया में पैदल, साइकिल, ट्रकों-टेंपू, बसों और कुछेक श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से जैसे-तैसे, मरते-जूझते हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव-घर जाते गरीब और  मजदूरों की विचलित करने वाली तसवीरें और वीडियो भरे पड़े हैं। शायद यह भी एक वजह है कि शुरू में उनकी मदद से जुड़ी याचिकाओं को सुनने योग्य न मानने वाले सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर 26 मई को इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया। इन छवियों के बावजूद भाजपा छह साल की उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए 750 वर्चुअल रैलियां आयोजित कर रही है।
आपको बता दें कि 2019 में लोकसभा में निर्णायक जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसलों को दो हिस्सों में रखा जा सकता है। एक, राजनैतिक और दूसरा आर्थिक। राजनैतिक फैसलों के मामले में वे संघ की विचारधारा और पार्टी के घोषणापत्र को अमलीजामा पहनाने की तेजी से कोशिश करते दिखते हैं लेकिन आर्थिक मोर्चे पर वे नाकाम होते एजेंडे को लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं। पांच अगस्त 2019 का नरेंद्र मोदी सरकार का फैसला कुछ इसी तरह का माहौल बना रहा था। जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को बेमानी बनाकर उसे दो केंद्रशासित क्षेत्रों में तब्दील कर दिया गया। इस फैसले की आलोचना विपक्ष भी खुलकर नहीं कर सका, बल्कि कई विपक्षी दलों के नेता समर्थन में बयान दे रहे थे। पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार का सबसे कड़ा फैसला नोटबंदी को माना जा सकता है। एक झटके में किए गए इस फैसले ने देश के करोड़ों लोगों को बेरोजगार करने के साथ ही उनके जीवन में भारी अनिश्चितता की स्थिति खड़ी कर दी थी। इतना ही बड़ा फैसला जीएसटी लागू करना था, जिससे कारोबार पर भारी असर पड़ा। इन दोनों फैसले के असर आर्थिक क्षेत्र में आज भी दिख रहे हैं। लेकिन मतदाताओं की नब्ज पहचानने वाले और लोगों की भावनाओं को समझने में दक्ष नरेंद्र मोदी ने इस फैसले को गरीब हितैषी दिखाकर राजनीतिक नुकसान नहीं होने दिया। यही वजह रही कि इस फैसले के कुछ माह बाद ही उनके जबरदस्त कैंपेन की बदौलत उत्तर प्रदेश में भाजपा भारी बहुमत से सत्ता में आ गई।
यह भी सच है कि मोदी के पहले कार्यकाल के अंतिम साल में अर्थव्यवस्था लगातार नीचे जा रही थी, रोजगार के अवसर घट रहे थे और बेरोजगारी कई दशकों के रिकार्ड बना ऱही थी। इसी के मद्देनजर सरकार ने रोजगार की स्थिति के आंकड़े जारी नहीं किए। मीडिया में लीक होने पर उसे अधूरा बताया जबकि दूसरी बार सरकार बनने के कुछ दिनों के भीतर ही वे आंकड़े जारी कर दिए गए। तमाम राजनीतिक विश्लेषक और प्रशासकीय मामलों में अनुभवी व्यक्ति और नीतिगत मामलों के जानकार इस बात पर एक राय हैं कि दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार की प्राथमिकता लगातार कमजोर होती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना होना चाहिए था। लेकिन उन्होंने राजनैतिक एजेंडा को प्राथमिकता दी, जो दरअसल संघ के ही एजेंडे के रूप में देखा गया। यही वजह है कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के फैसले पर अमल के खातिर बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की मौजूदगी में वहां कर्फ्यू लगा दिया गया। बड़ी संख्या में राजनीतिक और गैर-राजनीतिक गिरफ्तारियां की गईं, जिनमें तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल थे। हालांकि, दो की हिरासत समाप्त कर दी गई है लेकिन लोकसभा चुनावों से कुछ माह पहले तक वहां की भाजपा-पीडीपी गठबंधन का नेतृत्व कर चुकीं पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अभी भी हिरासत में हैं। कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियां कब सामान्य होंगी, वह अभी भी अनिश्चितता के भंवर में है। दूसरा फैसला मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को गैर-कानूनी बनाने का है। यह कानून मुस्लिम वुमन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल के नाम से लाया गया। हालांकि यह विधेयक कश्मीर से जुड़े पांच अगस्त के फैसले के पहले 30 जुलाई को ही लाया गया था।
दिसंबर में सबसे बड़ा फैसला आया नागरिकता अधिनियम में संशोधन का, जिसे नागरिक संशोधन अधिनियम (सीएए) कहा गया। इसके तहत पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले धार्मिक रूप से प्रताड़ितों के लिए भारत की नागरिकता देने के प्रावधान आसान बनाए गए हैं। इसके तहत हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई और सिख धर्म के लोगों को शामिल किया गया है। सरकार ने नेशनल पापुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) और नेशनल रजिस्टर आफ सिटिजनशिप (एनआरसी) लागू करने का भी फैसला किया। दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत असम में एनआरसी लागू की गई थी और लंबी तथा जटिल प्रक्रिया के बाद उसकी जो सूची आई थी उसमें करीब 19 लाख लोग बाहर रह गए थे। पहले पूर्वोत्तर के राज्यों में सीएए का विरोध शुरू हुआ और उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में इसका विरोध तेज हो गया। सरकार की तमाम सफाई के बावजूद लोगों ने इसे संविधान के प्रावधानों के खिलाफ बताकर इसका विरोध किया। तमाम एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर नागरिकता की अनुमति नहीं देता है। चर्चित आर्थिक व राजनीतिक विश्लेषक हरवीर सिहं का मानना है कि इस घटनाक्रम ने पूरे देश में उबाल ला दिया और देश भर में सीएए के खिलाफ धरने प्रदर्शन शुरू हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सफाई देनी पड़ी कि देश में एनआरसी लागू करने की कोई योजना नहीं है। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बयान दिया था कि देश में एनआरसी लागू किया जाएगा।
असल में नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला साल कई तरह की अनिश्चितताओं और राजनीतिक उथल-पुथल से भरा रहा है। इस बीच दशकों के बाद देश के विश्वविद्यालयों में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हो गए। दिल्ली ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) का छात्र आंदोलन काफी उग्र रहा और उसके चलते कई बार दिल्ली के बड़े हिस्से प्रभावित हुए। दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया का सीएए के खिलाफ आंदोलन खड़ा हो गया और दिल्ली में ही सीएए के खिलाफ शाहीन बाग में महिलाओं का ऐसा धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया, जो आजाद भारत में अपनी तरह का अनूठा आंदोलन बन गया। लेकिन इस बीच सरकार के लिए सबसे बड़ी राहत बना कमजोर और बिखरा हुआ विपक्ष। सरकार के किसी बड़े फैसले के विरोध में विपक्ष देश भर में कहीं मजबूत नहीं दिखा और न ही वह लोगों के साथ खड़ा दिखा। संसद हो या संसद के बाहर पूरा साल लगभग विपक्षविहीन बना रहा।

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