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करनाल: अंग्रेजों के साथ ही देश से अंग्रेजी का चला जाना बेहतर होता  : डॉ. चौहान

प्रवीण वालिया, करनाल:
कुछ लोगों की दुर्भावना के कारण ही अंग्रेजी आज भी उस स्थान पर विराजमान है जहां मातृभाषा हिंदी को होना चाहिए था। अंग्रेजी पर अत्यधिक निर्भरता के कारण हिंदी का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। ऐसा कुछ लोगों की चतुराई के कारण हुआ है। 14 सितंबर 1949 को भारत की संविधान सभा ने जब सर्वसम्मति से यह फैसला किया कि भारत की राजभाषा हिंदी होगी तो इसकी राह में देश के ही कुछ अंग्रेजी प्रेमी लोग आ खड़े हुए। जिन्हें इस फैसले से परेशानी हुई, उन्होंने यह समझाया कि कामकाज की भाषा के तौर पर अंग्रेजी का इस्तेमाल अचानक बंद कर देने से देश में तूफान आ जाएगा और कुछ भी नहीं बचेगा। उन्होंने अंग्रेजी को धीरे-धीरे देश से हटाने की वकालत की। इस पर संविधान सभा ने यह तय किया कि संविधान लागू होने के 15 साल बाद तक देश की द्वितीय भाषा के तौर पर अंग्रेजी का इस्तेमाल होता रहेगा। इस 15 साल के विस्तार का असर आज आजादी के 75 साल बाद भी देखा जा सकता है। अंग्रेजी आज भी स्वदेशी भाषाओं पर हावी है। यह टिप्पणी हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने राजकीय माध्यमिक विद्यालय जुंडला में स्वभाषा स्वाभिमान अभियान के तहत शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए की।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजों की विदाई के साथ-साथ देश से अंग्रेजी को भी चले जाना चाहिए था। इसके समर्थन में संविधान सभा में कुछ विद्वानों ने तब भी तर्क दिया था कि जब जापान, जर्मनी, चीन और फ्रांस जैसे देश अंग्रेजी के बिना विकसित और ताकतवर हो सकते हैं तो भारत हिंदी को अपनाकर ताकतवर क्यों नहीं हो सकता? हिंदी हमारी स्वदेशी और मातृभाषा है। मातृभाषा से हमें उतना ही प्यार होना चाहिए जितना हम अपनी मां से करते हैं। भगवान राम ने भी लंका विजय के पश्चात लक्ष्मण से कहा था — जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। अर्थात मां और मातृभूमि के आगे स्वर्ग भी मायने नहीं रखता। हिंदी के प्रति हमारा लगाव अभिमान की हद तक होना चाहिए।

हरियाणा ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष डॉ. चौहान ने जोर देकर कहा–यह हमेशा ध्यान रखें कि हिंदी मात्र एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी मातृभाषा है और अपनी मातृभाषा से हमें अद्भुत लगाव होना चाहिए। अंग्रेजी के कारण स्वदेशी भाषाओं का देश में अपेक्षित प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया है। इसलिए, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु अकादमी ने प्रदेश भर में जागरूकता अभियान चलाया है। इसके तहत आफलाइन व आनलाइन दोनों मोड में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ‘हमारी भाषा, हमारा अभिमान’ संदेश प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रदेश के सभी विद्यालयों के कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थी आनलाइन माध्यम से अपना संदेश रिकॉर्ड करके अकादमी को भेजेंगे जिनमें से चयनित संदेशों को समापन कार्यक्रम में पुरस्कृत किया जाएगा। इसके अतिरिक्त हिंदी लेखन/शोध अभिप्रेरण तथा हिंदी में रोजगार विषय पर भी विशेषज्ञों के माध्यम से कार्यक्रमों की श्रृंखला आयोजित की जाएगी।

राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय शेखपुरा, सोहाना, करनाल से पधारे हिंदी के प्रवक्ता दुलीचंद कालीरमन ने देश में हिंदी के बढ़ते हस्तक्षेप को विद्यार्थियों के सामने रखा। ‘हमारी भाषा हमारा अभिमान संदेश प्रतियोगिता’ के अंतर्गत विद्यालय के विभिन्न छात्र- छात्राओं ने अपने संदेश प्रस्तुत किए। विद्यालय की छात्रा दीपिका ने कविता वाचन, छात्र अक्षय व गौरव ने भाषण, अभिषेक ने हिंदी पर ज्ञानवर्धक जानकारी, प्रवेश ने कविता वाचन और वंश ने भाषण के माध्यम से अपना संदेश दिया। इसी प्रकार शिक्षकों में चंद्र लाल जी, सुशील कुमार, रोशन लाल, श्रीमती रीटा और रजनीत कौर ने भी कार्यक्रम में अपने विचार रखे।

रेडियो ग्रामोदय की टीम ने बताया कि छात्र/छात्राओं के संदेशों को अकादमी के आॅनलाइन प्लेटफॉर्म के अतिरिक्त रेडियो ग्रामोदय पर भी प्रसारित किया जाएगा। कार्यक्रम के अंत में विद्यालय के प्रधानाचार्य लक्ष्मीनारायण चोपड़ा जी ने हिंदी के महत्व और इसके बदलते स्वरूप पर रोचक व्याख्यान दिया। उन्होंने कार्यक्रम के सफल संयोजन के लिए सभी शिक्षकों, विद्यार्थियों और पंचकूला से पधारी हरियाणा ग्रंथ अकादमी की टीम को धन्यवाद दिया।

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