उत्तर प्रदेश में इन दिनों विपक्ष की राजनीति का केंद्र पश्चिमी जिले बने हुए हैं। यूपी में चौथे नंबर की पार्टी पर बीते कुछ दिनों से विपक्षी राजनीति की धुरी बन चुकी कांग्रेस ताबड़तोड़ पश्चिम में अपनी सक्रियता बनाए हुए है। हाथरस कांड में सीधे सड़कों पर उतर आना हो या लगातार किसान रैलियों को संबोधित करना हो, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का खासा जोर अब प्रदेश के इसी इलाके से पार्टी के पुनर्जीवन का रास्त तलाशने पर है। पश्चिम में मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मथुरा, बागपत में प्रियंका की रैलियों में खासी भीड़ जुटी और दिल्ली से लेकर पूरे रास्ते उनका जगह जगह जोरदार स्वागत हुआ। पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई कद्दावर नेता कांग्रेस में हैं और हाल ही में शामिल भी हो रहे हैं। जाट, जाटव, गुर्जर से लेकर अन्य कृषक समुदायों में अपनी स्वीकार्यता को देखते हुए कांग्रेस को लग रहा है कि यूपी फतह के लिए उसकी राह पश्चिम यूपी से ही खुलेगी। असरदार जाट नेता पंकज मलिक से लेकर हरियाणा के युवा चेहरे दीपेंद्र हुड्डा तक प्रियंका गांधी के साथ शाना ब शाना पश्चिम की रैलियों में खड़े नजर रहे हैं। गुर्जर समाज के असरदार नेता भड़ाना बंधु पहले से ही प्रियंका के पाले में खड़े हो गए हैं तो देश भर में गुर्जरों के मजबूत चेहते सचिन पायलट भी पश्चिम में प्रियंका व कांग्रेस के लिए पसीना बहाने को तैयार दिखते हैं।
दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव हों या 2017 के विधानसभा चुनाव, बीजेपी की जीत का मार्ग पश्चिम यूपी से ही प्रशस्त हुआ था। प्रदेश के पश्चिम में ही पहले चरण में मतदान होता है और यहां मिलने वाले व्यापक समर्थन का असर फिर पूरा प्रदेश में होता है। बीते दो लोकसभा चुनावों और फिर पिछले विधानसभा चुनावों को देखें तो बीजेपी को पश्चिम में जबरदस्त सफलता मिलती रही है।
हालांकि इस बार बीजेपी की हवा पश्चिम में खराब है। उसके नेताओं को पश्चिमी यूपी के गांवों से लेकर शहरों तक में कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाटों व मुसलमानों में उपजा वैमनस्य किसान आंदोलन की हवा में गुम होता नजर आ रहा है औ एक बार फिर से ये दोनो एक साथ मंच साझा कर रहे हैं। मेरठ में प्रियंका गांधी की रैली में मुसलमानों तो मुजफ्फरनगर की किसान पंचायत में जाटों ने बढ़चढ़ कर भागीदारी की। जाटवों, बाल्मीकी समाज के नौजवानों में प्रियंका गांधी के हाथरस कांड में सड़क पर उतरने से साहनुभूति की एक लहर पैदा हुयी है।
कांग्रेस की उत्तर प्देश में खोयी यी जमीन हासिल करने की छटपटाहट काफी दिनों से नगर आ रही है। इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनावों में लगा कि कांग्रेस इस बार नए तरीके से चुनाव लड़ेगी और अगर जीत नहीं सकी तो भी अपनी वापसी प्रभावशाली तरीके से कर सकेगी। जाने-माने रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार अभियान की कमान संभाली। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर ब्राह्मण वोटों को साधने की रणनीति बनाई गई। राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष और अमेठी के राजा संजय सिंह को चुनाव प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया। विधायक दल के नेता प्रमोद तिवारी पहले से ही मैदान में थे।
राहुल गांधी की बेहद सफल लखनऊ सभा, सोनिया गांधी के वाराणसी के शानदार रोड शो और राहुल की जन सभाओं में उमड़ती भीड़ ने कांग्रेसियों का उत्साह बढ़ाया और दिल्ली में भी माहौल बनने लगा। लेकिन तभी उड़ी हमले के बाद आतंकवादियों के ठिकानों पर सेना द्वारा की गई पहली सर्जिकल स्ट्राइक ने माहौल बदल दिया।  इस माहौल में किसानों-नौजवानों के मुद्दे हवा हो गए और सिर्फ और सिर्फ एक ही मुद्दा रहा कि पहली बार आतंकवादियों को सेना ने सबक सिखाया। इस राष्ट्रवादी ज्वार को पहचानने में कांग्रेस और उसके रणनीतिकार नाकामयाब रहे। उन्होंने सेना की कार्रवाई पर ही सवाल उठाकर खुद को जनता के बीच में खलनायक बना डाला और उनके इस घातक कदम ने कांग्रेस की नाव की पतवार ही तोड़ दी। डूबती नाव को बचाने के लिए आनन-फानन में कांग्रेसी नेतृत्व ने बीच चुनाव मैदान से शीला दीक्षित को वापस बुलाया। ’27 साल यूपी बेहाल’ के अपने चुनावी नारे को तिलांजलि दी और अखिलेश यादवके  नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी से सौ सीटें पाकर समझौता कर लिया।
