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What impact will the electoral results have on national politics? राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर डालेंगे चुनावी नतीजे?

चार राज्यों और एक केन्द्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणामों का समग्रता से आकलन करें तो जहां केरल और असम में पहले से सत्तारूढ़ दल ही पुन: सत्ता हासिल करने में सफल हुए हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में 200 पार का नारा लगाकर सत्ता पाने के लिए मीडिया मैनेजमेंट और साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल कर अपनी सारी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा 80 सीटें भी नहीं जीत पाई जबकि तृणमूल कांग्रेस तीसरी बार रिकॉर्ड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी है।
पुडुचेरी में भाजपा गठबंधन सरकार बनाने में सफल हुआ है लेकिन केरल में उसका खाता तक नहीं खुला और तमिलनाडु में सहयोगी अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बावजूद वह काफी पिछड़ गई, जहां एक दशक बाद जनता ने द्रमुक को शासन संभालने का अवसर दिया है। बहरहाल, इन पांच प्रदेशों के जो चुनाव परिणाम सामने आए हैं, वे आने वाले समय में न केवल इन राज्यों की राजनीति पर बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा असर डालेंगे और सबसे ज्यादा असर पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों का होगा।
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अति आत्मविश्वास से लबरेज होकर ह्यसोनार बांग्लाह्ण के नारे के साथ इस राज्य को अपने जीवन-मरण का प्रश्न बनाकर चुनाव लड़ा था, जिसे जीतने के लिए उसने तमाम तरह के पैंतरों का इस्तेमाल किया और देश में फैले कोरोना प्रकोप के बीच पूरे लाव लश्कर के साथ अपनी सारी ताकत यहां झोंक दी थी लेकिन भाजपा के अति आक्रामक चुनाव प्रचार तथा ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशों के बीच जनता ने बंगाल की सत्ता फिर से प्रचण्ड बहुमत के साथ ममता की झोली में डाल दी। मतुआ समुदाय को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री का चुनावी प्रक्रिया के बीच किया गया बांग्लादेश दौरा भी भाजपा के काम नहीं आया।
भाजपा की हार के प्रमुख कारणों की चर्चा करें तो पार्टी के पास ममता के मुकाबले कोई मजबूत स्थानीय चेहरा न होना, कांग्रेस-वाममोर्चा के निष्प्रभावी हो जाने से चुनाव का पूरी तरह द्विपक्षीय हो जाना, तृणमूल के पक्ष में मुस्लिम मतों का पूर्ण धु्रवीकरण, भाजपा नेताओं की ममता पर की गई टिप्पणियों के चलते महिला मतदाताओं का ममता के पक्ष में एकजुट होना इत्यादि प्रमुख रहे।
उधर ममता बनर्जी ने एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर से बचने के लिए न केवल अपने 160 प्रत्याशी बदले बल्कि 28 विधायकों तथा 5 मंत्रियों के टिकट भी काटे और 2016 के मुकाबले और भी मजबूत होकर पुन: सत्तासीन हुई हैं। असम में भाजपा गठबंधन की वापसी सुखद मानी जा सकती है क्योंकि वहां पिछले पांच साल से सत्ता में बने रहने के बावजूद भाजपा जिन मुद्दों को लेकर यहां सत्ता में आई थी, उन तमाम मुद्दों को लेकर राज्य में असमंजस की स्थिति बरकरार थी। उत्तर-पूर्वी भारत में असम सबसे बड़ा राज्य है, जो भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण था। हालांकि करीब डेढ़-दो साल पहले उसे असम में देश के नागरिकता कानून में केन्द्र सरकार के संशोधनों के खिलाफ व्यापक प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा था लेकिन समय के साथ उसने वहां अपनी स्थिति मजबूत की। भाजपा गठबंधन का मुकाबला कांग्रेस गठबंधन के साथ था लेकिन कांग्रेस के पास तरुण गोगोई जैसे दिग्गज नेता के अभाव में उसकी राह शुरू से ही मुश्किल लग रही थी।
दूसरी ओर भाजपा के पास सवार्नंद सोनोवाल तथा कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए हेमंत बिस्वा की आक्रामक जोड़ी थी, जिन्होंने भाजपा की राह चुनाव के दौरान आसान बना दी। मुख्यमंत्री सवार्नंद सोनोवाल की जनहितैषी छवि भी भाजपा की जीत का आधार बनी जबकि कांग्रेस यहां भी जमीनी हकीकत पहचानने में विफल रही। कांग्रेस ने बदरूद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन किया था और इसी आधार पर भाजपा हिन्दू मतों का धु्रवीकरण अपने पक्ष में करने में सफल हो गई। पुडुचेरी जीतने के बाद भाजपा के खाते में एक और प्रदेश जुड़ गया है। पुडुचेरी में चार साल से कांग्रेस की सरकार थी लेकिन चुनाव से पहले ही उसने अधिकांश विधायकों का समर्थन खो दिया था और कुछ ने सत्तारूढ़ पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया था।
महज 30 सीटों वाले इस छोटे से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के धराशायी होने के बाद कांग्रेस की सांगठनिक क्षमता पर गंभीर सवाल भी उठे थे। इस घटनाक्रम के बाद तय लग रहा था कि यहां भाजपा अपने सहयोगी और कांग्रेस के बागी एन रंगास्वामी के दल के साथ गठजोड़ कर अपना परचम लहराने जा रही है।
योगेश कुमार गोयल
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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