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Corona and government preparations: कोरोना और सरकार की तैयारी

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284 सालों में यह पहली बार होगा कि रथयात्रा इस तरह बाधित हुई है। मंदिर के रिकॉर्ड के मुताबिक सबसे पहले 2504 में आक्रमणकारियों के कारण मंदिर परिसर 144 सालों तक बंद रहा था, इसके साथ ही पूजा-पाठ से जुड़ी परंपराएं भी बंद रहीं।  लेकिन आद्य शंकराचार्य ने इन परंपराओं को फिर से शुरू किया और तब से अब तक पूरे विधि-विधान के साथ रथयात्रा संपन्न होती रही है।
पुरी के भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा इस बार कोरोना संकट के कारण रद्द कर दी गई है। इस बार रथयात्रा 23 जून को थी और ओडिशा सरकार ने इस संबंध में कोई फ़ैसला नहीं लिया था। राज्य सरकार ने 30 जून तक सभी तरह के धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाई हुई है, लेकिन मंदिर समिति ने रथयात्रा का आयोजन बिना श्रद्धालुओं के यानि धारा-144 के तहत करने का फ़ैसला कर लिया।
इस बीच ओडिशा विकास परिषद नामक गैर सरकारी संगठन ने रथयात्रा पर रोक लगाने की मांग की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की, जिसमें कहा गया कि “रथयात्रा में जुटने वाली भीड़ से कोरोना संक्रमण फैलने का ख़तरा बहुत ज़्यादा है, लिहाजा इस पर फ़िलहाल रोक लगाई जाए। लोगों की सेहत को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट अगर दीपावली पर पटाखे जलाने पर रोक लगा सकता है तो रथयात्रा पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकती?”
इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कि महामारी के समय ऐसी सभाएं नहीं हो सकती हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिकों की सुरक्षा के हित में, इस वर्ष रथ यात्रा की अनुमति नहीं दी जा सकती है। ख़तरे के बीच लोग इकठ्ठा न हो, इसके लिए नागरिकों की सुरक्षा के हित में हम इस आदेश को पारित करते हैं। ऐसे में अब ओडिशा में रथयात्रा आयोजित नहीं होगी। कोर्ट ने कहा कि अगर वो इसके लिए अनुमति देते हैं तो भगवान उन्हें कभी माफ़ नहीं करेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला समयोचित है और बेहतरी इसी में है कि सभी लोग इसका पालन करें।राजनैतिक दलों को भी अपने कार्यकर्ताओं के जरिए जनसामान्य में जागरुकता फैलाने का काम करना चाहिए, ताकि अनलॉक के इस दौर में महामारी और घातक न बन जाए।
वैसे भी भारत के हालात इस वक्त काफी चिंताजनक बन गए हैं।  सरकार सीधे तौर पर कुछ कहे न कहे, लेकिन जिस तरह प्रधानमंत्री ने दो दिनों तक मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की और इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली के संदर्भ में बैठक की, उससे समझ लेना चाहिए कि हालात अब सरकार के बस में भी नहीं हैं। बुधवार से लेकर बृहस्पतिवार सुबह तक बीते 24 घंटे में 12,881 मामले दर्ज किए गए, जिसके बाद देश में संक्रमण के कुल मामलों की संख्या 366,946 हो गई है। जबकि मृतकों की संख्या 12,237 हो गई है।
पिछले हफ़्ते तक 10 – 11 हज़ार  मामले रोज़ाना सामने आ रहे थे अब यह आंकड़ा ने 12 हज़ार के पार चला गया है। कहना न होगा कि हालात दिन-ब-दिन और डरावने होते जा रहे हैं। यह सही है कि 1लाख 90 हज़ार से अधिक यानी अब तक करीब 52.95 प्रतिशत मरीज स्वस्थ हो चुके हैं, लेकिन जिस तरह से कोरोना फैल रहा है और इसकी कोई दवा भी अब तक नहीं बन पाई है, उसमें ठीक होने वाले मरीजों के आंकड़ों पर खुश नहीं हुआ जा सकता।
देश की राजधानी दिल्ली, आर्थिक राजधानी मुंबई समेत कई बड़े शहरों में टेस्टिंग और इलाज की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, ऐसे में छोटे शहरों और कस्बों में स्थिति कितनी चिंताजनक होगी, यह अनुमान लगाया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 30 जनवरी को ही स्वास्थ्य आपातकाल की चेतावनी दे दी थी, लेकिन हमने उसे अनसुना किया और जब 11 मार्च को वैश्विक महामारी घोषित किया, तब भी केंद्र सरकार टेस्टिंग से अधिक लॉकडाउन पर जोर देती रही।
मार्च से शुरु हुए लॉकडाउन का असर बीमारी की रोकथाम पर तो नहीं हुआ, अलबत्ता अर्थव्यवस्था चरमरा गई। और अब आर्थिक हालात संभालने के लिए अनलॉक की शुरुआत हुई है, तब देश की सेहत चरमरा गई है। अब कहा जा रहा है कि टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट ही उपाय है। यही बात सरकार पहले मान लेती तो हालात कहीं बेहतर होते। अब भी सरकार से पूछा जाना चाहिए कि विभिन्न राज्यों में इन तीन “टी” की व्यवस्था पर निगरानी रखने के लिए वो कौन से कदम उठा रही है और क्या यह निगरानी राजनीति से परे होगी।
राजधानी दिल्ली में अब टेस्टिंग की रफ्तार बढ़ाई जा रही है। छोटे अस्पतालों तक कोरोना के लिए सही जानकारी व दिशा-निर्देश देने के लिए केंद्र सरकार ने एम्स में टेलीफ़ोनिक गाइडेन्स के लिए वरिष्ठ डाक्टर्स की एक टीम गठित करने का फैसला लिया है। लेकिन यही काम 80-90 दिन पहले हो जाता तो क्या लाखों ज़िंदगियों के लिए अच्छा नहीं होता? अब  कई अस्पतालों को कोरोना के इलाज के लिए तैयार किया गया है, इसके साथ ही कुछ होटलों, बैंक्वेट हॉल आदि को भी कोरोना मरीजों के लिए तैयार किया जा रहा है।
लेकिन क्या इतने मरीजों के इलाज और तीमारदारी के लिए देश के पास प्रशिक्षित डॉक्टर्स और स्वास्थ्यकर्मी हैं? क्या इलाज के उपकरण हमारे पास पर्याप्त मात्रा में हैं? क्या डाक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ़ की सुरक्षा का इंतजाम है। कोरोना के बचाव और इलाज के लिए जो सामान इस्तेमाल हो रहा है, उसके कचरे का निपटारा किस तरह किया जा रहा है? क्योंकि यह कचरा अगर सही तरह से नष्ट नहीं हुआ तो और कई बीमारियों का कारण बन सकता है। क्या सरकार ने इन सारे सवालों पर विचार किया है, या इसमें भी आत्मनिर्भर बनने का मशविरा मिल जाएगा?
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