Home संपादकीय विचार मंच Speak not Jai Shriram, Jai Siyaram: जय श्रीराम नहीं जय सियाराम बोलिए

Speak not Jai Shriram, Jai Siyaram: जय श्रीराम नहीं जय सियाराम बोलिए

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पीएम ने अयोध्या से कई संदेश दिए। पहला- जय श्रीराम नहीं जय सियाराम बोलिए। दोनों की तासिर में अंतर है। ऐसा कुछ लोगों का मानना है। लेकिन जैसी भारत की संस्कृति है, वहां पति से पहले पत्नी को सम्मान दिया जाता है। पहले भी जय सियाराम ही था, लेकिन धर्म का रंगरेजों ने इसे जय श्रीराम में तब्दील कर दिया। खैर जो भी हो, पीएम मोदी ने इसे दोबारा परिभाषित करके गरिमा बढ़ाई है। वहीं भय बिन प्रीत न होए से चीन और पाकिस्तान को भी चेता दिया।

अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन के साथ ही सचमुच एक नए भारत की शुरूआत हो गई है। इस नए भारत में नेहरूयुगीन भारत वाली बहुत सी बातें नहीं रहेंगी। इतिहास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कई बातों के लिए याद रखेगा और आज जब वे अयोध्या पहुंचे तो उन्होंने एक बार फिर अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया।

ये उसी तप, त्याग और संकल्प का प्रतीक है। पर मोदीजी ये भी जानते हैं कि आजादी किसी एक धर्म या समुदाय के त्याग और तप से हासिल नहीं हुई थी, उसमें हर तबके, हर जाति-धर्म के लोगों ने एक जैसा योगदान दिया, तब जाकर आजाद हवा में सांस लेने का मौका भारत को मिला।

आम भारतीयों को इस महान कार्य से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाने वाले गांधीजी ने भी हमेशा भारत में रामराज्य की ही परिकल्पना की थी। ऐसा रामराज्य सियाराम की छवि वाले राम से ही संभव है। यह देखकर राहतभरा आश्चर्य हुआ कि मोदीजी ने भी अपने भाषण की शुरूआत में श्रीराम की जगह सियाराम कहा। जय श्रीराम में जिस कट्टर हिंदुत्व का भाव जगता था, वह भाव आज जय सियाराम में शायद घुलता दिखाई दिया। अगर वाकई ऐसा है तो सारे जहां से अच्छा वाले हिंदुस्तान की उम्मीद अभी बाकी है।

सोमनाथ से ही 1990 में लालकृष्ण आडवानी ने अयोध्या तक रथयात्रा निकालकर भारत की राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक चेतना में उथल-पुथल मचा दी थी। 1990 से लेकर 2020 तक के दौर में उस रथयात्रा के पहियों ने बहुतों की भावनाओं को गति दी तो बहुतों की भावनाओं को कुचला भी। और अब इस सच को स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि अयोध्या में राम मंदिर बनने की शुरूआत हो गई है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही यह तय हो गया था कि जल्द ही मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनेगा और परिस्थितियां कैसी भी हों, मंदिर बनाने की शुरूआत हो ही जाएगी।

रामजन्मभूमि जाने वाले वे देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए, हनुमानगढ़ी के दर्शन करने वाले भी पहले प्रधानमंत्री हैं और किसी मंदिर के शुभारंभ में हिस्सा लेने वाले भी पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं। यह याद रखने वाली बात है कि आजादी के बाद जब गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ तो नेहरूजी को इस बात की फिक्र थी कि ऐसे किसी कार्यक्रम को भारत सरकार का मुखर समर्थन मिलने से विभाजन से पीड़ित लोगों के दर्द और बढ़ेंगे। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद को वहां न जाने की सलाह दी थी, लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरूजी की सलाह नहीं मानी और कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हालांकि उन्होंने वहां जाकर ‘गांधीवादी विचारधारा, धर्मनिरपेक्षता और शांति बहाली’ पर जोर दिया।

