HomeपंजाबUncategorizedreligion! Humanity is there, not poison! धर्म! मानवता है, जहर नहीं!

religion! Humanity is there, not poison! धर्म! मानवता है, जहर नहीं!

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा। बचपन के दिनों में स्कूल से लेकर घर तक, हम अल्लामा इकबाल का यह गीत मस्ती के साथ गुनगुनाते थे। राजनेता, शिक्षक और परिवार सभी यही सिखाते थे कि सबसे मिलकर प्यार से रहना चाहिए। हम अपने मुस्लिम मित्रों के साथ ईद भी उतनी ही खुशी से मनाते थे, जितनी खुशी से होली-दिवाली। वह भी हमारे साथ रंग खेलते और पटाखे फोड़ते थे। न कभी किसी को अजान से तकलीफ होती थी और न कभी मंदिर के ढोल मंजीरा के साथ होते भजन से। अब हालात यह हैं कि प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की कुलपति को मस्जिद की अजान से तकलीफ होती है। कुछ को सांई बाबा की पूजा से भी। यही कारण है कि अब राजनीतिक दल मतदाताओं के वोट का आंकलन हिंदू मुस्लिम में नफरत से करने लगे हैं। कोई देश के हिंदुओं एक हो जाओ की बात करता है, तो कोई मुस्लिम मतदाताओं से एकमत होने की। समस्याओं से लड़ने को सभी देशवासियों एक हो जाओ, का नारा कोई नहीं देता। 1989 तक कुछ अपवाद छोड़ दें, तो जाति-धर्म के आधार पर मतदान नहीं होता था। कहीं कामगारों का झंडा बुलंद होता था, तो कहीं किसानों-मजदूरों का। कर्मचारी संगठन हों या फिर सामाजिक, उनका ही रुतबा होता था। मतदाता ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, पिछड़े और दलितों में नहीं बंटे थे। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में हैं भाई-भाई, के नारे दीवारों पर दिखते थे। अब बच्चों के मन में भी जाति धर्म का जहर भर दिया गया है।

इस वक्त भारत ही नहीं विश्व कोविड-19 की महामारी से जूझ रहा है। विश्व के तमाम देशों ने काफी हद तक इस पर नियंत्रण पा लिया है मगर हमारे देश में हा हा कार मचा हुआ है। हमारी सरकार और संवैधानिक संस्थायें सत्ता दल के चारण में बहुसंख्यक वोट बैंक साधने में लगी हैं। महाकुंभ का आयोजन और लंबी चुनावी प्रक्रिया इसका ज्वलंत उदाहरण है। दूसरे संप्रदाय के आयोजनों को महामारी फैलाने वाला बता दिया जाता है। जिनके महल इन अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की वफादारी और काम के बूते खड़े हैं, वे भी उन्हें खत्म करने की बात करते हैं। बंगाल में चुनाव जीतने के लिए ब्राह्मणत्व का पालन करने वाली 66 साल की ममता दीदी को बेगम दीदी का तमगा दे दिया जाता हैं। दूसरी तरफ चंद महीनें पहले तक दीदी के सिपहसालार रहे तमाम नेताओं को रावण के भाई राम भक्त विभीषण के रूप में पेश किया जाता है। इन नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के दाग भगवा ओढ़ने मात्र से छिप जाते हैं। लड़ाई राम और काली के नाम पर हो रही है। वह काली जो असुरों का नाश करती हैं, जिनकी पूजा खुद राम ने भी की थी। नतीजतन राज्य की समस्यायें, विकास और रोजगार की बातें पीछे छूट गई हैं। मर्यादाएं तार-तार हो रही हैं। मानवता की हत्या कर राम राज्य बनाने की बातें हो रही है। महामारी दिन प्रतिदिन पांव पसार रही है, जिस पर सभी खामोश हैं।

हमारे देश के दो नायक हैं, एक महात्मा गांधी और दूसरे भगत सिंह। दोनों का उद्देश्य एक था, आजादी। दोनों धार्मिक नफरत के खिलाफ थे। गांधी जहां परम आस्तिक थे, वहीं भगत सिंह घोर नास्तिक। दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे। दोनों जन सामान्य के प्रति संवेदनशील और उनके हक के हिमाइती थे। दोनों मानवता को सर्वोपरि मानते थे, मगर एक का रास्ता हिंसक था, तो दूसरे का अहिंसक। हिंसा की राह अपनाने के बाद भी भगत सिंह प्रकृति कभी हिंसक नहीं रही। कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू 8 अगस्त 1929 को भगत सिंह से मिलने जेल गये। 23 मार्च 1931 की सुबह गांधी ने वायसराय को चिट्ठी भेजी, जिसमें लिखा था कि वह हिंसा के खिलाफ हैं मगर फांसी भी हिंसा ही है। आज हालात यह हो गये हैं कि निजी स्वार्थ में नेताओं से लेकर दलों तक की विचारधारा में मार दो, फांसी दो, स्पॉट फैसला जैसे शब्दों को महिमामंडित किया जाता है। अपराधों को अनैतिक और धर्म विरुद्ध बताने के बजाय उन्हें कुतर्कों के जरिए धार्मिक तौर पर सही सिद्ध किया जाने लगा है। हर कोई राम और काली की तरह दूसरे को रावण और असुर बताकर हत्या करने को आतुर है। ऐसे लोग यह भी देखने समझने को तैयार नहीं हैं कि राम और काली दोनों ने आखिरी दम तक रावण और असुरों को समझाने की कोशिश की थी, कि वे मानवता को नुकसान न पहुंचायें। जब कोई राह नहीं बची, तब उन्होंने हथियार उठाये थे।

