Ramayan Katha: मां के गर्भ से नहीं हुआ था रामायण के इन दो किरदारों का जन्म

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Ramayan Katha: मां के गर्भ से नहीं हुआ था रामायण के इन दो किरदारों का जन्म
Ramayan Katha: मां के गर्भ से नहीं हुआ था रामायण के इन दो किरदारों का जन्म

बहुत रहस्यमयी है दोनों की उत्पत्ति की कथा
Ramayan Katha, (आज समाज), नई दिल्ली: रामयाण में त्रेतायुग की कहानियों और भगवान राम की लिलाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। रामायण में कई महत्वपूर्ण किरदर हैं, जिनकी भूमिका घटनाओं को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इन किरदारों से जीवन दर्शन और अध्यात्मिक संदेश भी मिलता है। रामायण के ऐसे ही दो महत्वपूर्ण और विशेष किरदार हैं सुग्रीव व बाली। ये दोनों वानर भाई थे। दोनों को वीर योद्धाओं के रूप में याद किया जाता है।

बाली अपनी अद्भुत शक्ति से लिए जाना जाता है। बाली ने लंकापकति रावण को पराजित किया था और छह माह कांख में दबाकर घूमा था। बाली को वरादन प्राप्त था कि जो उसके सामने आएगा, उसकी आधी शक्ति बाली के भीतर आ जाएगी। वहीं सुग्रीव को उनकी धर्मप्रियता की वजह से जाना जाता है। इन दोनों की उत्पत्ति की कथा बहुत रहस्यमयी है। दोनों ने मां के गर्भ से जन्म नहीं लिया था।

रामायण के अनुसार जन्म की कहानी

रामायण के उत्तरकांड और अन्य पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, बाली और सुग्रीव साधारण रूप से नहीं जन्मे थे। एक बार वानरराज ऋक्षराज एक सरोवर में स्नान करने गए। वो जिस सरोवर में गए वो ब्रह्मा जी के श्राप से ग्रसित था। वानरराज ऋक्षराज सरोवर में डुबकी लगाते ही एक सुंदर स्त्री में परिवर्तित हो गए। उसी समय रास्ते से इंद्र और सूर्य देव गुजर रहे थे। दोनों ही उस सुंदर स्त्री पर मोहित हो गए।

देवराज इंद्र की नजर सुंदर स्त्री के बालों पर पड़ी और वहां से बाली का जन्म हुआ। वहीं सूर्य देव की नजर स्त्री की गर्दन पर पड़ी और वहां से सुग्रीव का जन्म हुआ। इस घटना के बाद से ही बाली को देवराज इंद्र और सुग्रीव को सूर्य देव का पुत्र कहा गया। बाद में वानरराज ऋक्षराज अपने वास्तविक स्वरूप में लौट आए और दोनों भाइयों का पालन-पोषण किया।

श्रीराम ने किया था बाली का वध

बाली के पास अपार बल था। इंद्र देव ने बाली को एक सोने का हार भी प्रदान किया था। जबकि, सुग्रीव नीति, बुद्धिमत्ता और धर्मप्रियता के प्रतीक थे। ऋष्यमूक पर्वत पर दोनों भाइयों ने निवास किया और यहीं से किष्किन्धा राज्य की स्थापना की। बाद में बाली का वध प्रभु श्रीराम के हाथों से हुआ था। भगवान श्रीराम ने पेड़ के पीछे से बाण चलाकर बाली का वध किया था।