Guru Purnima 2026: अषाढ़ महीने की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले पर्व गुरु पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इसे ‘आषाढ़ी पूर्णिमा’ या ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। यह पर्व गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उनके सम्मान में इस दिन गुरु पूजा की जाती है।
गुरु पूर्णिमा पर गुरु के चरण धोना एक पवित्र रस्म है जो परम विनम्रता, अहंकार के त्याग और दैवीय कृपा पाने का प्रतीक है। इसे ‘पाद पूजा’ या ‘पादुका पूजा’ कहा जाता है। यह रस्म आध्यात्मिक गुरु का सम्मान करती है, जो ज्ञान के माध्यम हैं और अज्ञानता का अंधेरा दूर करते हैं। हमारे धर्म में पाद पूजा, चरणामृत, गुरु सेवा और भोग का बहुत महत्व है। इस रिपोर्ट में हम इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ
अहंकार का त्याग: गुरु के शरीर के सबसे निचले हिस्से यानी चरणों को धोने के लिए घुटनों के बल बैठना शिष्यों को उनके गर्व और अहम भाव को छोड़ने में मदद करता है।
पवित्र जल (चरणामृत): चरण धोने के लिए इस्तेमाल किए गए पानी को इकट्ठा करके पवित्र प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, जो गुरु की कृपा और शिक्षाओं को आत्मसात करने का प्रतीक है।
ऊर्जा और आशीर्वाद: पारंपरिक मान्यता है कि गुरु की आध्यात्मिक ऊर्जा और ज्ञान उनके चरणों से प्रवाहित होते हैं, जिससे उनका स्पर्श और चरण धोने का जल आंतरिक संतुलन के लिए पवित्र माध्यम बन जाते हैं।
वैदिक परंपराओं में पाद-पूजा, चरणामृत, गुरु-सेवा और भोग जैसे शारीरिक रीति-रिवाजों का इस्तेमाल रोजमर्रा के कामों को गहरे समर्पण, विनम्रता और आध्यात्मिक विकास का जरिया बनाने के लिए किया जाता है। ये अभ्यास साधक को अपना अहंकार छोड़ने और ईश्वर या आध्यात्मिक गुरु से जुड़ने में मदद करते हैं।
पाद-पूजा (चरणों की पूजा)
समर्पण का प्रतीक: किसी देवता या गुरु के चरणों को धोना या उनका सम्मान करना अहंकार और निचले ‘स्व’ के पूरी तरह से समर्पण को दर्शाता है।
कृपा का माध्यम: ज्ञानी गुरु के चरणों को उस स्रोत के रूप में देखा जाता है जहां से दिव्य ऊर्जा और ज्ञान साधक तक पहुंचता है।
अहंकार का नाश: चरणों को छूने के लिए सिर झुकाने से व्यक्तिगत गर्व खत्म होता है और गहरी विनम्रता आती है।
चरणामृत (चरणों का अमृत)
दिव्य अमृत: पवित्र चरणों को धोने में इस्तेमाल किए गए पानी या दूध में पवित्र जल, शहद और तुलसी के पत्ते जैसी चीजें मिलाकर बनाया जाता है।
आंतरिक शुद्धि: माना जाता है कि इस तरल को पीने से मन, शरीर और आत्मा शुद्ध होती है।
आशीर्वाद का वाहक: यह गुरु या देवता की कृपा की याद दिलाने और उसे पहुंचाने का काम करता है।
गुरु-सेवा (गुरु की सेवा)
निस्वार्थ कर्म: बिना किसी इनाम की उम्मीद के गुरु के लिए काम करने से स्वार्थी इच्छाएं और पिछले कर्म खत्म होते हैं।
विश्वास को गहरा करना: गुरु की सेवा करने से शिष्य और गुरु के बीच की दूरी कम होती है, जिससे हृदय उच्च सत्यों को ग्रहण करने के लिए तैयार होता है।
शिक्षा को जीना: यह ज्ञान को किताबों से निकालकर कर्म के ज़रिए रोजमर्रा की जिंदगी में लाता है।
भोग (भोजन का अर्पण)
पवित्र भेंट: भोजन पूरी शुद्धता के साथ तैयार किया जाता है और सबसे पहले ईश्वर को अर्पित किया जाता है, यह मानते हुए कि जीवन का सारा पोषण ईश्वर से ही मिलता है।
चेतना में बदलाव: अर्पित किया गया भोजन ‘प्रसाद’ (कृपा) बन जाता है, जिससे खाने की क्रिया केवल शारीरिक भूख मिटाने से बदलकर आध्यात्मिक पोषण प्राप्त करने का अनुभव बन जाती है।
कृतज्ञता: यह साधक को कुछ भी ग्रहण करने से पहले प्रकृति और जीवन के प्रति आभार व्यक्त करने की याद दिलाता है।


