Dwijapriya Sankashti Chaturthi: संकष्टी चतुर्थी कल, कर्ज के बोझ से मुक्ति पाने के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ

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Dwijapriya Sankashti Chaturthi: संकष्टी चतुर्थी कल, कर्ज के बोझ से मुक्ति पाने के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ
Dwijapriya Sankashti Chaturthi: संकष्टी चतुर्थी कल, कर्ज के बोझ से मुक्ति पाने के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ

विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य भगवान गणेश को समर्पित है संकष्टी चतुर्थी का व्रत
Dwijapriya Sankashti Chaturthi, (आज समाज), नई दिल्ली: सनातन धर्म में चतुर्थी तिथि बहुत पावन और विशेष मानी जाती है। हर माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। ये व्रत विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य भगवान गणेश को समर्पित किया गया है। फरवरी या कहें कि फाल्गुन माह में जो संकष्टी चतुर्थी पड़ती है उसको द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन श्रद्धा भाव से गणेश जी की पूजा-अर्चना और व्रत करने का विधान है।

जीवन में आती है सुख-समृद्धि

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा-अर्चना और व्रत करने से विघ्नहर्ता भगवान गणेश बहुत प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। गणेश जी हर मनोकामना पूरी करते हैं। इस दिन पूजा के दौरान सच्चे मन से ऋणमुक्ति गणेश स्तोत्र का पाठ किया जाता है। माना जाता है कि ऋणमुक्ति गणेश स्तोत्र का पाठ करने से कर्ज के बोझ से मुक्ति मिलती है। साथ ही आर्थिक लाभ भी प्राप्त होता है। घर में धन समृद्धि बढ़ती है।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कब है?

वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 5 फरवरी को मध्यरात्रि 12 बजकर 9 मिनट पर शुरू हो रही है। इस तिथि का समापन 6 फरवरी को मध्यरात्रि 12 बजकर 22 मिनट पर हो जाएगा। सनातन धर्म में उदयाति?थि मानी जाती है। ऐसे में उदयाति?थि के अनुसार, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत 5 फरवरी 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। साथ ही भगवान गणेश का पूजन किया जाएगा।

॥ ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्र ॥

ॐ स्मरामि देवदेवेशंवक्रतुण्डं महाबलम्।
षडक्षरं कृपासिन्धुंनमामि ऋणमुक्तये॥

महागणपतिं वन्देमहासेतुं महाबलम्।
एकमेवाद्वितीयं तुनमामि ऋणमुक्तये॥

एकाक्षरं त्वेकदन्तमेकंब्रह्म सनातनम्।
महाविघ्नहरं देवंनमामि ऋणमुक्तये॥

शुक्लाम्बरं शुक्लवणंर्शुक्लगन्धानुलेपनम्।
सर्वशुक्लमयं देवंनमामि ऋणमुक्तये॥

रक्ताम्बरं रक्तवर्णंरक्तगन्धानुलेपनम्।
रक्तपुष्पै: पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥

कृष्णाम्बरं कृष्णवणंर्कृष्णगन्धानुलेपनम्।
कृष्णयज्ञोपवीतं चनमामि ऋणमुक्तये॥

पीताम्बरं पीतवर्णपीतगन्धानुलेपनम्।
पीतपुष्पै: पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥

सर्वात्मकं सर्ववर्णंसर्वगन्धानुलेपनम्।
सर्वपुष्पै: पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥

एतद् ऋणहरं स्तोत्रंत्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर:।
षण्मासाभ्यन्तरे तस्यऋणच्छेदो न संशय:॥

सहस्रदशकं कृत्वाऋणमुक्तो धनी भवेत्॥