डीडीसी चुनाव में श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) में भाजपा प्रत्याशी की जीत की चहूंओर चर्चा है। जीतने वाले जीत का डंका बजा रहे हैं। उन्हें यह लग रहा है कि चुनाव जीत लेने भर से ही कश्मीर की समस्या खत्म हो जाएगी। शायद ऐसा नहीं है। वहां जम्हूरियत, कश्मीरियत व इंसानियत चाहिए। इसकी चर्चा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। अटल जी की इन बातों की वहां अब भी तारीफ होती है। मोदी सरकार और संघ परिवार को समझना होगा कि कश्मीर की समस्या जमीन या भू-भाग की समस्या नहीं है, ये लोगों की समस्या है। लोग तब तक मोदी सरकार पर यकीन नहीं करेंगे जब तक कि उन्हें प्यार से समझाने की कोशिश नहीं की जाएगी। डीडीसी चुनाव से लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू होने का आभास तो होगा लेकिन क्या वाकई में लोकतंत्र पूरी तरह से लागू हो पाएगा? यह सवाल अब भी कायम है।
शेख अब्दुल्ला के सामने यह सवाल था कि जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ रहना चाहिये या फिर पाकिस्तान के, तब उनके दिमाग में किसी तरह का कन्फ्यूजन नहीं था। आज भले ही संघ परिवार और बीजेपी शेख अब्दुल्ला की कैसी भी तसवीर पेश करे, वह एक आजाद ख़्याल, आधुनिक सोच के नेता थे। वह इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि पाकिस्तान के साथ जाना कश्मीर के लिये विकल्प नहीं हो सकता। वह यह भी जानते थे कि कश्मीर एक आजाद मुल्क नहीं हो सकता। शेख अब्दुल्ला का ख़्वाब था नया कश्मीर। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि गुलामी की जंजीरें उनके कब्जे (पाकिस्तान) में बनी रहेंगी। लेकिन भारत अलग है। भारत में ऐसे नेता और दल हैं जिनके विचार हमसे मिलते हैं। भारत के साथ विलय होने पर क्या हम अपने लक्ष्य के करीब नहीं पहुंचेंगे? हमारे पास दूसरा विकल्प आजादी का है लेकिन चारों तरफ से बड़े देशों से घिरे होने के कारण एक छोटे देश का आजाद रह पाना मुमकिन नहीं होगा। जाने माने राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष ने सत्य हिन्दी में इस बात का जिक्र किया है कि  शेख अब्दुल्ला नेहरू के अजीज दोस्त थे लेकिन नेहरू ने बाद में शेख पर अमेरिका के साथ मिलकर कश्मीर को स्वतंत्र कराने की साजिÞश रचने का आरोप लगा कर जेल भेज दिया था। शेख ने तब भी कहा था कि उनके और नेहरू के बीच दरार डालने के लिये यह अफवाह उड़ायी गयी थी कि नेहरू ने अफवाहों पर यकीन कर लिया।
बताते हैं कि शेख अगर चाहते तो कश्मीर कभी भी भारत का हिस्सा नहीं बनता। हिंदू राजा हरि सिंह भी भारत से विलय के पक्ष नहीं थे और अगर पाकिस्तान ने हमला नहीं किया होता तो हो सकता है कि हरि सिंह भारत से विलय पर दस्तखत भी नहीं करते। हरि सिंह पाकिस्तान से भी बात कर रहे थे और आजाद मुल्क का भी सपना देख रहे थे। यही कारण है कि सरदार पटेल की कोशिशों के बाद भी कश्मीर ने भारत विलय पर हस्ताक्षर नहीं किये थे। पर, आज बदले हालात में संघ परिवार और हिंदुत्व के सिपहसालार शेख अब्दुल्ला को खलनायक और हरि सिंह को हीरो की तरह पेश करते हैं। इस सोच की बुनियाद सांप्रदायिक है। संघ परिवार कश्मीर को आज भी हिंदू-मुसलमान के नजरिए से ही देखता है। अफसोस कि इतिहास को सही तरीके से नहीं देखने का नतीजा सामने है। जिस कश्मीर ने जिन्ना की दो राष्ट्र के सिद्धांत को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया था और मुसलिम बहुल राज्य होने के बाद भी पाकिस्तान के साथ विलय को नामंजूर कर दिया था, आज वही कश्मीर हिंदू और मुसलमान के खांचे में बंटा दिखायी देता है। जिÞला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनावों ने इस विभाजन पर अपनी मुहर लगा दी है और यह साबित कर दिया है कि कश्मीर एक सांप्रदायिक मुद्दा बन कर रह गया है। 
