Home धर्म Durgapuja and Dussehra is also a cultural festival: दुर्गापूजा और दशहरा, एक सांस्कृतिक पर्व भी है

Durgapuja and Dussehra is also a cultural festival: दुर्गापूजा और दशहरा, एक सांस्कृतिक पर्व भी है

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आज विजयादशमी है। मान्यता है कि आज ही के दिन राम ने लंकाधिपति रावण को युद्ध मे पराजित कर उसका वध किया था और अपनी पत्नी सीता को उसके कब्जे से मुक्त कराया गया था। भारतीय समाज मे रामकथा के सैंकड़ों संस्करण है। असंख्य लोकश्रुतियां हैं। अनेक भारतीय भाषा, बोली में, अलग-अलग तरह से अलग अलग समय पर लेखकों, और कवियों ने अपने अपने मेधा और रुचि के अनुसार, काव्य और कथाएं लिखी हैं, और अपने अपने मन्तव्य दिए हैं। पर सारी कथा का मूल है बुराई पर अच्छाई की विजय। रावण, बुराई का प्रतीक है और राम अच्छाई के। इसी प्रतीक रूप में यह त्योहार देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है।
शारदीय नवरात्र के तुरन्त बाद मनाए जाने वाले इस पर्व का आधार शक्ति की आराधना है। जिसे सामान्यत: दुर्गा पूजा के नाम से हम जानते हैं। दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं और मान्यता है कि उनका अवतरण असुरों के संहार हेतु हुआ था। देव दानव, सुर असुर आदि की कल्पनाओं में भी बहुत सी कथाएं है। पर मूलत: इनका भी संघर्ष बुराई और अच्छाई पर ही जाकर शेष होता है। दुर्गापूजा का इतिहास पढ़ने के पूर्व पहले यह पंक्तियां पढ़ लीजिए,
कहती थीं माता मुझको सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूं देकर मात एक नयन।
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त लक लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बंध गया बेधने को दृढ़ निश्चय,
कांपा ब्रह्मांड, हुआ देवी का त्वरित उदय।
यह पंक्तियां, महाप्राण, सूर्यकांत त्रिपाठी की कालजयी कविता, ‘राम की शक्तिपूजा’ की अंतिम अंश की कुछ पंक्तियां है। यह लंबी कविता हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कविताओं में तो अपना स्थान रखती ही है, बल्कि कुछ आलोचक इसे विश्व साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कविताओं में भी एक कविता मानते हैं। कविता में निराला ने दिखाया है कि किस प्रकार, राम, रावण से लंका की लड़ाई में हार रहे हैं। और तब अपनी इस दशा से विचलित राम कहते हैं, ‘हाय! उद्धार प्रिया (सीता) का हो न सका।’ इसी समय उनके अनुभवी और वयोवृद्ध सलाहकार जांबवंत सुझाव देते हैं कि वे यह युद्ध इसलिए हार रहे हैं कि उनके साथ केवल नैतिक बल है। शक्ति नहीं है। कोई भी युद्ध केवल नैतिक बल से नहीं जीता जा सकती, उसके लिए तो युद्ध शक्ति का होना आवश्यक है। कविता में जांबवंत कहते हैं, ‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन! छोड़ दो समर जब तक सिद्धि न हो, रघुनंदन!!’ जांबवंत की इन बातों का आशय दुर्गा की नौ दिनों तक कठोर साधना से था। जांबवंत का यह विवरण अन्य राम कथा में विस्तार से नहीं मिलता है। इन पंक्तियों की पृष्ठभूमि यह है, राम रावण से निर्णायक युद्ध करने सागर तट पर पहुंच गए हैं। उन्होंने दुर्गा की पूजा शुरू की। उनका संकल्प है कि वे देवी के चरणों मे 108 कमल के पुष्प अर्पित करेंगे। मंत्रोच्चार होने लगा। राम कमल पुष्प देवी के चरणों मे अर्पित करने लगे। राम मंत्रमुग्ध पूजा में निमग्न थे। अंतिम पुष्प जब वे अर्पित करने के लिये पात्र, जिसमे पुष्प रखे थे, में ढूंढा तो वहां उन्हें कोई पुष्प नहीं मिला। राम अजीब दुविधा में भर गए। अगर अब, वह आसन छोड़ कर दूसरा कमल पुष्प लेने निकलते हैं तो, उनकी साधना भंग होती है, और 108 पुष्पों का अर्पण पूरा नहीं होता है तो, उनका संकल्प टूट जाता है। अचानक उन्हें याद आया, उनकी सुंदर और आकर्षक आंखों को उनकी मां, कमल नयन कहती थी, बस तुरन्त उन्होंने यह निश्चय किया कि वह अपनी एक आंख, पुष्प के स्थान पर अर्पित कर देंगे। उन्होंने तीर उठाकर आंख पर प्रहार करना चाहा, तभी, देवी प्रगट हो गयीं और अंतिम कमल पुष्प जो देवी ने ही चुपके उठा लिया था, राम को सौंप दिया। राम ने वह पुष्प अर्पित कर के अपना संकल्प पूरा किया। देवी ने पूजा स्वीकार की और रावण के विरुद्ध युद्ध मे राम को विजयी होने का आशीर्वाद दिया।
राम द्वारा दुर्गा पूजन
निराला की यह कविता, न तो वाल्मीकि की रामायण पर आधारित है और न तुलसी की रामचरितमानस पर। माना जाता है कि निराला ने इस कविता का कथानक पंद्रहवीं सदी के सुप्रसिद्ध बांग्ला भक्तकवि कृत्तिबास ओझा के महाकाव्य ‘श्री राम पांचाली‘ से लिया था। पंद्रहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में रची गई यह रचना वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में लिखी गई ‘रामायण’ का बांग्ला संस्करण है। कृत्तिबासी रामायण की कई मौलिक कल्पनाओं में रावण को हराने के लिए राम द्वारा शक्ति की पूजा करने का भी प्रसंग है। विद्वानों के अनुसार इस प्रसंग पर बंगाल की नारी-पूजा की परंपरा का प्रभाव है। बंगाल ही नहीं, पूरा पूर्वी भारत, असम से लेकर त्रिपुरा के तक मातृ पूजा का प्रभाव है। यह शाक्त परंपरा का प्रभाव है। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए कृतिवास ओझा ने अपने इस महाकाव्य में शक्ति पूजा का विस्तार से वर्णन किया। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गांव गढ़ाकोला के मूल निवासी महाकवि निराला के जीवन का एक बड़ा भाग, महिषादल, बंगाल में बीता था। उनपर बांग्ला समाज, संस्कृति और भाषा का बहुत प्रभाव पड़ा था। कुछ विद्वानो के अनुसार उनको कृतिवास रामायण के इस प्रसंग ने यह अद्भुत कविता लिखने की प्रेरणा दी, और, अंतत: उन्होंने इसे अपनी कविता का कथानक बनाने का निश्चय किया। कवि कृत्तिवास ओझा के विषय में उनकी रामकथा के लोकप्रिय होने के बावजूद लोगो को उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। उनकी रामायण के प्रारंभ अथवा प्रत्येक कांड के अंत में एक-दो ऐसी पंक्तियां अवश्य मिल जाती थीं जिनसे ज्ञात होता था कि इस रामायण के रचयिता का नाम कृत्तिवास हैं और वे एक प्रतिभा संपन्न कवि थे। ऐसा माना जाता है कि कृतिवास रामायण ने ही बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपरा को विकसित किया। वाल्मीकि रामायण की बांग्ला भाषा में पुनर्प्रस्तुति इसी सोच का परिणाम थी। उनका मकसद था कि लोग समझें कि जीत अंतत: सत्य, न्याय और प्रेम की ही होती है। वे बताना चाहते थे कि रावण और उसके जैसे तमाम आतताइयों को एक दिन हारना ही होता है।
