Home संपादकीय पल्स Democracy has become a store of politics! राजनीति की दुकान बन गया लोकतंत्र!

Democracy has become a store of politics! राजनीति की दुकान बन गया लोकतंत्र!

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हमारे मित्र दिनेश भट्ट उन दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मुख्य सुरक्षा अधिकारी थे। उन्होंने खुफिया रिपोर्ट के आधार पर श्रीमती गांधी की सुरक्षा में लगे सिख जवानों को हटा दिया। इंदिरा जी, ने बंगले में सैर करते वक्त उनसे पूछा आजकल सरदारजी नहीं दिख रहे। दिनेश भट्ट ने बताया कि खुफिया विभाग की रिपोर्ट में उनसे आपके जीवन को खतरा बताया गया है। इंदिरा जी, ने कहा कि उन्हें तुरंत वापस बुलाइये, उनके हटने से देश और सिख कौम को गलत संदेश जाएगा। मेरी जान से अधिक देश अहम है। खतरे का आभास होने की बात उन्होंने अपने भाषण में भी व्यक्त की थी। आज हालात बिल्कुल उलट हैं। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपनी सुरक्षा और विलासता को अहमियत देते हैं। जनता और देश की एकता-अखंडता उनके लिए मायने नहीं रखती। सियासी फायदे के लिए वह तमाम चुनावी सभाओं में पहुंच जाते हैं मगर मरते-खटते नागरिकों का दर्द बंटाने के लिए उनके पास न वक्त है और न धन। वजह साफ है कि उससे सियासी फायदा नहीं मिलता। अब तो लाभ-हानि की राजनीति होती है। जो नितिश कुमार 2014 में नरेंद्र मोदी के साथ मंच सांझा करने को तैयार नहीं थे, वही अब उनके आगे घुटने टेकते हैं। नितिश कुमार जिन सिद्धांतों और नैतिकता की दुहाई देते थे, उनको रद्दी कागज की तरह फाड़ चुके हैं। अब वह, वही सबकुछ कर रहे हैं, जिसका कभी विरोध करते थे, क्योंकि उनकी सियासी दुकान को तभी मुनाफा होगा।

हमें याद आता है कि 2014 का चुनाव भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों-कामगारों के हक और महिलाओं की सुरक्षा पर लड़ा गया था। अब, हम देखते हैं, तो यह सब कई गुणा बढ़ चुका है। देश में महंगाई दर ऐतिहासिक रूप से 7.34 फीसदी पर है, जिसमें खाद्य पदार्थों की महंगाई दर 11.1% को पार कर गई है। वनस्पित आयल में 30 फीसदी का इजाफा हो गया है। देश का सार्वजनिक क्षेत्र आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है। 2014 में एसबीआई और उसकी सहयोगी बैंकों पर 62 हजार करोड़ का एनपीए था, जो बढ़कर करीब दो लाख करोड़ हो चुका है। इसी अवधि में पीएनबी का एनपीए 13 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 79 हजार करोड़ हो चुका है। सियासी दखल के लोक के कारण लक्ष्मी विलास बैंक डूब गया। 2014 में जहां उसका एनपीए साढ़े चार सौ करोड़ था, वहीं अब 1 लाख 19 हजार करोड़ रुपये हो गया है। इसी तरह अन्य बैंकों की भी हालत खस्ता हो चुकी है। कई बैंक दीवालिया होने की कगार पर हैं, तो एक दर्जन बैंकों का विलय कर खत्म कर दिया गया है। देश के दो दर्जन सार्वजनिक उपक्रम बेचे जा चुके हैं। अब सैन्य भूमि को कारपोरेट को लीज पर देने की तैयारी है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि किसान अपना अनाज मंडी ले जाए, तो बगैर कटौती के नहीं बिकता। मजदूर को मनरेगा में काम के लिए कमीशन पहले ही देना पड़ता है। पारिश्रमिक भुगतान के लिए वह बैंकों-डाकघरों के चक्कर लगाता है। सरकारी मशीनरी में जहां सैकड़ों में घूस चलती थी, वहां अब हजारों रुपये देने पड़ते हैं। सरकारी खरीद में कमीशन लाखों-करोड़ों में लिया जाता है। छोटी फैक्ट्रियां और कारोबार बंद हो रहे हैं। जीएसटी से लेकर तमाम सरकारी करों ने लोगों की कमर तोड़ दी है।

