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Privatization of government banks, problem or solution? सरकारी बैंको का निजीकरण, समस्या या समाधान?

आज इकनॉमिक टाइम्स मे एक खबर छपी थी, कि सरकार बैंकों का निजीकरण कर सकती है! ये खबर क्या सच है? क्या सरकारी बैंकों को फिर से उन्ही हाथों मे दिया जाएगा, जिनके हाथों से लेकर सरकार ने कभी इनका राष्ट्रीयकरण किया था।
19 जुलाई 1969 को 14 निजी बैंकों का, फिर 1980 मे, 7 और निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, जिनपर बड़े औधोगिक घरानों का कब्जा था। इसके पहले 1955 मे एसबीआई का एवं 1958 मे इसके सहयोगी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि, इन सरकारी बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भारत मे बैंकिंग क्षेत्र मे अभूतपूर्व प्रगति हुई। वर्ष 1969 से पूर्व बैंकों की लगभग 8 हजार शाखाएँ थीं, जो कि वर्ष 2019 में लगभग 1 लाख 20 हजार के करीब पहुँच गईं। इससे पहले सभी बैंक सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही स्थित थे, लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों के शाखाओं की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में काफी तेजी से बढ़ी हैं।
पिछले कई सालों से सरकारी उपक्रमों का विनिवेश हो रहा है, यह सब देखकर मन व्यथित हो रहा है, कभी-कभी तो मन मे यही ख्याल आता है कि, क्या वाकई सरकारी तंत्र इतना दुर्बल एवं असहाय हो गया है, कि उन्हे बेच देना ही, सरकार के पास एकमात्र विकल्प है। क्या हर समस्या का समाधान प्राइवेट सेक्टर ही है? आपको अगर हर समस्या का समाधान प्राइवेट सेक्टर मे ही दिखता है तो, आप एक बार बैंकिंग सेक्टर के एनपीए का विश्लेषण करें, आपकी आँखें खुली की खुली रह जाएंगी! आईबीसी के टॉप 12 एनपीए अकाउंट केवल निजी क्षेत्र के हैं।
आरटीआई के तहत आरबीआई द्वारा एक मीडिया हाउस को दी गई सूचना के अनुसार बैंकिंग सेक्टर के कुल एनपीए का एक तिहाई सिर्फ 30 निजी कंपनियों का है। 31 मार्च 2019 को बैंकिंग सेक्टर के कुल एनपीए 9.49 लाख करोड़ मे से 2.86 लाख करोड़ सिर्फ इन्ही 30 औधोगिक घरानों का है। कुछ औधोगिक घराने इस प्रकार हैं:- ये तो बड़े एनपीए ऋण खातों का विवरण है, अगर छोटे स्तर पर भी देखा जाए तो शायद ही किसी सरकारी कर्मचारी को दिया हुआ ऋण खराब होता है, चाहे वो किसी साधारण व्यक्ति को दिया गया ऋण हो अथवा किसी सरकारी कंपनी को दिया गया ऋण हो! फिर भी बदनाम तो सरकारी तंत्र ही है! अगर निजी क्षेत्र के लोगों का नियत इतना ही साफ रहता तो सरकारी बैंकों का इतना ज्यादा कर्ज एनपीए मे तब्दील नहीं होता। आरबीआई के साइट पर उपलब्ध आंकड़े के अनुसार, मार्च 2019 तक बैंकिंग सेक्टर के 63.23% डिपॉजिट सरकारी बैंकों के पास है, और बाकी डिपॉजिट निजी क्षेत्र के बैंकों के पास। अगर निजी क्षेत्र के बैंकों के डिपॉजिट का विश्लेषण करेंगे, तो पाएंगे कि, उनके कुल डिपॉजिट का लगभग 85% शहरी और मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र से है, वही सरकारी बैंकों के कुल डिपॉजिट का लगभग 33% ग्रामीण क्षेत्रों से है।
यहां ये बताने का तात्पर्य है, कि सरकार की जनसुविधाओं को समाज के अंतिम छोड़ पर खड़े व्यक्ति तक पहुचाने मे सरकारी बैंक दिन रात एक कर देते हैं, चाहे सरकार की नोटबंदी योजना हो, या फिर प्रधानमंत्री जनधन योजना हो, या फिर आज के कोरोना काल मे अपने जीवन की चिंता किए वगैर, आम लोगों तक सहायता पहुचाना हो, इन सभी सरकारी योजनाओं को हकीकत की धरातल पर लाने मे सरकारी बैंकों का बेजोड़ योगदान रहा है। क्या कोई गरीब आदमी इन प्राइवेट बैंकों मे खाता खोल सकता है?
अगर आपको किसी भी प्राइवेट बैंक मे खाता खोलना हो तो कम-से-कम 2,500 से 10,000 तक शुरूआती डिपॉजिट देना होता है, तब जाकर एक खाता खुलता है। सिर्फ जन-धन खातों की ही बात करें, जहां अधिकतर खाते शून्य डिपॉजिट से खोले जाते हैं, तो अभी तक खुले कुल 38.89 करोड़ खातों मे से केवल 1.25 करोड़ खाते निजी बैंकों द्वारा खोला गया है, बाकी खाते पीएसबी एवं आरआरबी द्वारा। क्योंकि ऐसे खातों से बैंकों को फायदा न होकर उल्टा नुकसान होता है। क्योंकि सरकारी तंत्र सिर्फ लाभ कमाने मे विश्वास नहीं करता, बल्कि सरकार के लोक कल्याण की योजनाओं को गरीबों एवं पिछड़ों तक पहुचाने का भी काम करता हैं। क्या आपको यकीन है, कि ये निजी क्षेत्र के लोग जोखिम भरे ऋण लोगों को देंगे, जिनसे कई गरीबों का कल्याण होता है, कई लोगों ने पीएमजीइपी स्कीम में लोन लेकर, आज अपना व्यवसाय बड़ा किया है, कितने लोगों के रोजगार का साधन बने हैं। अधिकतर निजी क्षेत्र के बैंक बड़े प्रोजेक्ट लोन देने से अपने-आप को दूर ही रखते हैं,जो भारत जैसे विकासशील देश  के विकास के लिए जरूरी है। इसके विपरीत अधिकतर निजी बैंक, प्राय समृद्ध वर्ग को ही अपनी सुविधाएं प्रदान करते हैं।

विनय कुमार ओझा
(लेखक टिप्पणींकार हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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