HomeपंजाबUncategorizedWe are rats, sir! हम तो चूहे हैं, सर!

We are rats, sir! हम तो चूहे हैं, सर!

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कांग्रेस बिल्ली की तरह है और जनता का जीवन मलाई की तरह। कांग्रेस उसे चट कर जाती है। यह नहीं कहा चूहे कौन हैं। यह भी कि बिल्लियों के डर से चूहे दुम उठाए क्यों भागते रहते हैं। बिल्ली तो घरों में पाली भी जाती है। जंगलों में भी रहती है। इतनी कायर है कि डर के मारे भीगी बिल्ली कहा गया। पराजय झेल नहीं सकती। उसे ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ कहा जाता है। कहने की कोशिश करती है। उसे डराया जाता है, हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊं। किस्मत किसी पर मेहरबान हो तो कहा जाता है बिल्ली के भाग से छींका टूटा। स्त्री पुरुष लड़ते हैं, तो कहा जाता है कुत्ते बिल्ली की तरह लड़ रहे हैं। बिल्ली की हत्या हो तो सोने की बिल्ली बनवानी पड़ती है। बिल्ली क्रोध आने पर शेर की मौसी कहलाती है। अंग्रेजी अंधविश्वास के अनुसार बिल्ली का नौ बार पुनर्जन्म होता है।
बिल्ली के साथ देवताओं तक ने अत्याचार किया। दुर्गा शेर पर हैं, विष्णु गरुड़ पर, लक्ष्मी उल्लू पर, शिव बैल पर, कार्तिकेय मोर पर, गणेश भारी भरकम डीलडौल के बावजूद चूहे पर बैठते हैं। कुत्ते में धर्मराज ने भूमिका ढूंढ़ी। विष्णु लक्ष्मी के साथ शेषनाग की शैय्या पर आराम फरमाते हैं। किसी ने बिल्ली को वाहन नहीं बनाया। यह राजनाथ सिंह के लिए छोड़ दिया था। कांग्रेस क्यों सभी पार्टियों के नेता बिल्लियों की भूमिका में होते हैं। जनता चूहों की भूमिका में। इंसानी चूहे भारत में 130 करोड़ हैं। बिल्लियां संसद में 700 और विधानभाओं में 7 हजार हैं। वे चूहों के प्राण, वोट, और नोट लेती रहती हैं। चूहों से कहा जाता है- दूध गर्म करो। फिर सियासी बिल्ली आकर मलाई चट कर जाती है। मूछों पर ताव देती बिल्ली होने के सौभाग्य पर मुस्कराती है। चूहों को चट करने के बाद कभी तीर्थयात्रा पर पाप धोने हज गई होगी। किसी चूहे ने देखा होगा। मुहावरा गढ़ दिया, नौ सौ चूहे खाय के बिल्ली हज को चली। चूहे कवि और लेखकों की भूमिका में भी मुहावरे गढ़ सकते हैं। फिर कहा बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?
चुनावों में बिल्लियां वायदा करती रही हैं कि चूहों के सपने पूरे करेंगी। चूहों को लगा संविधान उन्होंने रचा है। चूहे अपने भविष्य की दुम उठाए 21वीं सदी की मलाई चटी खाली हांडी में झांक रहे हैं। बिल्लियां चूहों के पास आती हैं। 50 बरस में बहुत बुजुर्ग चूहे फौत हो जाते हैं। बिल्लियों की आंखों में मगरमच्छ के आंसू छलछलाते हंै। वे वंशज-चूहों को पूर्वज-चूहों की याद दिलाती हैं। वंशज चूहे उन्हीं बिल्लियों को वोट देते हैं। वे नहीं जानते कि पूर्वज-चूहों को इन्हीं बिल्लियों ने चट किया है। वे पांच सालाना हज पर आई है। पांच बरस में एक बार और कभी साल छ: महीने में बिल्लियां उन्हें आश्वस्त कर जाती हैं। बाकी वक्त मलाई की अहिंसा और चूहे की देह-हिंसा की कॉकटेल का नशा बिल्लियों की जिन्दगी का नशा बना रहता है।