संगठित भ्रष्टाचार ने देश के विकास को चौपट कर दिया है। जहां देश की जीडीपी विश्व में सबसे बुरे हाल में है, वहीं कुछ कारपोरेट घराने भारी मुनाफे में हैं। अदानी की आमदनी इस बदहाल साल में ही 1.41 लाख करोड़ रुपये बढ़ी, तो अंबानी की 1.21 लाख करोड़ बढ़ गई। इनकी जीडीपी देश की जीडीपी से ऊपर पहुंच रही है। रोजगार की हालत ऐतिहासिक रूप से 50 साल में सबसे बुरे दौर में है। महिलाएं देश में सुरक्षित महसूस नहीं हैं, तभी कई बड़े देशों ने अपने यहां भारत में महिलाओं को संभलकर यात्रा करने की सलाह जारी की है। बेटियों की हालत यह है कि यहां रोजाना 88 लड़कियां बलात्कार का शिकार हो जाती हैं। मेधावी छात्राएं धनाभाव के कारण आत्महत्या कर रही हैं। लेडी श्रीराम कालेज की छात्रा ऐश्वर्या रेड्डी इसका ताजा उदाहरण है। कोरोना काल में मदद के लिए बनाये गये सार्वजनिक फंड में किसने कितना धन दिया और उसे कहां कितना खर्च किया गया, इसकी जानकारी देने से ही सरकार इंकार करती है। आरोप है कि इस धन का उपयोग सियासी प्रचार और फायदे के लिए खर्च किया गया है। इस फंड में योगदान करने वाले कारपोरेट घरानों के अनुकूल सरकारी नीतियां बनाकर फायदा पहुंचाया जा रहा है। जहां तमाम सरकारी और गैर सरकारी मुलाजिमों के वेतन भत्तों में कटौती हो रही है, वहीं सांसदों-विधायकों और मंत्रियों को बगैर यात्रा और काम के ही तमाम भत्तों का भुगतान किया गया। नेताओं ने तमाम सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए अपने एनजीओ को ही धन दिला दिया। सत्तानशीन नेताओं ने इतिहास में अब तक सबसे अधिक खर्च अपनी ब्रांडिंग पर किया है।

आपको याद होगा कि 1971 में भारत की सीमाओ पर पाकिस्तान की ओर से अतिक्रमण हो रहा था। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर भारत को संघर्ष करना पड़ता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वैश्विक कूटनीति का सामना करते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे। उन्होंने अमेरिका और चीन की परवाह किये बगैर ही सिक्किम को भी भारत में मिला लिया था। बावजूद इसके, उन्होंने इस सैन्य सफलता को चुनावी फायदे के लिए नहीं भुनाया था। आज के वक्त में सैकड़ों वर्ग किमी भूमि पर पड़ोसी देश कब्जा किये हुए हैं, हम उन्हें मुक्त नहीं करा पाते मगर सियासी फायदे के लिए सैन्य कार्यवाहियों को भुनाते हैं। पड़ोसी देशों का भय दिखाकर सैन्य हथियारों की जमकर खरीद की जा रही है। इस खरीद से किसको फायदा पहुंच रहा है, यह सर्वविदित है। सियासी दुकान में बढ़ते फायदे के कारण ही तमाम लोग सत्तारूढ़ दलों को भारी भरकम दान और दूसरे फायदे देते हैं, जिससे उनको सरकारी खजाने में लूटने का लाइसेंस मिलता है। टोल रोड इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। सरकार में बैठे लोगों का ध्यान सिर्फ अपने मुनाफे पर लगा है। उन्हें न सीमाओं की चिंता है और न ही जनहित की। उसकी सियासत धर्म, जाति और नफरत की राजनीति फलती-फूलती है, शांति सौहार्द से नहीं। अब लोकतंत्र इसी सोच में सिमट गया है। ऐसे लोकतंत्र पर काबिज होने के लिए वह साम, दाम, दंड, भेद सभी कुछ अपनाते हैं। जब उसपर काबिज हो जाते हैं, तब निवेशकों को उसका मुनाफा पहुंचाने के लिए काम करते हैं।

हमारा लोकतंत्र इस हाल में पहुंच जाएगा, शायद 1950 में संविधान लागू करते वक्त तत्कालीन नीति नियंताओं ने नहीं सोचा होगा। हालांकि उसी वक्त में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने भारत के चरित्र को समझ लिया था। चर्चिल ने अपनी संसद में कहा था कि जल्द ही वहां सत्ता दुष्टों, बदमाशों और लुटेरों के हाथ में चली जाएगी। भारत के नेता ओछे और भ्रष्ट किस्म के होंगे, जो सत्ता के लिए झगड़ेंगे और देश बरबाद हो जाएगा। राजनीतिक लूट के कारण एक दिन हवा-पानी पर भी टैक्स लगा दिया जाएगा। राजनीति सेवा से बिजनेस में तब्दील हो जाएगी। आज वही नजर आ रहा है। जनता मूढ़ बनी बैठी है और सियासी दुकाने मुनाफा कमाने में जुटी हैं। यही हाल रहा तो इस राजनीति में सब बिक जाएगा और हम कंगाल हो जाएंगे। अब न इंदिरा गांधी वाली सोच के नेता आएंगे और न पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे राष्ट्रनिर्माता। अब कोई ऐसा राजनेता नहीं दिखता जो खुद से अधिक देश के लिए सोचे और करे।

जय हिंद!

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक मल्टीमीडिया हैं)

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