Masan Holi: काशी में कैसे शुरू हुई चिता की रख से होली खेलने की परंपरा? जानें

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Masan Holi: काशी में कैसे शुरू हुई चिता की रख से होली खेलने की परंपरा? जानें
Masan Holi: काशी में कैसे शुरू हुई चिता की रख से होली खेलने की परंपरा? जानें

04 मार्च को मनाया जाएगा होली का त्योहार
Masan Holi, (आज समाज), नई दिल्ली: हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन होलिका दहन के बाद अगले रोज लोग रंगों से होली खेलते हैं। इस साल होली का त्योहार 04 मार्च को मनाया जाएगा। देशभर में लोग इस दिन एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाएंगे। देश के अलग-अलग हिस्सों में होली के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं। ब्रज की होली देशभर में प्रसिद्ध है। ब्रज में लड्डूमार, लट्ठमार, फूलों वाली और छड़ीमार होली खेली जाती है।

इस साल ब्रज की होली की शुरूआत हो चुकी है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश का एक ऐसा हिस्सा भी है, जहां लोग चिता की राख से होली खेलते हैं। ये होली भी बड़ी प्रसिद्ध है। इसे मसान की होली कहा जाता है। इस अनोखी होली को देखने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी मेहमान आते हैं। ये होली काशी के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है। आइए जानते हैं काशी में कैसे शुरू हुई मसान होली की पंरपरा?

मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है होली

हर साल रंगभरी एकादशी के अगले दिन काशी की मसान होली खेली जाती है। इस साल रंगभरी एकादशी कल यानी 27 फरवरी को है। 28 फरवरी को मसान की होली खेली जाएगी। श्मशान का नाम सुनकर ही मन में डर पैदा हो जाता है, लेकिन मसान होली के दौरान भगवान शिव के भक्त मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख उड़ाकर मृत्यु के उत्सव का आनंद उठाते हैं।

भगवान भोलेनाथ ने शुरू की थी परंपरा

मान्यता है कि काशी नगरी में चिता की राख से होली खेलने की परंपरा स्वयं भगवान भोलेनाथ ने शुरू की थी। इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक कारण बताया जाता है। शिव अपने विवाह के बाद पहली बार काशी पहुंचे थे, उस दिन लोगों ने होली खेलकर खुशी जाहिर की थी। इस उत्सव में सारे देवी-देवता एकत्र हुए थे। शिव पुराण और दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रंथों के अनुसार, शंकर भगवान के प्रिय गण भूत-प्रेत, यक्ष और गंधर्व इस उत्सव में शामिल नहीं हो पाए थे।

भोलेनाथ ने खेली थी मसान होली

इसके बाद भोलेनाथ ने फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी पर मणिकर्णिका घाट पर श्मशान में अपने गणों के साथ भस्म की होली खेली थी। तभी से काशी में मसान होली खेलने की परंपरा चली आ रही है। नागा साधुओं, अघोरियों और अन्य साधु संत इस उत्सव में शामिल होते हैं।

मणिकर्णिका घाट पर बाबा महाश्मशान नाथ और माता मसान काली की आरती होती है। इसके बाद जलती चिताओं के बीच राख से होली खेलने का अद्भुत उत्सव शुरू होता है। मसान की होली साधु संत ही खेलते हैं। हालांकि समय बदलने के साथ-साथ कुछ शिव भक्त भी इस होली में शामिल होने लगे हैं।

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