Homeराज्यहरियाणाचिंतन मानवता भलाई के लिए जरूरी: प्रो. कुहाड़

चिंतन मानवता भलाई के लिए जरूरी: प्रो. कुहाड़

महेंद्रगढ़ (नीरज कौशिक) हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय (हकेवि), महेंद्रगढ़ के योग विभाग ने विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा  योजना (एनएसएस) इकाई के सहयोग से आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत राष्ट्रीय योग वेबीनार का आयोजन किया। इसका विषय पर्वत की गुफाओं से व्यवसायिक दुनिया तक योग का विकास था। जिसमें विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रमेश चंद्र कुहाड़ ने कहा कि आज से लगभग 12 दिन पहले सातवां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस हम सब ने मनाया। उस दिवस को मनाने की सार्थकता तभी है, जब हम योग के अभ्यास को अपने जीवन का अंग बना लें। हमारी जीवन शैली का भाग योग से जुड़ा हो और हमारी दिनचर्या योगिक दिनचर्या हो, तभी हमारा स्वास्थ्य, चिंतन, व्यवहार और व्यक्तित्व में वह लक्षण दिखाई देंगे, जो सभ्यता की, विद्वता की निशानी हैं। आज का विषय ही कुछ ऐसा है कि हमें योग के उस पक्ष को भी देखना है, जब वह कुछ लोगों द्वारा पर्वत की गुफाओं में, जंगलों में और आश्रमों में योग किया जाता था। आज योग की जरूरत पूरे विश्व को पहले से कहीं अधिक है, यही कारण है कि माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र संघ में रखे गए प्रस्ताव को कितनी सहजता के साथ पूरे विश्व में न केवल स्वीकार किया है बल्कि उसके अभ्यास के लिए भी लगातार प्रयासरत हैं।
आज के इस वेबीनार के मुख्य वक्ता मंगलोर विश्वविद्यालय के प्रो. के. कृष्ण शर्मा और विश्व विरासत संघ, दक्षिण कोरिया में शैक्षणिक निदेशक, प्रो. राजेश राज का व्याख्यान हुआ। योग विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. नीलम सांगवान ने अतिथियों का स्वागत किया और उन्हें विश्वविद्यालय के आमन्त्रण को स्वीकार करने के लिए धन्यवाद भी दिया। आजादी के अमृत महोत्सव की नोडल आॅफिसर प्रो. सारिका शर्मा ने इस कार्यक्रम की सार्थकता पर प्रकाश डाला और योग विभाग के साथ-साथ अन्य विभागों के कार्यक्रमों के बारे में भी अतिथियों को अवगत कराया। प्रो. कुहाड़ कहा कि जिस कार्य को विश्व के लोग अपने जीवन का अंग बनाने लगें, उसको अपनी जीवन चर्या में सम्मिलित कर लें। उसके प्रति आकर्षण बढ़ने लगे, तो उसमें वैज्ञानिकता, नवीनता और अनुसंधान की भी आवश्यकता महसूस की जाती है, ताकि समय के बदलते परिवेश में उसकी प्रासंगिकता बनी रहे, इसलिए हम सबको ऐसे राष्ट्रीय वेबीनार के माध्यम से यह प्रयास करना चाहिए कि हम अपने अतीत को देखें, वर्तमान में उसका प्रयोग करें, और भविष्य के लिए उसमें क्या नवीनता समय अनुकूल की जा सकती है उस पर भी चिंतन करें। जैसे सागर मंथन के पश्चात 14 रत्न निकलने की बात हमारे शास्त्रों में मिलती है, उसी प्रकार यह शैक्षणिक गोष्ठियां और चचार्यें योग के नवनीत को निकाल कर लायेंगी, जिसे पाकर लोग धन्य हो जाएंगे। ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए, यह तभी संभव है जब चचार्यें सार्थक तरीके से, विद्वानों के द्वारा, विद्वानों के बीच, सब के हित के लिए की जाएं।
