Bhishma Ashtami: जानें कब है भीष्म अष्टमी और ये क्यों मनाई जाती है?

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Bhishma Ashtami: जानें कब है भीष्म अष्टमी और ये क्यों मनाई जाती है?
Bhishma Ashtami: जानें कब है भीष्म अष्टमी और ये क्यों मनाई जाती है?

भीष्म अष्टमी के दिन किया जाता है पितरों का तर्पण
Bhishma Ashtami, (आज समाज), नई दिल्ली: हिंदू धर्म में माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है। हर साल इसी तिथि पर भीष्म अष्टमी मनाई जाती है। इसका संबंध महाभारत के पितामह भीष्म से है। वो 58 दिनों तक बाणों की शय्या पर थे। माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन ही उन्होंने प्राण त्यागे थे। बाणों की शय्या पर पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया था।

सूर्य के उत्तरायण होने के बाद ही भीष्म पितामह ने अपने प्राणों का त्याग किया था। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भीष्म अष्टमी के दिन पितरों का तर्पण किया जाता है। कहते हैं कि इस दिन पितरों का तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति प्राप्त होती है। साथ ही पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि कब है भीष्म अष्टमी?

कब है भीष्म अष्टमी

पंचांग के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरूआत कल यानी 25 जनवरी को रात 11 बजकर 10 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन 26 जनवरी को रात 9 बजकर 11 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार, इस साल भीष्म अष्टमी का व्रत 26 जनवरी 2026 को रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 29 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 38 मिनट तक रहने वाला है।

क्यों मनाई जाती है भीष्म अष्टमी?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ?भीष्म अष्टमी पितामह भीष्म की पुण्यतिथि के रूप में मनाई जाती है। भीष्म पितामह को उनके पिता शांतनु ने वरदान दिया कि उनकी इच्छा के बिना मृत्यु उनको छू नहीं पाएगी। यानि वह अपनी मर्जी के अनुसार अपने प्राण त्याग सकेंगे। महाभारत युद्ध के 10वें दिन अर्जुन ने पितामह भीष्म को बाणों की शय्या दी।

उसके बाद उन्होंने बाणों की शय्या पर लेटकर महाभारत का पूरा युद्ध देखा। भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन अपने प्राण त्यागे। तभी से इस पावन तिथि को उनकी पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है।

भीष्म अष्टमी का महत्व

सनातन धर्म में भीष्म अष्टमी के दिन व्रत रखने की परंपरा चली आ रही है। ये तिथि पितरों के तर्पण के लिए बहुत ही विशेष मानी गई है। मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर पितरों का तर्पण और उनके नाम से दान करने पर व्यक्ति को पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है। उनकी आत्मा को शांति प्राप्त होती है। पितृ दोष से छुटकारा मिलता है। इतना ही नहीं इस दिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म करने से उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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