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The “corona-crisis” phase: “कोरोना-संकट” का दौर

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पिछले कुछ दिनों से भारत में लॉकडाउन चल रहा है | ये लॉकडाउन वैश्विक महामारी कोविड-19 की वजह से देश भर में लगा हुआ है | दुनिया के तकरीबन हर देश में पहुंच चुकी इस महामारी का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है | कई देशों ने इस महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन का सहारा लिया है | इस महामारी ने दुनिया कि हर बड़ी अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है | भारत में भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल रहा है चाहे वे मार्च के महीने में जीएसटी कलेक्शन में गिरावट हो या कुछ और | इस महामारी ने प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को और भी बढ़ा दिया है |
दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों से पलायन कर रहे मजदूरों की समस्या इतनी आसान नही है | केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने इन मजदूरों को काम देने वाली वाणिज्यिक इकाइयों को लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों को उनका वेतन देने को कहा है | लेकिन इन इकाइयों की अनौपचारिक प्रकृति और बहुत सारे असंगठित श्रमिकों का राज्यों के साथ पंजीकरण ना होना, इस तरह के आदेशों को लागू करने के लिए राज्यों की क्षमता और प्रशासनिक नियंत्रण को प्रतिबंधित कर सकता है | 31 मार्च को इंडियन एक्सप्रेस में छपे भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रनोब सेन के बयान से हमें यह पता चलता है कि ऐसे ज्यादातर प्रतिष्ठान अनौपचारिक प्रकृति के हैं, जिसमें से बहुत सारे पंजीकृत भी नहीं हैं | जो पंजीकृत हैं भी, वे भी शॉप एंड इस्टेब्लिश्मेंट एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत हैं, पर ज्यादातर प्रतिष्ठानों का पंजीकरण नही हुआ है | ऐसे में उन सारे प्रतिष्ठानों का, उनमें काम करने वाले लोगों की संख्या का पता लगाना और उन लोगों को उनका वेतन दिलाना काफी मुश्किल काम है | सेन के मुताबिक सरकारी संस्थानों को शहरों में तत्काल प्रभाव से ऐसे पंजीकरण केन्द्रों की स्थापना करनी चाहिए जहां प्रवासी मजदूर खुद को सरकारी संस्था के साथ पंजीकृत करा सकें |
हाल के कोई ऐसे आधिकारिक आंकड़े नही हैं जो हमें देश के असंगठित श्रमिकों का अनुमान बताएं | लेकिन 2011-12 में हुए एनएसएसओ के रोजगार और बेरोजगारी सर्वेक्षण के मुताबिक असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या कुल रोजगार कर रहे तकरीबन 47.41 करोड़ लोगों का 82.7 प्रतिशत या तकरीबन 39.12 करोड़ है | इसके अलावा 2012 की राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसे असंगठित और अनौपचारिक क्षत्रों का योगदान अर्थव्यवस्था का तकरीबन 48 प्रतिशत से 56.4 प्रतिशत तक है | हालांकि श्रम मंत्रालय प्रवासी श्रमिकों पर कोई डेटा नही रखता है, लेकिन अतीत में हुए आर्थिक सर्वेक्षण से हमें यह पता चलता है कि कुल कार्यबल में से तकरीबन 20 प्रतिशत लोग प्रवासी मजदूर हैं |
दूसरी तरफ भारत सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए 1 लाख 70 हजार करोड़ का रिलीफ पैकेज दिया है, जिसका पूरा विवरण पीआईबी की साईट पर उपलब्ध है | इस पैकेज की सराहना डब्ल्यूएचओ ने भी की है | हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनका कहना है कि यह पैकेज को लाने में और कोविड-19 Economic Response Task force के गठन में सरकार ने काफी समय लगा दिया | इसके साथ-साथ कुछ लोगों का कहना है कि भारत सरकार का यह रिलीफ पैकेज बहुत कम राशि का है | वैसे देखा जाए तो यूएसए, जर्मनी, यूके, फ्रांस, स्पेन जैसे देशों के सामने भारत का रिलीफ पैकेज कम लगता है, लेकिन ये भी सत्य है कि वर्तमान के हिसाब से ये एक अच्छा पैकेज है |
इसके साथ-साथ आरबीआई ने भी कोविड-19 के मद्देनजर वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने की कोशिश की है | 27 मार्च को आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि विभिन्न तरीकों के जरिए प्रणाली में 3.74 लाख करोड़ की तरलता लाई जाएगी | आरबीआई गवर्नर ने कहा कि आरबीआई पहले ही वित्तीय बाजारों में विभिन्न उपकरणों के माध्यम से 2.8 लाख करोड़ रूपए की तरलता ला चूका है, जो कि जीडीपी के 1.4 प्रतिशत के बराबर है | और हाल ही में लाए गए उपायों के साथ यह तरलता जीडीपी के 3.2 प्रतिशत के बराबर हो गई है | आरबीआई ने और भी कई चीजों को लेकर घोषणा की जो आरबीआई की साईट पर उपलब्ध है | हमारे लिए जरूरी है कि हम अफवाहों से बचें और आरबीआई की साईट पर जाके इससे जुड़ी हर जानकारी प्राप्त करें | ईएमआई के विषय पर की गई घोषणा को ध्यान से पढ़ें और समझें, न समझ आने पर अपने बैंक से संपर्क करें क्योंकि ईएमआई को तीन महीने के लिए स्थगित नही किया गया है बल्कि टाला गया है, वो तो देनी ही पड़ेगी आज नही तो कल | यह उपाए छोटे और मध्यम व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लिए ज्यादा फायदेमंद है |
एक तरफ तो अर्थव्यवस्था को इस महामारी के प्रकोप से बचाने के प्रयास किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ भारतीय बजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का पैसा खींचना बदस्तूर जारी है | एनएसडीएल के आंकड़ों के अनुसार एफपीआई ने मार्च के महीने में भारतीय ऋण और इक्विटी बाजारों से रिकॉर्ड 15.9 बिलियन डॉलर (तकरीबन 1.2 लाख करोड़) निकाल लिए | दूसरी ओर सेंसेक्स और निफ्टी में भी गिरावट का दौर चल रहा है | 31 मार्च को सेंसेक्स भले ही 1028 अंक ऊपर बंद हुआ पर 2019-20 फिस्कल में ये 31.2 प्रतिशत या 9204 अंकों के नुक्सान के साथ बंद हुआ | इसमें से ज्यादातर नुक्सान मार्च के महीने में कोविड-19 की वजह से हुआ | म्यूच्यूअल फंड्स के लिए भी ये साल अच्छा नही रहा |
लेकिन ये समस्या केवल भारत में नही है, बल्कि एक तरीके से देखा जाए तो भारत में अर्थव्यवस्था की समस्या सीमित है | कुछ संस्थाओं के मुताबिक भरात शायद उतनी बड़ी मंदी का साक्षी ना बने, लेकिन दुनिया के ज्यादातर बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश एक भयानक मंदी के दौर से गुजर सकते हैं | फिलहाल हमारे लिए ये जरूरी है कि हम घर पर रहें, अफवाह ना फैलाएं और दिए गए दिशा निर्देशों का पालन करें |

-अक्षत मित्तल

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