अब उत्तर प्रदेश कांग्रेस की वही टूटी-फूटी नाव लेकर और उसकी पतवार संभालकर प्रियंका गांधी ने  मोर्चा संभाला है। हालांकि प्रियंका को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी 2019 में ही मिल गई थी। लोकसभा चुनाव में उन्होंने आधे राज्य की चुनावी जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद पूरे राज्य की प्रभारी बनाई गईं। लेकिन उनकी सक्रियता अब बढ़ी है। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद सोनभद्र में आदिवासियों की जमीन को लेकर हुए हिंसक संघर्ष के मुद्दे पर प्रियंका ने धरना दिया और हाथरस कांड में अपनी सक्रियता दिखाई। 2020 का पूरा साल कोविड प्रतिबंधों की भेंट चढ़ गया। लेकिन इस दौरान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने जरूर लगातार जिलों में धरने-प्रदर्शन और गिऱफ्तारियों के जरिए कांग्रेस को सक्रिय बनाए रखा। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविधता वाले राज्य में लल्लू की भी सीमाएं हैं, इसलिए अब जब विधानसभा चुनाव का एक साल ही है, प्रियंका को खुद आगे आकर कमान संभालनी पड़ी है। किसानों के आंदोलन ने प्रियंका को लोगों के बीच सीधे पहुंचने का अवसर दिया है और इसे वह बखूबी इस्तेमाल भी कर रही हैं। सहारनपुर, बिजनौर, बघरा (मुज़फ्फरनगर) की उनकी रैलियों को जबरदस्त कामयाबी मिली है।
कांग्रेस की योजना आने वाले दिनों में किसानों के मुद्दे को गर्माने के साथ ही ज्यादा से ज्यादा जनता के सवालों पर उनके बीच जाने की है। इसके साथ ही प्रयागराज में मौनी अमावस्या पर गंगा स्नान और फिर प्रशासन द्वारा निषादों की नावों में तोड़फोड़ की ख़बर सुनकर उनके बीच जाकर प्रियंका अपनी दादी इंदिरा गांधी के रास्ते पर चलती दिखती हैं। निषादों के मुद्दे पर कांग्रेस की नदी अधिकार यात्रा ने नदियों के किनारे बसे केवट, मल्लाह, धीमर, कहार सहित कई समुदायों को अपने साथ जोड़ा है। लेकिन जनता से सीधे जुड़ने के उनके इस तरीके का फायदा कांग्रेस को तब मिलेगा, जब उनकी इस मेहनत को जमीन पर पार्टी का संगठन आगे बढ़ाए। इसके लिए प्रदेश कांग्रेस के उन सभी कील कांटों को दुरुस्त करने की जरूरत है, जो अब तक राज्य में पार्टी के विस्तार और विकास में रोड़ा बने हुए हैं।
चुनावी तैयारियों के तहत टीम प्रियंका ने जातीय और क्षेत्रीय संतुलन मजबूत करते हुए दो दिन पहले  प्रदेश इकाई की कमेटी का विस्तार करते हुए  69 नए पदाधिकारी नियुक्त कर दिए हैं ।
 अक्टूबर 2019 में अजय कुमार लल्लू की अध्यक्षता में गठित प्रदेश कमेटी में अब तीन नए उपाध्यक्ष, 13 महासचिव और 53 सचिव बढ़ाए गए हैं।
विश्व विजय सिंह, गयादीन अनुरागी और दीपक कुमार उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
संजीव शर्मा, पुष्पेंद्र सिंह, राहुल छिछारिया, अंशु तिवारी, सुशील पासी, फूल कंवर, श्याम सुंदर उपाध्याय, शिव पांडेय, धीरेंद्र प्रताप सिंह, देवेंद्र प्रताप सिंह, त्रिभुवन नारायण मिश्रा, मनिंद्र मिश्रा और कुमुंद गंगवार को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया है।
 मीडिया संयोजक ललन कुमार कहते हैं कि  नयी नियुक्तियों के साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्षों की संख्या आठ हो गई है। इसके साथ ही पार्टी के 23 महासचिव और 75 हो गए हैं। प्रियंका गांधी की रणनीति के मुताबिक कहना है जल्द ही पार्टी के चार कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त किए जा सकते हैं।
कांग्रेस के लिए राहत की बात यह है कि बीते एक साल में उत्साही, आंदोलनकारी व ईमानदार नौजवानों की टीम को अपने साथ लाने में वह सफल रही है। नदी उन्नाव, शाहजहांपुर, हाथरस, सोनभद्र के आंदोलन हों, नदी अधिकार यात्रा हो या फिर किसानों के आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी रही हो, कांग्रेस की युवा ब्रिगेड ने बखूबी मोर्चा संभाला है। प्रियंका गांधी की हालिया कोशिश पार्टी के पुराने नेताओं के साथ नौजवानों को जोड़कर पार्टी को फिर से खड़ा करने की रही है। जहां पुराने तपे तपाए नेताओं के अनुभव का लाभ लेते हुए नौजवान सक्रिया चेहरों को सड़क पर उतर पार्टी के लिए जमीन तैयार की जा रही है।
इतना साफ है कि आने वाले दिनों में प्रियंका गांधी के तरकश में कई तीर इस, तरह के हैं जो मौजूदा सरकार के लिए मुसीबत खड़ी करेंगे साथ ही यूपी में अरसे से विपक्ष के तौर पर देखे जाने वाले सपा-बसपा को भी बैकफुट पर जाने को मजबूर करेंगे। गुरिल्ला शैली में टीम प्रियंका का अचानक ज्वलंत मसलों पर सड़क पर उतर आक्रामक हो जाना बहुतों को सांसत में डाल रहा है और जब विधानसभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरु हो गयी तो ये सिलसिला और तेज होगा।