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The farmer and his produce!: किसान और उसकी उपज!

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किसान आजकल आंदोलित हैं, उन्हें लगता है उनके साथ छल किया गया है। कृषि मंडियों और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है। इससे होगा यह, कि किसान की उपज औने-पौने दामों पर बड़े व्यापारी खरीद लेंगे और वे उसके लिए ग्लोबल बाजार तलाश लेंगे। सरकारी अंकुश हटने से ऐसा होने की पूरी आशंका है। यह भी हो सकता है, कि व्यापारी बाद में भुगतान भी न करे। सरकारी खरीद केन्द्रों में भ्रष्टाचार भले होता रहा हो, किंतु जिंस के भुगतान की गारंटी पूरी थी। अब व्यापारी खरीद के बाद उस जिंस को खारिज कर सकता है। ऐसे में किसान न घर के रहेंगे न घाट के।
इसका सीधे-सीधे अर्थ है, सरकार ने नए कृषि विधेयकों में किसान की एकदम अनदेखी की है। इन विधेयकों के जरिए बाजार में एक पक्ष की अवहेलना की गई है। यह पूरी तरह अन्याय है। यदि व्यापारी को किसान की उपज को कहीं से भी खरीद कर कहीं भी ले जा कर बेचने की छूट है, तो किसान को भी अपनी उपज का पूरा दाम वसूलने की। पर खुले बाजार में किसान का पक्ष कमजोर है। उसके पास न पैसा है न यह जानने का कोई स्रोत, कि अमुक इलाके में उसकी जिंस का ऊँचा से ऊँचा भाव क्या है? उसके पास तो परिवहन की भी सुविधा नहीं है। ऐसे में किसान अपनी उपज को उस कीमत पर बेचने को मजबूर हो जाएगा, जो कीमत व्यापारी लगाएगा। जाहिर है, इस नीति की सबसे अधिक मार किसान पर पड़ेगी। छोटा और सीमांत किसान तो इस नीति से मारा जाएगा। दरअसल खुले बाजार की नीति ने न केवल किसान बल्कि उन सबको हाशिए पर धकेल दिया है, जो सक्षम नहीं हैं, अथवा जिनके पास बारगेन करने की क्षमता नहीं है। इसमें मारा जाता है, किसान, क्योंकि आज भी किसान ही देश में सर्वाधिक हैं और अकुशल श्रम शक्ति सबसे अधिक कृषि क्षेत्र में ही लगी है। सम्भव है, बड़ी जोतों वाले किसानों को इसमें नुकसान नहीं हो, किंतु छोटे और सीमांत किसान ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल) का लाभ नहीं उठा पाएँगे। अगर सरकारी नीति का लाभ इन किसानों को नहीं मिला, तो यह कैसी किसान कल्याण कारी योजना है। एक तरह किसान तो इसके चक्कर में पिसे ही। इसी कृषि नीति का विरोध करने के लिए किसानों ने 25 सितम्बर को भारत बंद का नारा दिया था। कई स्रोतों से मिली जानकारियों के लिहाज से उनका यह भारत बंद सफल ही रहा। किसानों ने हाई-वे जाम किए और ट्रेनों का परिचालन बाधित किया।
किसानों का यह असंतोष अभी थमता नहीं दिख रहा। शायद पहली बार सरकार को इतने संगठित विरोध का सामना करना पड़ा है। यहाँ तक कि सत्तारूढ़ एनडीए का सबसे पुराना और भरोसेमंद घटक दल अकाली दल में इस नीति को लेकर भारी विरोध है। इस दल की प्रतिनिधि हरसिमरत कौर ने तो केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा भी दे दिया है। इसके अतिरिक्त अन्य दलों में भी इस नीति को लेकर असंतोष है। क्योंकि हमारे देश में अधिकांश राजनीतिक दलों का आधार किसान हैं। और उनके असंतोष की अनदेखी करना उनके लिए भारी पड़ सकता है। कृषि विधेयक चूँकि संसद के दोनों सदनों में पास हो चुके हैं, इसलिए इसका कानून बन जाना तय है। हो सकता है, सरकार कुछ छूट दे। सच बात तो यह है, कि हम कृषि उपजों और उनकी उपयोगिता को भूल गए हैं। पूरे विश्व में भारत अकेला ऐसा देश है, जिसकी अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कृषि है। एक अनुमान के मुताबिक आज भी देश में 11 करोड़ लोग किसान हैं। इसका मतलब है, कि लगभग 70 करोड़ लोग सीधे-सीधे किसानी पर निर्भर हैं।
