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Respective preferences: अपनी-अपनी प्राथमिकताएं

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हिमाचल कि एक बेटी ने दूसरे प्रदेश के बारे में कुछ ऐसा बोला कि उस प्रदेश के तमाम लोगों की भावनाएं आहत हुईं। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? बेटी चाहे जो बोले लेकिन अगर कोई और उस बेटी के बारे में बोलेगा तो उस बेटी की भावनाएं आहत होंगी और इससे फर्क जरूर पड़ता है। बेटी जो संयोग से एक अभिनेत्री भी हैं सबको देश-भक्ति का सर्टिफिकेट बाटती रहती हैं। लेकिन ये तो उस ह्लराष्ट्रभक्तह्व बेटी का हक है। बेटी कि इस चीज पर निंदा हुई तो बेटी समेत समस्त मानव जाति कि भावनाओं को ठेस पहुंचेगी।
हम लायक भी इन्हीं सबके हैं। ऐसे वक्त में जब देश में इतना सब साश्वत हो रहा है तब इससे बड़ा मुद्दा और हो भी क्या सकता था। हमे इससे क्या फर्क पड़ता है कि- भारत में 3.5 करोड़ बेरोजगार लोगों का एक समूह है। कोविड के बाद से 2.1 करोड़ वेतनभोगी लोगों ने नौकरियों को खो दिया है। इससे कहां हमारे घर का राशन भरता है? इतने साश्वत समय में हम क्यों जानें कि- अब 233 जिलों में 8.56 लाख कोविड के मामले मौजूद हैं, जिनमें मई तक एक भी मामला नही था?
हम क्यों जानें कि- आत्महत्या से मरने वालों में दैनिक वेतन भोगियों की हिस्सेदारी छह साल पहले की तुलना में 2019 में दोगुनी होकर 23.4 प्रतिशत (एनसीआरबी) हो गई है। क्या फर्क पड़ता है कि- भारत का कारखाना उत्पादन जुलाई में लगातार पांचवे महीने गिरा या 2020 में वैश्विक आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भारत 26 स्थान गिरकर 105वें स्थान पर आ गया। केवी कामथ की अध्यक्षता वाली कामथ समिति ने कहा कि- कोविड के बाद भारत में 15.52 लाख करोड़ रुपये के कॉरपोरेट कर्ज स्ट्रेस लोन कि श्रेणी में आ गए हैं, जबकि 22.20 लाख करोड़ रुपये महामारी से पहले ही स्ट्रेस लोन हो गए थे। हाल ही में हुई जेईई कि परीक्षा में 26 प्रतिशत छात्र अनुपस्थित रहे।
जनवरी में मात्र 6 प्रतिशत अनुपस्थित रहे थे। लेकिन उन छात्रों का भविष्य उस एक बेटी की भावनाओं से ज्यादा कीमती थोड़ी ना है। लेकिन जिन्होंने अपना सब कुछ बेच के बच्चों को पढ़ाया उनका दर्द शायद और लोग नहीं समझेंगे। बेटी तो जो कर रही है, वो तो उसका ह्लएक्सटेंडेडह्व हक है। लेकिन निंदा महाराष्ट्र सरकार की भी भाषा कि मयार्दा गिराने के लिए होनी चाहिए। महाराष्ट्र सरकार ने एक अभिनेत्री को राष्ट्रीय राजनीति का चेहरा बना दिया है। महाराष्ट्र तमाम समस्याओं से झूझ रहा है ऐसे में सरकार अगर एक अभिनेत्री को इतना महत्व देगी तो जनता किस पे भरोसा करेगी।
बेटी के दफ्तर को गिराने कि बीएमसी की कारवाही संवैधानिक तौर पर गलत नही है। एमएमसी अधिनियम की धारा 354(ए) के तहत संपत्ति के मालिक को वैधता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने हेतु 24 घंटे का समय दिया जाता है। यदि बीएमसी को असंतोषजनक उत्तर और दस्तावेज मिलते हैं, तो यह विध्वंस की कारवाही कर सकता है। कारवाही के समय को देखते हुए यह कारवाही बदले कि कारवाही लग रही है। तथ्य यह भी है कि- एक आरटीआई से पता चलता है कि जनवरी 2016 और जुलाई 2019 के बीच आरईटीएमएस को मिलीं अवैध निर्माण की शिकायतों में से बीएमसी ने केवल 10.47 प्रतिशत मामलों में ही विध्वंस का सहारा लिया है। ऐसे में यह बदले की कारवाही ही है। लेकिन बेटी ने खुद भी मयार्दा कहां रखी। बेटी अपने आपको जन-नायक और बेचारी दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देतीं। लेकिन बेटी का किया सब जायज है। राज्यों को उनके जीएसटी का हिस्सा ना देने वाली सरकार अमर्यादित बोलों पर वाई-प्लस सुरक्षा दे रही है।
सरकार का खजाना कुछ ज्यादा ही भरा मालूम पड़ता है। शायद इसी लिए वाई-प्लस सुरक्षा देने से पहले प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं किया गया। एक और बेटी (संयोग से अभिनेत्री) को 2017 में सुरक्षा कि जरूरत थी लेकिन उसे यह नही मिली। उद्योगपति मुकेश अंबानी को 2013 में जेड सुरक्षा दी गई थी, उनसे इसके लिए प्रति माह 15 लाख रुपये लिए जाते हैं।
अगर एक अभिनेत्री से लड़ने में पूरे प्रदेश कि सरकार लग जाए, तो गलती ज्यादा सरकार की है। लेकिन हमारे-आपके लिए ये जरूरी है कि हम बेटी कि भावनाएं आहत ना होने दें। इतने साश्वत वातावरण में हमारे पास इसके अलावा कोई मुद्दा नहीं है। हंसी आती है अपने आप पर। सच है, जो जनता अपना भला नहीं सोच सकती, उसका भला कोई नहीं कर सकता।

अक्षत मित्तल
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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