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Water, flood, Bihar and us like amrit: अमृत तुल्य जल, बाढ़, बिहार और हम

जल जिससे जीवन चल रहा है, जिसका हमारे शरीर के निर्माण मे बहुत बड़ा योगदान है, जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, ये बना है, प्रकृति के दो तत्वों के मिलने से। विज्ञान की किताबों मे दी गयी परिभाषा के अनुसार, जब हाइड्रोजन के दो अणु एवं आॅक्सिजन का एक अणु आपस मे मिलते हैं तो जल का निर्माण होता है। जल बनानेवाले दोनों तत्व प्रकृति मे प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध हैं, फिर भी आज तक कहीं भी जल बनाने की फैक्ट्री नहीं लगाई गयी है। क्या कभी सोंचा है, ऐसा क्यों है?
आखिर क्यों हम जल के लिए भूगर्भ, नदी, तालाब और झरनों पर ही निर्भर क्यों हैं? इतिहास की जितनी भी प्राचीन सभ्यताओं के बारे मे अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि, हर सभ्यता मे नगरों का उद्गम स्थान किसी न किसी नदी के किनारे ही हुआ है। इन सबसे जल के महत्व का पता चलता है। ऋंग्वेद मे जल के बारे मे कहा भी गया है, अप्सु अन्त: अमृतम अप्सु भेषजम अपाम उत प्रशस्तये, देवा: भवत वाजिन:। अर्थात जल में अमृत है, जल में औषधि है। हे ऋत्विज्जनो, ऐसे श्रेष्ठ जल की प्रशंसा अर्थात् स्तुति करने में शीघ्रता बरतें प्रयोगशाला मे छोटे मात्रा मे तो जल बनाया जा सकता है, किन्तु इसका वृहत स्तर पर उत्पादन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हाइड्रोजन एवं आॅक्सिजन दोनों काफी ज्वलनशील है। एक मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक हमारा पूरा शरीर बनाने मे लगभग 70% पानी का योगदान है। हमारे शरीर के विभिन्न अंगो मे भी जल का बहुत बड़ा योगदान है। मानव के फेफड़ों मे लगभग 83%, गुर्दे मे 79%, हड्डियों मे 31%, और मस्तिष्क मे 73% पानी पाया जाता है। मानव के अलावा जानवरों एवं पौधों का भी जीवन, जल के बिना संभव नहीं है।
किन्तु, जब यही जल शरीर मे बढ़ जाये,तो, बीमारी का कारण, नदियों मे बढ़ जाये तो, बाढ़ का कारण एवं जब खेतों/जंगलों मे बढ़ जाये तो, फसल एवं पेड़ पौधों के विनाश का कारण बन जाता है। अभी उत्तर एवं पूर्वी भारत के कई प्रांत बाढ़ की विभीषिका से एक बार फिर से त्रस्त हैं। मूलत: इन प्रदेशों की अर्थव्यवस्था कृषि एवं इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों पर आश्रित है, जो बाढ़ के कारण लगभग तबाह हो गयी है। खासकर बिहार मे बाढ़ की विभीषिका अपने चरम पर है।
यहां की अधिकांश जनसंख्या बाहर के प्रदेशों मे जाकर या तो नौकरी करती है, अथवा गाँव मे रहकर कृषि कार्य। अभी कोरोना के कारण छोटी-मोटी नौकरी या लघु उद्योग से जीवन यापन करनेवाले अधिकतर लोग देश के विभिन्न प्रांतो से भागकर अपने प्रदेश मे आकर फंसे हुये हैं। इनमे से कुछ तो अपनी बची-खुची पूंजी खेतों की मिट्टियों मे इस उम्मीद से जमिदोंज कर दिये थे, कि यही मिट्टी 3-4 महीनों बाद सोने जैसे फसल से घर की डेहड़ी को भर देगी, तभी अतिवृष्टि एवं बांध टूटने के कारण, इस प्रांत के कई हिस्सों मे लोगों की सारी उम्मीदों को इस पानी ने एक झटके मे, अपने तेज धार मे न जाने कहाँ बहा ले गयी। ये विभीषिका कोई पहली बार नहीं आई है। कई सालों से बिहार, इस समस्या से त्रस्त है। 