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पुरी पीठ के शंकराचार्य पानीपत में करेंगे धर्मसभा – सुरेश तायल

आज समाज डिजिटल, पानीपत : 

  • 29 सितंबर को श्‍याम बाग में होगी धर्मसभा, इससे पहले प्रश्‍नोत्‍तरी सत्र भी होगा

श्री ऋगवैदिय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज पानीपत में 29 सितंबर को धर्मसभा करेंगे। राष्‍ट्र उत्‍थान यात्रा पर निकले शंकराचार्य हरियाणा के पानीपत में दो दिन निवास करेंगे। सामूहिक रूप से जहां धर्मसभा होगी, वहीं चुनिंदा लोगों के बीच जिज्ञासा शांति सत्र होगा। इसमें शंकराचार्य प्रबुद़ध लोगों के सवालों के जवाब देंगे। सेक्‍टर 25 स्थित पाइट संस्‍कृति स्‍कूल में जगद्गुरु शंकराचार्य स्‍वागत समिति की बैठक हुई।

स्‍वागत समिति के सदस्‍य सुरेश तायल ने बताया कि शंकराचार्य स्‍वामी 28 सितंबर को पानीपत में पहुंचेंगे। इसके अगले दिन 29 सितंबर को सुबह साढ़े ग्‍यारह बजे से एक बजे तक प्रश्‍न-उत्‍तर सेशन होगा। इसमें केवल आमंत्रित लोग ही शामिल हो सकेंगे। शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जिज्ञासा को शांत करेंगे। इसके उपरांत शाम साढ़े पांच बजे से आठ बजे तक श्‍याम बाग में धर्मसभा होगी। स्‍वागत समिति के सदस्‍य विकास गोयल ने कहा कि पानीपत में करीब दो दशक के बाद शंकराचार्य पहुंच रहे हैं। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ और विश्‍व बैंक तक ने उनसे मार्गदर्शन प्राप्‍त किया है। पानीपत के लोगों के लिए यह सौभाग्‍य और परम गौरव का विषय है कि उन्‍हें शंकराचार्य का सानिध्‍य प्राप्‍त होने का अवसर मिल रहा है। धर्मसभा की तैयारी के लिए 11 सितंबर, रविवार को जीटी रोड स्थित गोशाला में अलग-अलग धार्मिक व सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक होगी।

शंकराचार्य के बारे में जानिये

जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती महाराज ने स्वस्तिक गणित पुस्तक लिखी है।
अंक पदीयम् तथा गणित दर्शन नाम से दो और पुस्तकों का लोकार्पण हुआ है। कंप्‍यूटर व मोबाइल फोन से लेकर अंतरिक्ष तक के क्षेत्र में किए गए आधुनिक आविष्कारों में वैदिक गणितीय सिद्धांतों का उपयोग किया है। इन्‍हीं सिद्धांतों का उल्‍लेख शंकराचार्य की पुस्‍तकों में है। शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज का जन्म बिहार के मधुबनी के हरिपुर बख्शीटोलमानक गांव में 30 जून, 1943 को हुआ। उनके बचपन का नाम नीलांबर था।

शंकराचार्य स्‍वामी की प्रारंभिक शिक्षा बिहार और दिल्ली में संपन्‍न हुई है। दसवीं तक बिहार में विज्ञान के विद्यार्थी रहे। दो वर्षों तक दिल्ली में शिक्षा ग्रहण की। पढ़ाई के साथ-साथ कुश्ती, कबड्डी और तैरने में अभिरूचि के अलावा फुटबाल के भी अच्छे खिलाड़ी रहे। बिहार और दिल्ली में छात्रसंघ विद्यार्थी परिषद के उपाध्यक्ष और महामंत्री भी रहे। काशी, वृंदावन, नैमिषारण्य, बदरिकाआश्रम, ऋषिकेश, हरिद्वार, पुरी, श्रृंगेरी प्रमुख धर्म स्थानों में रहकर वेद-वेदांग का गहन अध्ययन किया।

सात नवंबर 1966 को दिल्ली में देश के अनेक वरिष्ठ संत-महात्माओं एवं गोभक्तों के साथ गोरक्षा आंदोलन में भाग लिया। इस पर उन्हें 9 नवंबर को बंदी बनाकर 52 दिनों तक तिहाड़ जेल में रखा गया। 18 अप्रैल 1974 को हरिद्वार में 31 वर्ष की आयु में स्वामी करपात्री महाराज ने उनका नाम ‘निश्चलानंद सरस्वती’ रखा। श्री गोवर्धन मठ पुरी के तत्कालीन 144 वें शंकराचार्य जगद्गुरू स्वामी निरंजनदेव तीर्थ महाराज ने स्वामी निश्चलानंद सरस्वती को अपना उपयुक्त उत्तराधिकारी मानकर 9 फरवरी 1992 को उन्हें गोवर्धनमठ पुरी के 145वें शंकराचार्य पद पर पदासीन किया।

शंकराचार्य का लक्ष्‍य

गोरक्षा के लिए उन्‍होंने अपना जीवन समर्पित किया है। उन्‍होंने संकल्‍प लिया है कि जब तक गोहत्‍या बंद नहीं होती, तब तक वह विमान में यात्रा नहीं करेंगे। सिर पर छत्र नहीं लगाएंगे, सिंहासन पर नहीं बैठेंगे। ट्रेन में प्रथम श्रेणी में यात्रा नहीं करेंगे।

देश में चार पीठ

भारत शर्मा एवं रामलाल ने बताया कि आद्य शंकराचार्य ने विधान किया कि उनके द्वारा स्थापित चार पीठों के पीठाधीश्वर उनके प्रतिभूति समझे जाएंगे। चार पीठों में शंकराचार्यों की परंपरा अनवरत चली आ रही है। हिंदु धर्म के संरक्षण और उन्नयन में चारों पीठ की भूमिका महत्वपूर्ण है।

इन संस्‍थाओं का गठन किया

विकास गोयल ने बताया कि पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती महाराज ने हिंदुओं के अस्तित्व एवं आदर्श की रक्षा, देश की सुरक्षा तथा अखंडता के लिए धर्मसंघ पीठ परिषद, आदित्य वाहिनी एवं आनंद वाहिनी नामक संस्था का गठन किया है। इनके माध्यम से पूरे भारत वर्ष में सार्वभौम सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार निरंतर जारी है।

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