इस वक्त देश महामारी के संकट में फंसा है। वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन कोरोना संक्रमित होने वाले मरीज, विश्व में सबसे अधिक हैं। कोरोना से ग्रसित होकर मरने वाले हों, या कोरोना के कारण अस्पतालों में इलाज न मिल पाने से मरने वाले अन्य रोगी, सभी जगह भारत रिकॉर्ड बनाने में लगा है। ऐसे वक्त में भी हमारे राजनीतिज्ञों में सत्ता की भूख सबसे ज्यादा है। देश-प्रदेश को बेहाल छोड़कर सभी नफरत फैलाकर, जीत हासिल करने की गोट खेल रहे हैं। देश के अस्पतालों में मरीजों के लिए न बेड हैं, न आक्सीजन और न दवायें। सरकार बयानवीर बनी दावे ठोकने में लगी है। सच तो यह है कि सिर्फ विश्व मुद्राकोष, एशियन विकास बैंक और विश्व स्वास्थ संगठन ने ही भारत सरकार को कोरोना से लड़ने का ढांचा तैयार करने के लिए करीब 54 हजार करोड़ रुपये दिये हैं। देश-विदेश की कंपनियों और लोगों ने भी पीएम केयर फंड में हजारों करोड़ रुपये दिये हैं। केंद्र सरकार ने अपने स्वास्थ बजट में सिर्फ 69 हजार करोड़ रुपये रखे हैं। इस धन से दिल्ली एम्स जैसे कई अस्पताल बन सकते थे मगर साल भर में भी कुछ नहीं हुआ। दवाओं के शोध के लिए सीडीआरआई और नाइपर जैसे संस्थानों को कोई मदद नहीं मिली। राज्यों, जिलों, तहसीलों और प्राथमिक स्तर के अस्पतालों की दशा सुधारने पर कोई कदम नहीं उठाया गया। सांकेतिक फीस लेकर अच्छे योग्य डॉक्टर तैयार करने के लिए मेडिकल कालेजों में कोई व्यवस्था नहीं की गई। यही कारण है कि देश की चिकित्सा सेवा न सिर्फ संसाधनों के संकट से जूझ रही है बल्कि समर्पित योग्य डॉक्टरों के अभाव में दम तोड़ रही है। वहीं, निजी क्षेत्र के अस्पताल दिन दूने रात चौगुणें फलफूल रहे हैं। उनका धंधा आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक का है। इन सरकारी नीतियों के चलते ही हर अस्पताल में मानवता की हत्या हो रही है मगर सत्ता पर काबिज जनप्रतिनिधि ऐश फरमा रहे हैं।

खराब चिकित्सीय हालात के कारण मरते लोगों को देख भावुक हुए यूपी के कानून मंत्री ब्रजेश पाठक ने कड़ा पत्र लिखकर अपनी ही सरकार पर सवाल उठा दिये। उनकी चिट्ठी से सोई सरकार हिली मगर मानवता के लिए नहीं बल्कि अपनी क्षवि बचाने के लिए। मानवता की मौत का आलम यह है कि देश को प्रधानमंत्री देने वाले वाराणसी की बेटी जयश्री को अपने पिता की जान बचाने के लिए उन्हें सवा 11 सौ किमी दूर पंजाब के फोर्टिस अस्पताल लाना पड़ा। वहां से सौम्या को अपने पिता को एयर एंबुलेंस से दिल्ली लाना पड़ा। अगर प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र और राज्य का यह हाल है, तो बाकी का क्या होगा? समझा जा सकता है। दुख तब होता है, जब इन हालात पर संवेदना के साथ काम करने के लिए उनके प्रतिनिधि के पास वक्त नहीं होता। वह मानवता और नैतिक संवैधानिक दायित्वों का निर्वाहन करने के बजाय चुनाव जीतने की रणनीति में व्यस्त रहते हैं। मानवता से अधिक जहर बोने की राजनीति को श्रेष्ठ समझते हैं। यह हम सभी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। वक्त रहते समझे तो ठीक, नहीं तो सब लुट जाएगा। एक एक कर हम सभी अपनों को मरते देखते रह जाएंगे। धर्म के नाम पर जहर न बोइये। हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं कि मानवता ही धर्म है।

SHARE
RELATED ARTICLES

Most Popular