Home संपादकीय विचार मंच Why is Shriram called Maryada Purushottam?: मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहलाते हैं श्रीराम?

Why is Shriram called Maryada Purushottam?: मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहलाते हैं श्रीराम?

6 second read
0
35

बहुत लंबे इंतजार के बाद आखिरकार भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में राममंदिर निर्माण का करोड़ों देशवासियों का सपना साकार होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय तक चले मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट के आदेश पर ही अब अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण होगा। अयोध्या में राममंदिर को लेकर कुछ पक्षों द्वारा जानबूझकर बेवजह का विवाद खड़ा किया जाता रहा। हालांकि तमाम हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में अयोध्या नगरी के अस्तित्व और वहीं पर भगवान श्रीराम के जन्म लेने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
5 अगस्त को अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन को लेकर देशवासियों में उत्साह का प्रमुख कारण यही है कि श्रीराम इस देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्यदेव हैं। श्रीराम न सिर्फ हिन्दुओं अथवा भारतवासियों के लिए परम पूजनीय हैं बल्कि दुनिया के अनेक देशों के लोग भी उन्हें भगवान और मयार्दा पुरूषोत्तम के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए पूजते रहे हैं। वे भारत की पहचान और राष्ट्रीय के प्रतीक हैं। लॉकडाउन के दौरान दूरदर्शन पर प्रसारित की गई रामायण देखने के बाद तो नई पीढ़ी के बच्चे भी मयार्दा पुरूषोत्तम श्रीराम के पावन चरित्र के मुरीद हो गए। दरअसल श्रीराम के आदर्श, उनका अनुकरणीय और आज्ञापालक चरित्र तथा रामायण काल के अन्य सभी पात्रों की अपार निष्ठा, भक्ति, प्रेम, त्याग एवं समर्पण अपने आप में अनुपम है और नई पीढ़ी को धर्म एवं आदर्शों की प्रेरणा देने के साथ-साथ उसमें जागरूकता का संचार करने के लिए भी पर्याप्त है। वाल्मिकी रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम चन्द्रमा के समान अति सुंदर, समुद्र के समान गंभीर और पृथ्वी के समान अत्यंत धैर्यवान थे तथा इतने शील सम्पन्न थे कि दुखों के आवेश में जीने के बावजूद कभी किसी को कटु वचन नहीं बोलते थे। वे अपने माता-पिता, गुरूजनों, भाईयों, सेवकों, प्रजाजनों अर्थात हर किसी के प्रति अपने स्नेहपूर्ण दायित्वों का निर्वाह किया करते थे। माता-पिता के प्रति कर्त्तव्य पालन एवं आज्ञा पालन की भावना तो उनमें कूट-कूटकर भरी थी। उनकी कठोर से कठोर आज्ञा के पालन के लिए भी वह हर समय तत्पर रहते थे।
श्रीराम का चरित्र बेहद उदार प्रवृत्ति का था। उन्होंने उस अहिल्या का भी उद्धार किया, जिसे उसके पति ने देवराज इन्द्र द्वारा छलपूर्वक उसका शीलभंग किए जाने के कारण पतित घोषित कर पत्थर की मूर्त बना दिया था। जिस अहिल्या को निर्दोष मानकर किसी ने नहीं अपनाया, उसे भगवान श्रीराम ने अपनी छत्रछाया प्रदान की। लोगों को गंगा नदी पार कराने वाले एक मामूली से नाविक केवट की अपने प्रति अपार श्रद्धा व भक्ति से प्रभावित होकर भगवान श्रीराम ने उसे अपने छोटे भाई का दर्जा देकर मोक्ष भी प्रदान किया। अपनी परम भक्त शबरी नामक भीलनी के झूठे बेर खाकर शबरी का कल्याण किया। महारानी केकैयी ने जब महाराजा दशरथ से राम को 14 वर्ष का वनवास और उनके लाड़ले पुत्र भरत को श्रीराम की जगह राजगद्दी सौंपे जाने का वचन मांगा तो दशरथ विकट धर्मसंकट में फंस गए थे। वे बिना किसी कारण राम को 14 वर्ष के लिए वनों में भटकने के लिए भला कैसे कह सकते थे और श्रीराम में तो वैसे भी उनके प्राण बसते थे। दूसरी ओर वचन का पालन करना रघुकुल की मयार्दा थी। ऐसे में जब श्रीराम को माता केकैयी द्वारा यह वचन मांगने और अपने पिता महाराज दशरथ के इस धर्मसंकट में फंसे होने का पता चला तो उन्होंने खुशी-खुशी उनकी यह कठोर आज्ञा भी सहज भाव से शिरोधार्य की और उसी समय 14 वर्ष का वनवास भोगने तथा छोटे भाई भरत को राजगद्दी सौंपने की तैयारी कर ली। श्रीराम द्वारा लाख मना किए जाने पर भी उनकी पत्नी सीता जी और अनुज लक्ष्मण भी उनके साथ वनों में निकल पड़े।
वास्तव में विधि के विधान के अनुसार राम को दुष्ट राक्षसों का विनाश करने के लिए ही वनवास मिला था। उन्होंने अपने मानव अवतार में न तो भगवान श्रीकृष्ण की भांति रासलीलाएं खेली और न ही कदम-कदम पर चमत्कारों का प्रदर्शन किया बल्कि उन्होंने सृष्टि के समक्ष अपने क्रियाकलापों के जरिये ऐसा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी वजह से उन्हें मयार्दा पुरूषोत्तम कहा गया। राम-रावण के बीच हुए भीषण युद्ध की बात की जाए तो वह केवल दो राजाओं के बीच का सामान्य युद्ध नहीं था बल्कि दो विचारधाराओं का संघर्ष था, जिसमें एक मानव संस्कृति थी तो दूसरी राक्षसी संस्कृति। एक ओर क्षमादान की भावना को महत्व देने वाले और जनता के दुख-दर्द को समझने एवं बांटने वाले वीतरागी भाव थे तो दूसरी ओर दूसरों का सब कुछ हड़प लेने की राक्षसी प्रवृत्ति। रावण अन्याय, अत्याचार व अनाचार का प्रतीक था तो श्रीराम सत्य, न्याय एवं सदाचार के। यही नहीं, सीता जी के अपहरण के बाद भी श्रीराम ने अपनी मयार्दाओं को कभी तिलांजलि नहीं दी। इसलिए भी उन्हें मयार्दा पुरूषोत्तम कहा जाता है।
मयार्दा पुरूषोत्तम श्रीराम में सभी के प्रति प्रेम की अगाध भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनकी प्रजा वात्सल्यता, न्यायप्रियता और सत्यता के कारण ही उनके शासन को आज भी आदर्श शासन की संज्ञा दी जाती है और आज भी अच्छे शासन को रामराज्य कहकर ही परिभाषित किया जाता है। रामराज्य यानी सुख, शांति एवं न्याय का राज्य। तो ऐसे थे मयार्दा पुरूषोत्तम श्रीराम, जिनकी जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने को लेकर आज करोड़ों देशवासी उत्साहित हैं।

योगेश कुमार गोयल
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

Load More Related Articles
Load More By Yogesh Kumar Goyal
Load More In विचार मंच

Check Also

Haseen Vishakanyaon ka mayavi jaal: हसीन विषकन्याओं का मायावी जाल

दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग के दो अधिकारियों को जासूसी करते हुए पकड़े जाने पर पिछले दि…