Karnal News(आज समाज नेटवर्क)करनाल। हरियाणा के गांवों से युवाओं का सात समंदर पार जाने का क्रेज नया नहीं है। हर दूसरे घर में ‘डंकी’ या कानूनी रास्तों से विदेश जाकर डॉलर कमाने की होड़ मची है। लेकिन इस होड़ की जो कीमत इन परिवारों को चुकानी पड़ रही है, वह रूह कंपा देने वाली है। करनाल के गांव बाल पबाना के 24 वर्षीय युवक गौरव की अमेरिका के कैलिफोर्निया में हुई सड़क हादसे में मौत महज़ एक दुर्घटना नहीं है,यह एक और उस सपने की बेरहम हत्या है, जिसे एक गरीब पिता ने अपनी ज़मीन बेचकर और लाखों का कर्ज उठाकर सींचा था।
ज़मीन भी गई, ‘बुढ़ापे की लाठी’ भी छूटी
गौरव के पिता रामफल गांव में मजदूरी करते हैं। एक मजदूर के पास पूंजी के नाम पर सिर्फ उसका पसीना और थोड़ी बहुत ज़मीन होती है। रामफल ने अपने इकलौते बेटे के सुरक्षित भविष्य के लिए अपनी वह आखिरी पूंजी भी दांव पर लगा दी। लाखों रुपये का कर्ज लिया, ज़मीन बेची और 12वीं पास बेटे को अमेरिका भेज दिया। उम्मीद थी कि बेटा वहां जाकर परिवार के दिन फिराएगा, कर्ज उतारेगा और बुढ़ापे की लाठी बनेगा।
आज ज़मीन भी जा चुकी है, कर्ज का पहाड़ सिर पर खड़ा है और जिस लाठी के सहारे रामफल को अपनी जिंदगी काटनी थी, वह अमेरिका की एक सड़क पर टूट कर बिखर गई।
”सुबह मकान की बात हुई, शाम को मौत की खबर आई”
इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू वह आखिरी फोन कॉल है। हादसे वाले दिन सुबह 8 बजे गौरव ने अपने पिता को फोन किया था। उसने घर का हाल-चाल पूछा, गांव में बन रहे मकान के काम को लेकर चर्चा की। पिता-पुत्र दोनों की आंखों में एक अदद पक्के मकान का सपना तैर रहा था। लेकिन नियति की क्रूरता देखिए, सुबह जिस बेटे से मकान के निर्माण की बात हो रही थी, शाम 4:30 बजे अमेरिकी पुलिस के एक फोन ने उस पूरे परिवार के वजूद को ही ढहा दिया। भाषा की दीवार के कारण पिता पुलिस की बात समझ भी नहीं पाया, लेकिन जब हकीकत सामने आई, तो रामफल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
विदेशों में संघर्ष की ज़मीनी हकीकत
यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि विदेशों में जाकर हमारे युवाओं का जीवन कितना कठिन और असुरक्षित होता है। गौरव ने पहले एक स्टोर पर काम किया, फिर सिक्योरिटी का लाइसेंस लिया, ट्राला चलाया। हादसे से महज़ दो दिन पहले ही उसने फिर से भारी ट्राला चलाना शुरू किया था। भारी काम का दबाव, नींद की कमी या रास्तों की अनभिज्ञता—कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन एक सच यह भी है कि पराए देश में इन युवाओं के पास कोई सामाजिक सुरक्षा या तुरंत संभलने का सहारा नहीं होता।
”बस एक बार चेहरा दिखा दो” – व्यवस्था से एक बेबस पिता की गुहार
रामफल का रो-रोकर बुरा हाल है। उनकी बेबसी इस कदर गहरा गई है कि अब वे अपनी किस्मत को नहीं, बल्कि व्यवस्था को निहार रहे हैं। एक गरीब मजदूर के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह सात समंदर पार से अपने बेटे का शव वापस मंगा सके। उनकी सरकार से सिर्फ एक ही मार्मिक अपील है: “मेरा सब कुछ खत्म हो गया है, बस एक बार मेरे बेटे की शक्ल मुझे दिखा दो, ताकि मैं उसका अंतिम संस्कार कर सकूँ।”


