क्यों मानी जाती है इसकी अवधि अशुभ?
Kharmas, (आज समाज), नई दिल्ली: सनातन धर्म में खरमास का समय बहुत विशेष और महत्वपूर्ण माना जाता है। खरमास का एक महीने का समय अशुभ माना जाता है। खरमास साल में दो बार लगता है। खरमास तब लगता है जब सूर्य देव गुरु बृहस्पति की राशि धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं। गुरु बृहस्पति की राशि में सूर्य का प्रभाव कम हो जाता है।
यही कारण है कि खरमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश या अन्य मांगलिक काम नहीं किए जाते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस साल दूसरा खरमास कब लगेगा? क्यों खरमास की अवधि को अशुभ माना जाता है?
साल 2026 का दूसरा खरमास कब है?
पंचांग के अनुसार, पहला खरमास 16 दिसंबर 2025 से शुरू हुआ था। जिसका समापन 14 जनवरी 2026 को भगवान सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ हो गया था। वहीं, इस साल 2026 में दूसरे खरमास की अवधि 14 मार्च से शुरू होगी। ये 13 अप्रैल तक रहेगी। इस अवधि में सूर्य देव मीन राशि में गोचर करेंगे।
खरमास को क्यों माना जाता है अशुभ?
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, खरमास के दौरान, सूर्य देव के साथ-साथ गुरु बृहस्पति का प्रभाव भी कम हो जाता है। गुरु का कमजोर प्रभाव इस समय सूर्य की तेजस्विता के साथ मिलता है, जोकि मांगलिक कार्यों के लिए शुभ नहीं माना जाता है। इसी वजह से इस समय विवाह, गृह प्रवेश या अन्य मांगलिक काम नहीं होते। हालांकि, खरमास में साधना, दान और आध्यात्मिक गतिविधियां पूण्य फल देने वाली मानी जाती हैं।
खरमास क्यों लगता है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव सात घोड़ों के रथ पर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। एक बार उन्होंने देखा कि उनके रथ के घोड़े थक गए हैं, तो उन्होंने रथ में गधों को जोड़ दिया। गधों की धीमी चाल की वजह से ही सूर्य देव की गति धीमी हो जाती है।
इसे ही खरमास कहा जाता है। इसके अलावा सूर्य देव के गुरु बृहस्पति की राशि धनु और मीन में प्रवेश करने पर गुरु के प्रभाव में कमी आती है। गुरु को विवाह और शुभ कार्यों का कारक माना जाता है। यही कारण है कि खरमास में शुभ कामों को टाल दिया जाता है।