देवी पूजा की परंपरा
बंगाल में नारी-पूजा की परंपरा प्राचीन समय से प्रचलित है। इसलिए वहां शक्ति की पूजा करने वाले शाक्त संप्रदाय का काफी असर है। दूसरी ओर वहां वैष्णव संत भी हुए हैं, जो राम और कृष्ण की आराधना में यकीन रखते हैं। पहले इन दोनों संप्रदायों में अक्सर संघर्ष होता था। शैव वैष्णव संघर्ष का तो एक लंबा इतिहास है ही। कृत्तिबास ओझा ने अपनी रचना के माध्यम से शाक्तों और वैष्णवों में एकता कायम करने की काफी कोशिश की। बंग साहित्य के समीक्षकों के अनुसार राम को दुर्गा की आराधना करते हुए दिखाकर वे दोनों संप्रदायों के बीच एकता और संतुलन कायम करने में सफल रहे। यही निष्कर्ष कुछ विद्वान, तुलसी की चौपाई, शिव द्रोही मम दास कहावा, से भी निकलते हैं कि यह शैव वैष्णव एका का तुलसी प्रयास था। इस प्रसंग से राम का नायकत्व तो स्थापित हुआ ही, शक्ति, यानी नारी की अहमियत भी बरकरार रही। कृत्तिबास रामायण में लिखी गयी यह कथा, धीरे-धीरे पूरे बंगाल में प्रसिद्ध होती चली गई। यही नहीं पिछली पांच शताब्दियों में दुर्गा पूजा बंगाल का एक महत्वपूर्ण त्योहार बन चुका है। इस पर बंगाल का असर यदि देखना हो तो दुर्गा की प्रतिमाओं की बनावट को देखा जा सकता है जिन पर बंगाली मूर्तिकला का साफ असर है। भले ही दुर्गा पूजा की परंपरा का प्रारंभ कृतिवास के काव्य से प्रेरित होकर पड़ी हो पर दुर्गा पूजा में जो मंत्र पढेÞ जाते हैं और जो विधियां हैं वह दुर्गा सप्तशती से ली गयी है। 700 श्लोकों की यह रचना मूलत: मार्कण्डेय पुराण का एक अंश है। दुर्गा की विभिन्न रूपों में उनकी ओजस्वी स्तुतियां की गयी है। यह रचना देखने से ही युद्ध के आह्वान के लिये लिखी गयी लगती है। पहले स्वरक्षा के लिये कवच, कीलक और अर्गला के मंत्र हैं। फिर दुर्गा के उत्पत्ति की कथा है और फिर उनके द्वारा असुरों के संहार के वर्णन हैं। अंत मे क्षमा प्रार्थना है। दुर्गा यहां एकता के प्रतीक के रूप में भी देखी जा सकती हैं। सभी देवताओं के मुख से निकले तेज ने एक होकर जिस तेजपुंज का रूप लिया, वह नारी रूप बना। उसे सभी प्रमुख देवताओं ने अपने अपने अस्त्र शस्त्र दिये, और सबके तेज को समेट उस शक्ति स्वरूपा ने असुर संहार का दायित्व निभाया। दुनियाभर के बंगाली समाज के लोग इस ‘पुजो’ के अवसर पर अपने घर जाते हैं और इस समारोह में भाग लेते हैं। आज दुर्गापूजा केवल केवल बंगाल में ही नहीं बल्कि उत्तर भारत के गैर बंगाली स्थानों में भी खूब धूमधाम से मनाई जा रही है। दरअसल हमारी लोककथाओं और धर्मकथाओ का एक उद्देश्य यह होता है कि जनमानस उसके माध्यम से सार्थक जीवन जीने की ओर अग्रसर हो। भारतीय वांग्मय परंपरा में, पंचतंत्र, जातक कथाएं, कथा सरित्सागर आदि लोककथाओं की एक समृद्ध परंपरा रही है। रावण अपने विशद ज्ञान, अपार पराक्रम और अपरिमित वैभव के बाद में अपने कुछ कृत्यों के कारण समाज मे निंदित हुआ और युद्ध मे पराजित हो मारा गया। हम कितने भी विद्वान हों, पराक्रमी हों और अपार संपदा भी पास हो भी अगर कुमार्ग पर चलेंगे तो समाज और इतिहास में निंदित और खलनायक के तौर पर ही देखे जाएंगे। रामकथा और इस महापर्व का यही संदेश है।

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