मातृ शक्ति पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा संवेदनशील होती हैं। दुनिया भर में कोरोना के मरीजों की संख्या लगभग एक करोड़ पहुंचने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि छह महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी किसी भी देश के लिए यह समय राहत देने वाला नहीं है। कोरोना की अब तक न कोई दवा है, न वैक्सीन। भारत सर्वाधिक प्रभावित 5 देशों में शुमार हो चुका है और अब सरकार ने अघोषित तौर पर कोरोना पर चर्चा की जगह वापस चुनाव पर चर्चा करनी शुरु कर दी है। गृहमंत्री आभासी सभाएं कर विरोधियों को ललकार रहे हैं। रक्षामंत्री ट्विटर के मुशायरों में शामिल हो रहे हैं। राज्य सरकारें अपनी सुविधाओं के मुताबिक फ़ैसले ले रही हैं।
पुरुष प्रधान सोच और अहंकार के साथ किए जा रहे शासन की कमजोरियां खुद अपना बखान कर रही हैं। वैसे यह स्थिति अकेले भारत की नहीं है, अमेरिका, रूस, ब्राजील जैसे देशों में भी सत्ताधारियों का दंभ उनके शासन के खोखलेपन को उजागर कर रहा है। इसके बरक्स न्यूजीलैंड, जर्मनी, नार्वे जैसे देश हैं, जहां महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं और वैश्विक महामारी के वक्त देश को बड़ी मजबूती के साथ संभाले हुए हैं।
इस बीच देश की राजधानी दिल्ली में सामुदायिक संक्रमण फैलने की आशंका जतलाई जा रही है, क्योंकि रोज़ाना हज़ार से अधिक मामले सामने आ रहे हैं और इनमें से आधे से अधिक का पता नहीं चल पा रहा है कि संक्रमण का स्रोत क्या है। हालांकि केंद्र सरकार अब भी सामुदायिक प्रसार से इन्कार कर रही है। स्वास्थ्य आपदा के बढ़ने के साथ अनलॉक के कारण मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है, लेकिन उस हिसाब से स्वास्थ्य सुविधाएं देश में नहीं हैं। दिल्ली-एनसीआर में ही हाल में कम से कम 3 ऐसे मामले आ गए, जहां मरीजों को अस्पताल में जगह नहीं मिली।
इधर सुप्रीम कोर्ट ने आज प्रवासी कामगारों के लिए एक अहम फैसला सुनाया कि 15 दिनों के भीतर वापस उनके घर पहुंचाया जाए और लॉकडाउन उल्लंघन के तहत दर्ज मामले वापस लिए जाएं। कैसी विडंबना है कि जो काम लोककल्याणकारी सरकार को करना चाहिए था, उसके लिए अदालत को आदेश जारी करना पड़ा। देश में यह मुसीबत बढ़ी ही इसलिए क्योंकि नेतृत्व अपने कर्तव्यों को निभाने में पूरी तरह विफल रहा। आभासी रैलियों में चाहे खुद की कितनी तारीफ़ कर ली जाए, ज़मीन की हक़ीक़त से मुंह कैसे चुराया जा सकता है।
न्यूज़ीलैंड तो सोमवार को कोरोनामुक्त घोषित कर दिया गया है। लेकिन वहां इसे लेकर घमंड करने की जगह आगे के लिए सावधानी बरतने की बात की जा रही है। वहां की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने सोमवार को कहा कि हमें विश्वास है कि फिलहाल के लिए हमने न्यूज़ीलैंड में वायरस के प्रसार को खत्म कर दिया है। हालांकि, आगे भी इसके लिए प्रयास जारी रहेंगे। निश्चित रूप से दोबारा मामले सामने आएंगे लेकिन यह विफलता की निशानी नहीं होगी। यह इस वायरस की वास्तविकता है, लेकिन हमें पूरी तैयारी रखनी है।
न्यूज़ीलैंड में भी 25 मार्च से लॉकडाउन था। लेकिन इसके साथ टेस्टिंग पर फोकस, परिस्थितियों के हिसाब से प्रतिबंधों में छूट, लॉकडाउन की हर हफ्ते समीक्षा, शारीरिक दूरी पर ज़ोर और आवाजाही को रोकने जैसे उपाय आजमा कर जेसिंडा अर्डर्न ने अपने देश को कोरोना से फिलहाल मुक्त कर लिया  है। नाॅर्वे में प्रधानमंत्री एरना सोलबर्ग ने महामारी की शुरुआत में ही टीवी पर बच्चों से चर्चा के लिए वक्त दिया। वायरस को लेकर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया और आश्वासन दिया कि जब एक साथ बहुत सारी मुसीबतें आएं तो डरना स्वाभाविक है, इसमें कुछ गलत नहीं है। क्या चीन पर दोष मढ़ते डोनाल्ड ट्रंप या ताली बजाने की अपील करते मोदीजी कभी इस दुलार के साथ भावी पीढ़ी को आश्वस्त कर सकते हैं कि यह बुरा वक़्त भी खत्म हो जाएगा।
जर्मनी में एंजेला मर्केल ने तो अपने देशवासियों के साथ दूसरों देश के लोगों के लिए भी मदद का हाथ बढ़ाया। उन्होंने शुरु से कोरोना की भयावहता की सच्चाई को स्वीकारा और जर्मनी की जनता को भी इसे गंभीरता से लेने कहा। नतीजा ये हुआ कि पड़ोसी देशों के मुकाबले जर्मनी में कोरोना से होने वाली मौतें कम रहीं और अब रोगियों की संख्या में भी कमी आई है। ताईवान में त्साई-इंगवेन के नेतृत्व में जनवरी से ही कोरोना की रोकथाम के लिए उपाय किए जाने लगे, कम से कम 124 तरीकों से वायरस के प्रसार को रोका गया और अब लाखों की संख्या में फ़ेस मास्क अमेरिका और यूरोप के देशों में ताईवान भेज रहा है।
आईसलैंड में प्रधानमंत्री कैटरीन जैकोबस्डोटिर ने अपने हर नागरिक को कोरोना के मुफ्त टेस्टिंग की सुविधा मुहैया करवाई, जिसका नतीजा ये रहा कि रोगियों की तुरंत पहचान हुई और संक्रमण फैलने से रोका गया। फ़िनलैंड की राष्ट्रप्रमुख सना मरीन ने सोशल मीडिया के सहारे कोरोना के प्रति जागरुकता फैलाई, क्योंकि हर कोई अखबार या टीवी से खबरें नहीं देखता है।
इस जागरूकता का अच्छा असर देखने मिला। सच का स्वीकार, तकनीकी का बेहतर इस्तेमाल, राजनीति से ऊपर उठकर सही फैसले सही समय पर लेना और इनके सबके साथ हरेक देशवासी के प्रति ममत्व भाव, इन खूबियों के साथ विश्व की इन महिला राष्ट्रप्रमुखों ने एक खतरनाक महामारी का सामना किया और अपने-अपने देश को काफी हद तक बचाया। कुतर्क करने वाले कह सकते हैं कि ये देश छोटे हैं, या यहां जनसंख्या कम है, लेकिन वे फिर ये भी बताएं कि जो बड़े देश हैं, जो महाशक्तियां हैं, उनमें से कितने राष्ट्रप्रमुखों ने इस संवेदना, समझदारी और सहनशीलता का परिचय दिया।