अंधा बांटे रेवड़ी और चीन्ह चीन्ह कर देय के अनुरूप चूहों में बिडाल-न्याय बांटा जाता है। अमानत, जमानत और खयानत की रोटी खाते हैं। वे तीर्थाटन करते हैं। जो हम तुम इक कमरे में बंद हों और चाबी खो जाए अक्सर गाते रहते हैं, सरकारी उड़न खटोले पर बैठ आकाशगंगा में नहाते हैं। आईएएस अधिकारियों की स्वयंसेवी संस्थाएं मानव अधिकार, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य वगैरह के सरकारी अनुदान चाटती बिल्लियां बनी हुई हैं। शहर बन रहे हैं। हजारों चूहे बेदखल किए जा रहे हैं। भूखंड बिल्लियों में बांटे जा रहे हैं। चूहे स्मृति के इतिहास में जा रहे हैं। उन्हें सरकारी योजनाओं का पत्थर फेंक फेंक कर मारा जाता है। मृत्यु बिल्ली है। जीवन-चूहे को चट कर रही है। हिंसा को हज की जरूरत है। अहिंसा पराजित की कब्रगाह है। वह नक्सलवाद, आतंकवाद, पुलिसिया बर्बरता की बिल्लियों से बचती पनाह मांगती है। बिल्लियां विश्वविद्यालय के लिए कुलपति नहीं चुनतीं। कुलपति के लिए विश्वविद्यालय चुनती हैं। कलेक्टर के लिए जिला चुनती हैं। न्यायाधीश के लिए हाईकोर्ट चुनती है और मुख्यमंत्री के लिए प्रदेश। बिल्लियों के पंजों में फंसे ठेका मजदूरों की छानबीन होती रहती है। वे चूहे बने बंधुआ मजदूरों की तरह कुलबुलाते नजर आते हैं। डर के मारे बिल्लियों को मुक्ति का प्रमाणपत्र देते हैं।
हर चूहा भी दूध का धुला नहीं होता। बिल्लियों के बगलगीर बने धर्मगुरु खतरनाक किस्म के मोटे चूहे होते हैं। करते धरते कुछ नहीं। केवल मलाई छानते हैं। चिलम पीते हैं। लड़कियों का कौमार्य लूटते हैं। अपने पैने दांतों से कुछ भी कुतर सकते है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैने दांतों से इतिहास को कुतर लेते हैं। जिसे चाहे काफिर कहकर बोडियां काट देते हैं। ऐसे गुरुओं पर देश के कालाबाजार की बिल्लियां फिदा हैं। गुरु बिल्लियों को सुधारने के बदले चूहा-जनता को सुधारे पड़े हैं। अदालत की डिग्री लेकर शंकराचार्य बनते हैं। लेकिन राम मंदिर बाबरी मस्जिद को कहते हैं धर्मगुरु अदालत से श्रेष्ठ हैं। ये चाय पिलाने वाले का समर्थन करते हैं। खुद देशी गाय का घी बेचकर धर्मगुरु बने रहते हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ अंतरराष्ट्रीय बिल्ली-घर है। वहां चूहों के कत्लेआम करती बिल्लियां आत्म स्वीकारोक्कित करती हैं। बारी-बारी से पादरी की भूमिका करती एक दूसरे को क्षमादान करती जाती हैं। बांबियों, कंदराओं, गुफाओं में दुबके चूहे टेलीविजन पर बिल्लियों की अभिनय क्षमता का दृष्य-श्रव्य अवलोकन करते हैं। इतना मरने पर भी चूहे बढ़ ही रहे हैं। कुपोषण, अशिक्षा, धर्मांधता, स्त्री-अत्याचार के बावजूद उनकी जनसंख्या का विस्फोट हो ही रहा है। वैश्वीकरण, अमेरिकापरस्ती, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, उत्तर-आधुनिकता, बौद्धिक विमर्श बिल्लियों और उनके शाश्वत चोचलों की नई छटाएं हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। )

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