अदालत में बरसों-बरस विवादित जमीन का मुकदमा चला और जब इस मामले पर लगातार सुनवाई हुई तो यह साफ होने लगा था कि जल्द ही फैसला भी सुना दिया जाएगा। और ऐसा ही हुआ भी। इस विवाद से जुड़े सभी पक्षों ने पहले ही कह दिया था कि वे अदालत का फैसला मान्य करेंगे। इसलिए जब फैसला हिंदू पक्ष के हक में आया तो भले अन्य लोगों को निराशा हुई, लेकिन बड़ी गरिमा के साथ अदालत के फैसले का सम्मान किया गया। इस महादेश की खूबसूरती इसी गरिमा में छिपी है।

हिंदुस्तान दुनिया के अन्य देशों से अलहदा इसीलिए है कि यहां मानवता का महासमुद्र है। जिस तरह समुद्र में कभी कोई लहर ऊपर होती है, कभी कोई, उसी तरह के उतार-चढ़ाव यहां के सदियों के इतिहास में देखे गए। लेकिन अपनी उदार संस्कृति और लचीले सामाजिक व्यवहार के कारण यह देश तमाम उतार-चढ़ावों से सुरक्षित निकल कर आता रहा।

राम मंदिर बनने को बहुत से लोग अपनी जीत की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे 5 सौ सालों के इंतजार की जीत बता रहे हैं। लेकिन इन लोगों को याद रखना चाहिए कि भारत का इतिहास महज 5 सौ सालों का नहीं है, उससे कहीं पहले का है। राम मंदिर भारतीय राजनीति का बड़ा मुद्दा था, लेकिन राम राजनीति से नहीं लोकआस्था से जुड़े हैं। इसलिए अब उनका राजनीतिकरण करने की कोशिशें बंद हो जाना चाहिए।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गीतांजलि की प्रसिद्ध कविता भारत तीर्थ में लिखा है- ‘हे मोर चित, पुण्य तीर्थे जागो रे धीरे एई भारतेर महामानवेर सागर-तीरे। केह नाहि जाने, कार आह्वाने कत मानुषेर धारा, दुर्वार स्रोते एलोकोथा हते समुद्र हलो हारा।’ अर्थात हे मेरे हृदय, इस पवित्र तीर्थ में श्रद्धा से अपनी आखें खोलो। किसी को भी मालमू नहीं है कि किसके आह्वान पर मनुष्यता की अनेकानेक धाराएं—आर्य, अनार्य, एक दुर्वार वेग से बहती कहां-कहां से आई और महासमुद्र (भारत देश) में मिलकर खो गईं।

प्रधानमंत्री के जरिए लाखों लोगों के बरसों का सपना पूरा हो गया। अब उन सपनों पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, जो सत्ता में आने से पहले आम जनता को दिखलाए गए थे। महंगाई, बेरोजगारी, वर्गभेद, महिलाओं पर अत्याचार, धर्म और जाति के नाम पर प्रताड़नाएं, मजदूरों, किसानों के हक और इन सबके साथ सबके विश्वास और विकास की बात केंद्र सरकार को याद रखनी चाहिए।

देश असाध्य तकलीफों से कराह रहा है। आंकड़ों की बाजीगरी चाहे जो कहे, लेकिन आम आदमी के कष्ट उस बाजीगरी से दूर नहीं हो रहे हैं। इसके लिए सरकार को वैसी ही मजबूत कोशिशें करनी चाहिए जो राम मंदिर और अनुच्छेद 370 से जुड़े फैसले लेने में दिखाई गईं। आज अयोध्या में मोदीजी ने देश के नाम संबोधन में आज के दिन की तुलना 15 अगस्त से की। उन्होंने कहा कि 15 अगस्त का दिन लाखों बलिदानों का प्रतीक है, ठीक उसी तरह, राम मंदिर के लिए कई-कई सदियों तक, कई-कई पीढ़ियों ने अखंड अविरत एक-निष्ठ प्रयास किया है।

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