जानकारों का कहना है कि कश्मीर में जिन तत्वों ने अनुच्छेद 370 में बदलाव का पूरी तरह से विरोध किया था। आज वही तत्व घाटी में भारी मत से जीत कर आये हैं। कश्मीर घाटी के दस जिÞलों में से नौ में गुपकार गठबंधन का कब्जा होगा। बीजेपी तीन सीट जीतने के बाद भी कहीं नहीं होगी। जम्मू में परंपरागत रूप से बीजेपी मजबूत रही है। 2014 के विधानसभा के चुनाव में उसे जम्मू क्षेत्र में ही 25 सीटें मिली थीं और तब पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ मिलकर सरकार बनायी थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को तीन लोकसभा सीटें मिलीं और पूरे राज्य में कुल 32 विधानसभा सीटों पर उसे बढ़त मिली थी। डीडीसी के चुनाव में बीजेपी को सीटें तो मिलीं पर 2014 और 2019 की तुलना में कम। उसके कई बड़े नेता और पूर्व मंत्री इस लोकल चुनाव में हार गये। अगर दक्षिण जम्मू में उसे 56 में से 48 सीटें नहीं मिली होतीं तो बीजेपी की हालत पतली हो जाती। यानी हिंदू बहुल इलाकों में बीजेपी को 86% सीट मिली। जबकि उत्तर जम्मू में बीजेपी और गुपकार दोनों को 24 चौबीस सीटें मिली हैं। उधर, मुसलिम बहुल सीटों में बीजेपी को सिर्फ़ 2% ही सीटें मिलीं। मतलब साफ है कि बीजेपी को एक हिंदू पार्टी के तौर देखा जाता है।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि बीजेपी की तरफ से अटल बिहारी वाजपेयी अकेले नेता थे जिन्होंने विचारधारा को कश्मीर के रास्ते में नहीं आने दिया। जहां मोदी सरकार डंडे के जोर पर कश्मीर को हांकना चाहती है, वहीं वाजपेयी इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के आइने में समाधान खोज रहे थे। वाजपेयी ने मुफ़्ती मोहम्मद सईद के साथ मिलकर हीलिंग टच पॉलिसी को बढ़ाया था। कश्मीर में शांति के आसार तब दिखे थे। मोदी सरकार ने पीडीपी के साथ सरकार तो बनायी पर नजरिये में बदलाव नहीं आया। लिहाजा सरकार जाते ही महबूबा मुफ़्ती को देशद्रोही और गद्दार कह डिस्क्रेडिट करने का काम शुरू हो गया। बिना किसी सलाह-मशविरे के कश्मीर के लोगों को अंधेरे में रखते हुए अनुच्छेद 370 में बदलाव कर दिया, 35अ हटा दिया। अब जब चुनाव हो रहे थे तो गृह मंत्री अमित शाह उन नेताओं को जो हमेशा भारत की वकालत करते रहे उन्हें गुपकार गैंग कह कर बुलाया और रोशनी एक्ट की आड़ में फारूक अब्दुल्ला समेत बड़े नेताओं को चोर-लुटेरा कहा गया। सवाल यह है कि क्या इन तरकीबों से बीजेपी कश्मीर की जनता का विश्वास जीत पायी है? अगर गुपकार गठबंधन के लोग एक क्रिमिनल गैंग का हिस्सा हैं, चोर, उचक्के और लुटेरे हैं तो फिर क्या जनता गैंग और माफिया के साथ खड़ी हो गयी है और बीजेपी को पूरी तरह से घाटी में रिजेक्ट कर दिया है? खैर, यह राजनीति है। लेकिन यह समझना होगा कि सिर्फ राजनीति से ही सबकुछ नहीं होता है। बहरहाल, देखना यह है कि कश्मीर में आगे क्या होता है?