2001 एवं 2008 मे आई त्रासदी एक बार फिर से ताजी हो गई, लेकिन बाढ़ की समस्या एवं उससे जुझते लोग, जितना परेशान 2008 मे थे, उतना ही परेशान 2020 मे भी दिख रहे हैं! इसका मुख्य कारण नदियों, तालाबों, नहरों एवं झीलों मे मानव का अतिक्रमण एवं नदियों/नहरों की उपेक्षा है। प्राचीन काल मे नदियों/तालाबों/झीलों को जीवन का अभिन्न अंग माना जाता था, जिसका धीरे-धीरे आधुनिकता के नाम पर मानव ने खूब दोहन किया और अब उसे परितयक्त कर दिया है।
विभिन्न जलस्रोतों के किनारे रहने वाले लोगों ने धीरे-धीरे घर के कचरे को, इन जल स्रोतों मे डालना शुरू किया, फिर उसके ऊपर मिट्टी भरकर अपने घर का विस्तार कर लिया, या कोई नया निर्माण कर लिया। शहर फैलते गए, नवीन नगर बसते गए, और विकास के इस क्रम मे ये प्राकृतिक जलस्रोत सिकुड़ते गए। प्रचुर जल की उपलब्धता इस क्षेत्र के लिए कई सालों से अभिशाप बनते आ रही है, किन्तु इसे अवसर मे बदला जा सकता है। कोशी नदी जिसे बिहार का शोक भी कहा जाता रहा है, का उद्गम स्थल हिमालय के गोसा इथान शिखर के उत्तर मे है, जो नेपाल होते हुए बिहार मे प्रवेश करती है और बिहार के भागलपुर के पास गंगा मे समाहित हो जाती है। इसी कोशी नदी मे नेपाल की अन्य सात नदियां मिलती हैं, जिन्हें नेपाल मे सप्तकोशी नदियां कहा जाता है। जिसप्रकार ग्रीन हाउस गैसों के कारण ग्लेसियर पिघल रहे हैं, आनेवाले समय मे ऐसी बाढ़ कई बार आएगी और अगर हम सचेत नहीं हुये, तो हर बार यही विभीषिका झेलने को मजबूर होंगे। कितना अच्छा होता कि कोशी नदी एवं अन्य बाढ़ लानेवाली नदियों के आस-पास जल पर्यटन और वॉटर स्पोर्ट्स जैसे गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता।
इसके अलावा इन नदियों से देश के दूसरे नदियों को जल्द-से-जल्द जोड़ दिया जाता ताकि प्रकृति की जल रूपी अमूल्य सम्पदा जिसे हम 20 रुपये देकर ब्रांडेड कंपनियों से खरीदकर पीते हैं, सबको सस्ता और सुलभ रूप से मिलता। ये सत्य है कि, प्राकृतिक संसाधनों एवं उधोगों की कमी से जूझते बिहार की इसी मिट्टी ने हजारों प्रतिभाओं को जन्म दिया है। ये प्रतिभाएं देश मे कई सरकारी एवं निजी विभागों मे अति महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सिर्फ दस सालों मे जीतने आईएएस और आईपीएस बने हैं, उनमे लगभग 25% बिहार या बिहार मूल से संबन्धित हैं। ये सभी लोग विभिन्न प्रांतो मे राष्ट्र के नीति निमार्णों मे कहीं न कहीं योगदान दे रहे होंगे। आज समय की मांग है कि ये लोग, सिर्फ आईएएस ही नहीं, सभी सफल लोग, चाहे वो व्यवसायी हों, निजी क्षेत्र मे हों या अन्य सरकारी विभागों मे बड़े पदों को सुशोभित करते हों, एकबार अवश्य अपने अंतरात्मा से पूछे, जिस मिट्टी की सड़कों से होते हुए, बाढ़ आनेपर नावों के सहारे विद्यालय गए, और अब कहीं राष्ट्र निर्माण मे योगदान दे रहे हैं, उन्होने अपनी उस मिट्टी के लिए क्या किया, इसे समृद्ध और खुशहाल बनाने मे कोई योगदान दिया क्या? इस बारे मे एक बार अवश्य सोचें ।

विनय कुमार ओझा
(लेखक टिप्पणीकार हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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