इसके अतिरिक्त 20 करोड़ लोग ऐसे होंगे, जो कृषि मजदूरी, कृषि उपकरणों की बिक्री या खरीद अथवा उनकी मरम्मत से जुड़े होंगे। ध्यान रखें, भारत में गांव सदैव एक स्वतंत्र इकाई रहे हैं। एक गाँव में न सिर्फ़ किसान बल्कि नाई, पुरोहित, महाजन, बढ़ई-लोहार, सुनार, पंसारी, वैद्य, माली, दूध-दही का काम करने वाले अहीर, चरवाहा से लेकर मृत पशुओं का चमड़ा निकालने वाले कुशल कारीगर भी रहे हैं।
इसके अलावा लगान वसूलने वाले लोग भी। और इन सबके जीवन निर्वाह के लिए कृषि उपज ही अकेला सहारा थी। किंतु ईस्ट इंडिया कम्पनी के आने के बाद से भारत के ग्रामीण जीवन में राज्य का प्रवेश हुआ। कभी भूमि सुधार के नाम पर तो कभी लगान के नकदीकरण के नाम पर अंग्रेज सरकार गाँवों में घुसी और किसानों को अपना मुखापेक्षी बना दिया। यही नहीं, योरोप के उद्योगपतियों की जरूरत के अनुसार फसल बोने का दबाव उन पर डाला गया। नील की खेती करने अथवा कपास का रकबा बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसके साथ ही अंग्रेज कांट्रेक्ट खेती कराने लगे।
इससे किसान की स्थिति दयनीय होती चली गई। किसान अपनी जरूरत के अनुसार नहीं, सरकार की जरूरत के हिसाब से फसलें उगाने लगा। इससे वह चेन टूट गई, जिसकी वजह से किसान स्वतंत्र था। इसके अलावा जमीन के अनुरूप बीज न बोने से फसलें बर्बाद होने लगीं और हर दूसरे वर्ष अकाल पड़ जाता, किंतु अंग्रेज सरकार लगान न माफ करती न कम करती। नतीजा किसान बर्बाद होता गया। पहले कृषि उपज के अनुरूप लोगों का आहार था। यह आज विचित्र लग सकता है, कि 1942 में जब बंगाल में अकाल पड़ा, तब जितने लोग भूख से मारे, उससे अधिक लोग पंजाब से पहुँचाया गया गेहूं खा कर मर गए।
क्योंकि गेहूं तब बंगाल में रहने वालों के आहार में शामिल नहीं था। जबकि पंजाब में वह खूब पैदा होता था। और पंजाब के लोगों ने अपनी चैरिटी भावना में गेहूं भेजा था। किंतु आजादी के बाद सरकार ने कृषि नीति वही अंग्रेजों वालों रखी। न तो लगान माफी की कोई योजना बनी, न कृषि भूमि पर लगने वालों करों के लिए कोई स्पष्ट नीति बनाई गई। ऊपर से आबपाशी के नाम पर नहरों या नलकूप के पानी पर और कर-भार बढ़ा। पानी को लेकर मारपीट होने लगी। तब किसानों की उपज बढ़ाने पर जोर दिया गया। रकबा बढ़ाए बगैर उपज कैसे बढ़ सकती थी? इसके लिए उन्नत खाद पर जोर दिया गया। संकर बीज बाजार में आए।
मोटे अनाज- ज्वार, बाजरा, मक्का, चना और जौ आदि की बजाय किसान गेहूं बोने लगा। फसलों की विविधता समाप्त कर दी गई। हरित क्रांति के नाम पर सिर्फ़ गेहूं और सरसों तथा अरहर एवं बासमती चावाल पर जोर हुआ। क्योंकि ये नकदी फसलें थीं। इन फसलों का दुनिया भर में बाजार था, इसलिए मल्टी नेशनल कंपनियाँ और बड़े-बड़े कारपोरेट घराने ग्रोसरी का बिजिनेस करने लगे।
किसान का जिंस सस्ते में खरीद कर विश्व बाजार में मनचाही कीमत पर बेचना। इसीलिए सरकार ने एमएसपी या न्यूनतम समर्थन मूल्य को निर्धारित करने का कानून बनाया था। किंतु एमएसपी से बाहर आने के प्रवेश लगातार होते रहे। अंतत: इस मानसून सत्र में सरकार ने किसानों के जिंस को एमएसपी से बाहर कर दिया। यह एमएसपी 22 किस्म की उपजों के लिए था।
अब किसानों को इसीलिए लगता है, कि उन्हें छला गया है। वे आज आंदोलित हैं। पूरा विपक्ष उनके साथ है। परंतु यह सरकार कितना झुकेगी, यह देखना है।
(लेखक वरिष्ठ संपादक हैं। यह इनक निजी विचार हैं।)

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