Kedarnath Yatra: बाबा केदार के दरबार तक पहुंचने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? जानें पौराणिक रहस्य

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Kedarnath Yatra: बाबा केदार के दरबार तक पहुंचने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? जानें पौराणिक रहस्य
Kedarnath Yatra: बाबा केदार के दरबार तक पहुंचने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? जानें पौराणिक रहस्य

22 अप्रैल को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे बाबा केदार के कपाट
Kedarnath Yatra, (आज समाज), नई दिल्ली: उत्तराखंड की देवभूमि में स्थित केदारनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। साल 2026 की चारधाम यात्रा का आगाज 19 अप्रैल से होने जा रहा है, वहीं बाबा केदार के कपाट 22 अप्रैल को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। हिमालय की गोद में बसे इस धाम की यात्रा और यहां तक पहुंचने की परंपरा सदियों पुरानी है।

हर साल की तरह इस बार भी लाखों श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा का हिस्सा बनने के लिए उत्साहित हैं। धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दरबार की स्थापना और यहां पहुंचने की परंपरा का सीधा संबंध द्वापर युग और महाभारत के युद्ध से जुड़ा हुआ है।

पांडवों से जुड़ी है केदारनाथ यात्रा की शुरूआत

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए भगवान भगवान शिव की शरण में पहुंचे। लेकिन भगवान शिव उनसे नाराज थे और उनसे मिलने से बचने के लिए वे हिमालय की ओर चले गए। कहते हैं कि शिवजी ने बैल (नंदी) का रूप धारण कर लिया और गुप्तकाशी में छिप गए। जब पांडवों को इसका पता चला, तो उन्होंने शिवजी को पहचान लिया। इसके बाद भगवान शिव भूमि में समाने लगे, तभी भीम ने बैल का पिछला हिस्सा पकड़ लिया। यही स्थान आगे चलकर केदारनाथ के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जहां भगवान शिव की पिंड (कुबड़) की पूजा होती है।

पंचकेदार की उत्पत्ति का रहस्य

मान्यता है कि शिव के शरीर के अलग-अलग अंग हिमालय के विभिन्न स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें आज पंचकेदार कहा जाता है।

  • केदारनाथ मंदिर (कुबड़)
  • तुंगनाथ मंदिर (भुजाएं)
  • रुद्रनाथ मंदिर (मुख)
  • मध्यमहेश्वर मंदिर (नाभि)
  • कल्पेश्वर मंदिर (जटा)

इन्हीं स्थानों की यात्रा करने की परंपरा धीरे-धीरे विकसित हुई और आज यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा बन चुकी है।

आदि शंकराचार्य ने दी यात्रा को नई पहचान

इतिहास के अनुसार, 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ मंदिर का पुनरुद्धार किया और इसे हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थों में स्थापित किया। उन्होंने ही चारधाम यात्रा को संगठित रूप दिया, जिससे यह परंपरा देशभर में प्रसिद्ध हो गई।

अटूट आस्था की परीक्षा है ये यात्रा

पहले के समय में केदारनाथ तक पहुंचना बेहद कठिन था। श्रद्धालु पैदल, जंगलों और पहाड़ों के खतरनाक रास्तों से गुजरते हुए यहां पहुंचते थे। आज भले ही सुविधाएं बढ़ गई हों, लेकिन अभी भी इस यात्रा में कठिन चढ़ाई और मौसम की चुनौती बनी रहती है। यही कारण है कि इसे तप और भक्ति की परीक्षा भी माना जाता है।

क्यों खास है बाबा केदार का दरबार?

मान्यता है कि केदारनाथ धाम में सच्चे मन से दर्शन करने पर सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि हर साल लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव के इस दिव्य स्वरूप का आशीर्वाद लेते हैं।

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