योग विभाग के शिक्षक प्रभारी डॉ. अजय पाल ने बताया योग विभाग आगामी दिनों में ऐसे ही कुछ और कार्यक्रम करने के बारे में विचार कर रहा है। इस वेबिनार का प्रारम्भ विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुआ। इसके पश्चात् विश्वविद्यालय की प्रगति को प्रदर्शित करने वाली डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गई। आगे, प्रो. कुहाड़ अपने सम्बोधन में कहा कि कभी-कभी मन में यह प्रश्न आता है और लोग इस पर बहस भी करते हैं कि पर्वत की कंदरा में बैठकर योग करने वाला व्यक्ति क्या स्वार्थी है? या उसने अपने मोक्ष के लिए ही सारे संसार को त्याग कर, पर्वत की कंदरा में बैठ गया है? पहली दृष्टि में यह ऐसा ही लगता है कि वह व्यक्ति घोर स्वार्थी है, जिसने संसार को रोते-बिलखते छोड़ कर अपने सुख के लिए पर्वत की गुफा में बैठकर योग के द्वारा अपने दुखों के निवारण और सुख की चाह के लिए लगातार प्रयासरत है। लेकिन वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समुचित रूप से चिंतन करने पर यह दृष्टिकोण और स्पष्ट हो जाता है कि उच्च स्तर का चिंतन पर्वत की गुफा में बैठकर किया जाए या विज्ञान की प्रयोगशाला में दोनों के द्वारा विश्व के प्रत्येक नागरिक की भलाई के लिए ही कार्य किए जाते हैं।
प्रयोगशाला में बनायी गईं, दवाइयां, वैक्सीन जैसे आज समाज के प्रत्येक व्यक्ति को लाभान्वित कर रही हैं, वैसे ही पर्वत की गुफा में बैठकर उस योग साधक के द्वारा वह चिंतन दिया जाता है, दृष्टिकोण दिया जाता है, जिससे व्यक्ति की दिशा और दशा बदलने में मदद मिलती है। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि पर्वत की गुफा में बैठा व्यक्ति यदि उच्च चिंतन करते-करते अपना शरीर त्याग भी दे, तो वह चिंतन उसके मरने के बाद भी पूरे विश्व को ढक लेगा और जब कभी उसी चिंतन और चरित्र के स्तर का व्यक्ति पृथ्वी पर दूसरा मिलेगा तो उसके माध्यम से वह चिंतन पूरे विश्व को प्राप्त होगा। हम सब जानते हैं कि ईसाईयों की पवित्र पुस्तक ह्णबाइबलह्ण ईसा मसीह के मरने के ढाई सौ साल बाद सेंट पॉल द्वारा लिखी गई। श्रीरामचरितमानस की रचना के बारे में भी यही कहा जाता है कि श्रीहनुमान जी द्वारा बोलकर, गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखकर हमारे सम्मुख लाई गई है। पहली दृष्टि में देखने पर यह सब कल्पनातीत लगता है, लगता है कि हमें समझाने के लिए यह सारे व्याख्यान प्रस्तुत किए गए हैं लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो ब्रिटेन में ब्रॉडकास्ट किए जा रहे कार्यक्रम, बीबीसी के माध्यम से भारत के हर गांव में सुने जा सकते हैं। आपको जरूरत होती है अपने रेडियो को उस आवृत्ति पर ट्यून करने की, उसी प्रकार जब हमारी चेतना उस स्तर पर पहुंच जाती है, जिस स्तर का चिंतन उस व्यक्ति ने किया था जो पर्वत की गुफा में बैठा था, तो हमें सारी अनुभूतियां वैसी ही होने लगती हैं, जैसा उसने सोचा था, इसलिए चिंतन कभी व्यर्थ नहीं जाता।

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था कि द्रव्य अविनाशी है, द्रव्य को नष्ट नहीं किया जा सकता केवल रूपांतरित किया जा सकता है। द्रव्य ऊर्जा में बदल सकता है और ऊर्जा द्रव्य में बदल सकती है। इसके लिए उन्होंने एक फामूर्ला भी दिया ए=टू2 इसलिए कहा जा सकता है कि जो चिंतन वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में किए जाते हैं और जो चिंतन पर्वत की गुफाओं में किए जाते हैं, वह दोनों ही समाज के लिए  लाभदायक हैं उसको दिशा देने वाले हैं, बस हमें इस तथ्य को जानने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का संचालन विभाग के सहायक आचार्य और शिक्षक प्रभारी डॉ. अजय पाल ने किया, अतिथियों का परिचय विभाग के ही सहायक आचार्य डॉ. रवि कुमार शास्त्री ने किया। धन्यवाद ज्ञापन शिक्षा विभाग के आचार्य डॉ. दिनेश चहल ने किया। यह पूरा कार्यक्रम विभाग की विभागाध्यक्षा डॉ.नीलम सांगवान के विशेष सहयोग से संपन्न हुआ। इस वेबीनार में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

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