Adi Shankaracharya Jayanti: कौन थे आदि शंकराचार्य? जयंती पर जानें उनके जीवन का अद्भुत सफर

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Adi Shankaracharya Jayanti: कौन थे आदि शंकराचार्य? जयंती पर जानें उनके जीवन का अद्भुत सफर
Adi Shankaracharya Jayanti: कौन थे आदि शंकराचार्य? जयंती पर जानें उनके जीवन का अद्भुत सफर

शंकराचार्य को माना जाता है भारतीय आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक, आज मनाया जा रहा आदि गुरु शंकराचार्य का जन्मदिन?
Adi Shankaracharya Jayanti, (आज समाज), नई दिल्ली: सनातन धर्म की रक्षा और वेदों के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने में आदि गुरु शंकराचार्य का योगदान अतुलनीय है। वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को जन्मे शंकराचार्य को भगवान शिव का ही अवतार माना जाता है। उन्होंने एक ऐसे समय में जन्म लिया जब भारतीय संस्कृति का मूल ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो रहा था।

मात्र 32 वर्ष की छोटी सी आयु में उन्होंने पूरे भारत की पैदल यात्रा की और लोगों के भीतर छिपी आध्यात्मिक चेतना को जगाया। उनकी जयंती हमें उनके महान त्याग और एकता के संदेश की याद दिलाती है। यह पावन दिन आत्म-ज्ञान प्राप्त करने और जीवन को सही दिशा देने के लिए एक श्रेष्ठ अवसर है।

आदि गुरु का प्रारंभिक जीवन और संन्यास का संकल्प

आदि शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी ग्राम में हुआ था। बचपन से ही उनकी बुद्धि बहुत तेज थी और उन्होंने बहुत ही कम उम्र में वेदों और शास्त्रों का गहरा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उनके जीवन की एक प्रसिद्ध कथा उनके संन्यास लेने के पक्के इरादे को दिखाती है। कहा जाता है कि जब नदी में स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया, तब उन्होंने संन्यास लेने का निश्चय किया।

जैसे ही उन्होंने यह राह चुनी, मगरमच्छ ने उन्हें छोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने आचार्य गोविन्द भगवत्पाद से शिक्षा ली और एकत्ववाद का ज्ञान फैलाया। उनका मानना था कि ईश्वर और मनुष्य की आत्मा एक ही है, बस हमें उसे पहचानने के लिए मन की सहजता की आवश्यकता है।

चार मठों की स्थापना और एकता का संदेश

भारत को सांस्कृतिक रूप से एकजुट करने के लिए देश की चारों दिशाओं में चार मुख्य मठों की स्थापना की गई। उत्तर में ज्योर्तिमठ, दक्षिण में श्रृंगेरी मठ, पूर्व में गोवर्धन मठ और पश्चिम में द्वारका मठ का निर्माण कर उन्होंने पूरे राष्ट्र को भक्ति के एक सूत्र में पिरो दिया। उन्होंने समाज में फैले भेदभाव को दूर कर सबको साथ मिलकर चलने का मार्ग दिखाया।

उनके लिखे धार्मिक ग्रंथ और स्रोत आज भी करोड़ों लोगों को शांति और सही राह दिखाते हैं। उन्होंने अपने ज्ञान और तर्क से बड़े-बड़े विद्वानों को प्रभावित किया और वैदिक धर्म का सम्मान फिर से स्थापित किया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा और परोपकार से समाज का भला करना ही सबसे बड़ा धर्म है।

जयंती का महत्व और जीवन में बदलाव

शंकराचार्य जयंती मनाना उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है, क्योंकि उन्होंने ही हमें अपनी जड़ों की महिमा समझाई। आज के भागदौड़ भरे जीवन में भी उनके विचार बहुत काम आते हैं, जो हमें शांत रहने और जीवन को सही ढंग से जीने की प्रेरणा देते हैं।

इस दिन भक्त उनके स्थापित मठों में विशेष प्रार्थना करते हैं और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि यदि मन में दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी काम असंभव नहीं है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धर्म का असली अर्थ दूसरों की मदद करना और अपने आचरण को शुद्ध रखना है।

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