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गुरु जो कहे उसे करने में शिष्य का कल्याण

आज समाज डिजिटल:
एकादशी व्रत समस्त वैष्णवों के लिए कल्याणकारी है। इसे अनिवार्य रूप से रखना चाहिए। एकादशी व्रत की शास्त्रों में कई कथाएं प्रचलित हैं। मूल रूप से इसका आशय है जिसने गुरु शिष्य परंपरा पर चलकर वैष्णव दीक्षा प्राप्त की है, जिसकी आचार्य के चरणों में शरणागति हो गई। उसके लिए एकादशी के व्रत का पालन करना जरूरी होता है। श्री हर्षण कुंज साजा के महंत वैष्णवदास जी महाराज ने नगर में आयोजित सत्संग में एकादशी महात्म्य के संबंध में बताते हुए कहा कि भक्तमाल में एकादशी व्रत के पालन करने वालों मिलता है। सार यह है कि यदि निष्ठा और आदर्शों का परिपालन करते हुए इसकी परिपूर्णता पर जाएं तो भगवान को प्रसन्ना करने का यह श्रेष्ठ माध्यम है। घर में परस्पर मिल बैठकर भगवत संकीर्तन करना, अन्ना आहार से बचना, चावल का तो नाम भी न लेना, फलाहार का आश्रय लेते हुए भगवान की भक्ति में रमकर दिन व्यतीत करना चाहिये। इस भवसागर से पार जाने के लिए नाम महाराज सशक्त हैं। एकादशी की पावन साधनाकाल में भगवान का स्मरण करने से वे वहीं उपस्थित हो जाते हैं। सभी वैष्णवों को एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करना चाहिये और द्वादशी को उसका परायण करना चाहिये। इससे हमारे धर्म की परंपरा सुदृढ; होती है। वैसे भी हमारा समाज किसी लिखित संविधान की अपेक्षा परंपराओं पर ज्यादा आधारित है। ये स्वस्थ परंपरा हमारे समाज परिवार में निरंतर रहे। सूर्यवंशी अंबरीश की कथा से शिक्षा मिलती है कि चक्रवर्ती महाराज अंबरीश की पद प्रतिष्ठा होने के बावजूद वे भगवान की सारी सेवायें स्वयं करते थे।

संत श्री भगवानदास जी महाराज ने कहा कि पूर्णिमा पर्व की परंपरा है कि समाज में शिष्य के द्वारा गुरु का पूजन किया जाता है। गुरु शिष्य परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। सनातन धर्म की मान्यता है कि गुरु बिन भव निधि तरई न कोई। जो बिरंचि शंकर सम होई॥ हम गुणात्मक रूप से भले ही शंकर जी या ब्रह्मा जी के समान क्यों ना हो जाए यदि जीवन में गुरु का आश्रय नहीं लिया तो इस भवसागर से पार होना तो मुश्किल है। गुरु व्यक्ति रूप में जीवन में दिखाई जरूर देता है, लेकिन वस्तुत: वह एक तत्व है एक सार है। सधो अर्थों में जीवन का मार्गदर्शन करता है हमारी भ्रांतियों का जो निराकरण करता है। जीवन में छाये हुए तमों का शमन करता है। श्रृष्टि के, परमात्मा के, मानव जीवन के रहस्य का अवतरण करता है। मैं कौन हूॅ कहॉ से आया हूॅ जीव को इस प्रश्न का उत्तर मिल जाता है उसकी सारी भ्रांतियॉ दूर हो जाती हैं। तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में में कहा है तुलसीदास हरि गुरु करूना बिन विमल विवेक न होई। बिनु विवेक संसार घोर निधि पार न पावे कोई॥ गुरु तत्व अध्यात्म का जनक होता है। मानव जीवन में तीन पिताओं की बात की गई है पहला जिनसे हमारा जनम होता है दूसरा पिता वह होता है जो हमें द्वीस बनाता है। जब हम आध्यात्मिक क्षेत्र में सद्युरु का अनुशरण करते हुए जीवनयात्रा प्रारंभ करते हैं। तीसरा पिता है जगतपिता परमेश्वर। आध्यात्मिक गुरु सद्युरुदेव की गुरुपूर्णिमा के दिन पूजन का यही आशय है इस गुरु तत्व की अपरिहार्यता को समझें। गुरु की करनी निषेध है उनकी वाणी का अनुकरण करें। गुरु जो कहे उसे करने में शिष्य का कल्याण है। शिष्य के जीवन की अपूर्णता को गुरु पूर्ण करते हैं उसे धन्य बनाते हैं। गुरुदेव को ब्रह्मा, विष्णु, महेश से भी ऊपर बताया गया है उसका आशय यही है कि जीवनयात्रा का प्रथम बिंदु गुरु ही होता है। गुरु से ही जीवनयात्रा शुरू होती है और अंतिम लक्ष्य पहुंचने पर ईश्वर रूप में ही गुरु मिलते हैं। सभी अपने गुरु के प्रति अटूट निष्ठा व श्रद्घा का भाव रखते हुए जीवनपथ की ओर अग्रसर होंगे तो उनका कल्याण अवश्यंभावी है।

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