कम लागत में अधिक मुनाफा देती है मटर की खेती
Pea farming, (आज समाज), नई दिल्ली: मटर एक प्रमुख फसल है जिसे भारत में सर्दियों के मौसम में उगाया जाता है। मटर की खेती से किसानों को अच्छा आर्थिक लाभ होता है और यह पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आज हम आपको भारतीय जलवायु और मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर, मटर की खेती कब और कैसे की जाती है ये विस्तार से बताएंगे।

मटर की खेती के लिए सही समय

मटर ठंडे मौसम की फसल है और इसे रबी सीजन में उगाया जाता है। इसको उगाने का सही समय और तापमान निम्नलिखित अनुसार है। उत्तरी भारत में मटर की बुआई अक्टूबर के मध्य से नवंबर के अंत तक की जाती है। यदि जलवायु ठंडी और नमी वाली है, तो देरी से बुआई नुकसानदेह हो सकती है।

तापमान

मटर के अंकुरण और विकास के लिए 18-25 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श होता है। अधिक गर्मी फसल को प्रभावित कर सकती है, इसलिए ठंडे मौसम में बुआई करें।

मटर उगाने के लिए उपयुक्त मिट्टी

मटर दोमट मिट्टी में अच्छा परिणाम देती है। मिट्टी उपजाऊ और जल निकासी की सुविधा से युक्त होनी चाहिए। मिट्टी का पीएच स्तर 6.0-7.5 के बीच होना चाहिए है।

  • मटर उगाने के लिए खेत की तैयारी
  • बुआई से पहले खेत की गहरी जुताई करें।
  • जैविक खाद जैसे नव्यकोष जैविक खाद डालें। यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करेगा।
  • खेत को समतल बनाएं और मिट्टी के बड़े ढेलों को तोड़ दें।

उन्नत किस्में का चयन करें

  • किसानों को मटर की उन्नत और स्थानीय जलवायु के अनुकूल किस्मों का चयन करना चाहिए। कुछ लोकप्रिय किस्में हैं।
  • पूसा प्रगति
  • अर्का केलिक
  • जय मटर-1

बीज उपचार विधि

बीज बोने से पहले उन्हें जैविक फफूंदनाशक से उपचारित करें। यह बीज को रोगों से बचाने में मदद करेगा और अंकुरण दर बढ़ाएगा।

मटर की बुआई का तरीका

  • मटर की बुआई आम तौर पर छिटकाव विधि से की जाती है।
  • पंक्तियों के बीच 30-40 सेंटीमीटर की दूरी और पौधों के बीच 10-15 सेंटीमीटर की दूरी रखें।
  • बीज को 3-5 सेंटीमीटर गहराई में बोएं।

बीज की मात्रा

1 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 80-100 किलोग्राम मटर का बीज पर्याप्त होता है।

मटर की खेती में खाद और उर्वरक प्रबंधन

बुआई के समय नव्यकोष जैविक खाद का उपयोग करें। जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है और उत्पादन में सुधार करती है। रासायनिक उर्वरक के प्रयोग से बचें इससे मिट्टी की उर्वरता शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

मटर की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन

बुआई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। ठंडे मौसम में मटर की फसल को 2-3 सिंचाई की आवश्यकता होती है। फूल और फली बनने के समय सिंचाई आवश्यक है। खेत में जल जमाव न होने दें।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार मटर की फसल की वृद्धि में बाधा डालते हैं। हाथ से निराई या खरपतवारनाशी का उपयोग करें। बुआई के 20-25 दिन बाद पहली निराई करें। फसल के 40-45 दिन बाद दूसरी निराई करें।

मटर की फसल में कीट और रोग प्रबंधन

पत्ती मोड़क कीट फसल को नुकसान पहुंचाता है। इससे छुटकारा पाने हेतु जैविक कीटनाशक जैसे नीम का तेल का छिड़काव करें।

मटर की फसल के मुख्य रोग

  • झुलसा रोग: रोगग्रस्त पौधों को हटाएं और जैविक कवकनाशक का उपयोग करें।
  • पाउडरी मिल्ड्यू: सल्फर आधारित कवकनाशक का उपयोग करें।

मटर की फसल कटाई और उपज

मटर की फसल बुआई के 80-100 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। मटर की फसल के पकने पर उसकी फलियां हरी, मुलायम और चमकदार होती हैं।

उपज

आम तौर पर 1 हेक्टेयर में 100-150 क्विंटल हरी मटर फलियां प्राप्त होती हैं। सूखे दाने के लिए उपज 15-20 क्विंटल तक हो सकती है।

मटर की खेती के फायदे

मटर की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देती है। मटर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती है, जिससे मिट्टी उपजाऊ बनती है। मटर प्रोटीन और पोषण से भरपूर होता है। मटर की खेती भारतीय किसानों के लिए एक फायदेमंद विकल्प है। सही समय पर बुआई, उचित खेत प्रबंधन, और जैविक तरीकों का पालन करके मटर की अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।