SC on SIR (आज समाज), नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर जारी विवाद पर सुनवाई के दौरान शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है। आयोग का काम सिर्फ मतदाता सूची का नियंत्रण और पर्यवेक्षण करना है। इसलिए कानून को लेकर किसी को कोई भ्रम नहीं होना चाहिए।
बिहार के फैसले का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार से जुड़े एसआईआर मामले पर आए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकता तय करने का काम निर्वाचन आयोग का नहीं है। साथ ही, अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी नागरिकता समाप्त हो गई है।
सुनवाई बेहतर करने की थी मांग
देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहन की पीठ ने प्रसेनजीत बोस की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बातें कहीं। बोस ने अपनी याचिका में, एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों की अपील पर सुनवाई करने के लिए बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल में सुनवाई प्रक्रिया को बेहतर बनाने की मांग की थी।
34 लाख अपील अभी भी लंबित
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गोपाल संकरनारायणन ने कहा कि रिपोर्ट के मुताबिक, 19 अपील ट्रिब्यूनल के समक्ष 34 लाख अपील अभी भी लंबित हैं। इस ट्रिब्यूनल से दो न्यायाधीश इस्तीफा दे चुके हैं। उन्होंने इस ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि बहुत कम (लगभग 38,000) अपीलों पर सुनवाई पूरी हुई है और उनमें से कम से कम 70% अपीलों पर फैसला अपील करने वालों के पक्ष में आया है।
पहले भी दाखिल हुईं याचिकाएं
इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इनमें से कुछ का निपटारा हो गया है और कुछ पर सुनवाई हो रही है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष के लोग एसआईआर को जनता के पक्ष में बता रहे हैं। वहीं, विपक्ष का आरोप है कि सत्ता हथियाने के लिए भाजपा सरकार एसआईआर करा ररही है।
बताते चलें कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची को अपडेट, सही और गलतियां दूर करने के लिए चलाया जाने वाला एक विशेष अभियान है। इसका उद्देश्य यह है कि मतदाता सूची में केवल पात्र भारतीय नागरिकों के नाम शामिल हों और मृत, स्थानांतरित या अपात्र व्यक्तियों के नाम हटाए जा सकें।


