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मानसून सत्र ने दिए संकेत, अब फ्रंट फुट पर खेलने को तैयार हैं राहुल

अजीत मेंदोला
नई दिल्ली। कांग्रेस के पूर्व अध्य्क्ष राहुल गांधी ने मानसून सत्र में जिस तरह से विपक्ष को एक जुट कर मोदी सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की उसका असर कांग्रेस की राजनीति में बड़े बदलाव के रूप में देखने को मिल सकता है। राहुल गांधी के रुख से लगा कि अब फ्रंट फुट पर खेलने को पूरी तरह तैयार हैं। सूत्रों की माने तो इसके लिये कांग्रेस में अंदर खाने कई बिंदुओं पर विचार चल रहा है।एक सबसे बड़ी कोशिश शुरू हो गई है कि राहुल अब खुद अधिकृत रूप से पार्टी की कमान संभाल मानसून सत्र की आक्रमक रणनीति को जारी रखें।जिससे चुनाव वाले राज्यों में पार्टी के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।इसी बीच मे प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लेकर भी अहम फैसले होने के आसार हैं।
जानकारों को मानना है कि कांग्रेस के पास फैसला करने का यही उपयुक्त समय है।इसमे अब कोई दो रॉय नही है कि सभी फैसले राहुल गांधी को ही करने हैं। यदि इस बार भी उन्होंने फैसले टालने की रणनीति को जारी रखा तो इसका सीधा असर अगले साल होने वाले सात राज्यों के चुनाव पर पड़ेगा।इन राज्यों की हार जीत ही कांग्रेस के भविष्य पर असर डालेगी। कांग्रेस के पास सात राज्यों में से उत्तराखण्ड,हिमाचल और पंजाब में पूरा मौका है।गोवा,गुजरात और मणिपुर में कांग्रेस कोशिश करे तो बीजेपी को चुनोती दे सकती है। जहाँ तक उत्तर प्रदेश का सवाल है तो कांग्रेस सबसे कमजोर स्थिति में है।सपा और बसपा जैसे दल गठबंधन से परहेज करेंगे। कांग्रेस के पास अपनी स्थिति को सुधार एक मात्र उम्मीद प्रियंका गांधी ही हैं।
प्रियंका के चेहरा बनने से कांग्रेस जीतेगी तो नही,लेकिन कार्यकर्ताओं में जोश आ जायेगा।पर अब सब कुछ निर्भर करता है कि प्रियंका चेहरा बनने के लिये तैयार होंगी कि नही।क्योंकि उन्होंने प्रभारी रहते हुऐ ही दिल्ली से ही काम चलाया। इसी हफ्ते उनके अमेरिका से लौटने के आसार हैं।वह अपनी बेटी के पास गई हैं। उनके करीबी नेताओं की माने तो प्रियंका खुद चेहरा बनने से बचेंगी। वह गठबंधन के साथ जाने के पक्ष में है।उनके लौटने के बाद राहुल गांधी उनसे चर्चा कर फैसला कर सकते हैं।क्योंकि प्रियंका के साथ ही चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लेकर भी अहम फैसला किया जाना है।प्रशांत किशोर पंजाब में अमरेंद्र सिंह से अलग हो गए।सूत्रों का कहना है कि वह एक ही कोशिश में लगे हैं कि किसी कांग्रेस में प्रवेश कर राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी से सीधे भिड़ा जाए। लेकिन कांग्रेस में आसानी बहुत आसान है नही।पार्टी का बड़ा धड़ा खिलाफ है। सूत्रों का कहना है राहुल बड़े अपने करीबी बड़े नेताओं से चर्चा कर मानसून सत्र के बाद फैसला कर सकते हैं। उधर पार्टी का बड़ा धड़ा इस कोशिश में लग गया कि राहुल गांधी को पार्टी की कमान संभालने के लिये तैयार किया जाए।
दो साल से पार्टी में कोई स्थाई अध्य्क्ष नही है। जबकि अब लोकसभा चुनाव तक हर साल प्रमुख राज्यों के चुनाव होने हैं।अध्य्क्ष पद का फैसला राहुल को खुद करना है। पार्टी में एक चर्चा यह भी है कुछ बड़े नेताओं की कोर कमेटी बनाई जाए। जो राजनीतिक फेसलो पर तुरंत फैसला करे।पार्टी के रणनीतिकार मान रहे हैं बंगाल की हार और कोरोना महामारी ने देश के राजनीतिक हालात बदले हैं। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की राजनीतिक घटनाओं ने यह संकेत दिये हैं बीजेपी का आलाकमान अब प्रदेश के नेताओं के सामने समझौता करने लगा है।अगले साल होने वाले सात राज्यों के चुनाव में बीजेपी शासित राज्यों में सेंध लग गई तो फिर 2024 के लिये राह आसान हो जायेगी।लेकिन अब सब कुछ गांधी परिवार पर निर्भर करता है कि वह फ्रंट में आएगा या बैकफुट से ही खेलेगा।राहुल गांधी ने मानसून सत्र में संकेत तो दिए हैं कि वह फ्रंट पर आ कर खेलेंगे। लेकिन असल लड़ाई उन्हें पार्टी के भीतर फैसले कर लड़नी है।राज्यो में कांग्रेस को मजबूत करना जरुरी है तभी केंद्र की बात बनेगी।समाप्त
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