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Ramayana and today’s court! रामायण और आज की अदालत!

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कभी सोचा है, कि अगर रामायण में वर्णित घटनाएँ आज घटतीं तो क्या होता? शायद मामले अदालतों में जाते! कुछ मामलों के लिए तो सीआरपीसी का प्रयोग होता और अदालतों के लिए फैसला करना कितना असहज होता।
वरिष्ठ पत्रकार अनिल माहेश्वरी तथा सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट  विपुल माहेश्वरी ने ह्लफअटअअठअ फएश्करकळएऊह्व नाम से एक मजेदार और कौतूहलपूर्ण किताब लिखी है। जो सभी को, खासकर भारत के अंग्रेजीदाँ क्लास का इस पौराणिक ग्रंथ से परिचय कराती है और उनकी शंकाओं का समाधान भी। मंथरा से शुरू कर सीता वनवास के बीच 16 पड़ाव लिए गए हैं, इस पुस्तक में। रामायण हमारे लिए एक धर्मग्रंथ ही नहीं बल्कि हमारी सभ्यता व संस्कृति की एक थाती है, उसे सहेजना हमारा कर्त्तव्य है। चूँकि विश्व में भारतीय सभ्यता और संस्कृति अति प्राचीन है, इसलिए बहुत सारे लोग शंकाएँ व्यक्त करते ही रहते हैं। लोग धर्म को माथे में रख कर जवाब देते हैं, जिनसे उन शंकाओं का समाधान नहीं होता, उल्टे लगता है कि एक संस्कृति को खूँटे से बांध दिया गया।
संस्कृति और इतिहास किसी धर्म का नहीं होता, वह साझा होता है। अब जो भारत में है, वह राम को जानेगा ही। लेकिन राम को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी समझना चाहिए। वाल्मीकि रामायण में वे मयार्दा पुरुषोत्तम हैं। उन्हें भगवान का दर्जा तो तुलसीदास ने दिया, वह भी रामायण लिखे जाने के हजारों वर्षों बाद। इसलिए रामायण के पात्रों पर यह पुस्तक कुछ और सहानुभूति पैदा करती है। हमारे साथ दिक़्कत यह है, कि हम नायक और खलनायक को खानों में बाँट कर देखते हैं। और अगर कथा अति प्राचीन है, तो हम उसे तार्किक तरीके से समझने की कोशिश नहीं करेंगे। अब सोचिए क्या राम वनवास की खलनायिका सिर्फ़ मंथरा थी? वह तो वही कर रही थी, जो उसकी स्वामिनी कैकेयी चाहती है।
आखिर वह कैकेयी के मायके से दहेज में आई थी। उसका हानि-लाभ स्वामिनी में निहित था। कौन माँ नहीं चाहेगी, कि उसका पुत्र युवराज बने और कालांतर में वही राजपाट सँभाले। स्त्री के अंदर यह स्वाभाविक ललक होती है। फिर जब पुत्र राजा बनेगा, तो वह राजमाता। इसके अलावा राजा दशरथ ने भी उसे कभी भी दो वरदान माँग लेने का वायदा किया हुआ था। क्योंकि देवासुर संग्राम के समय उसने ही तो राजा दशरथ की जान बचाई थी। और यही दो वरदानों की याद मंथरा ने कैकेयी ने करायी थी। किंतु इस याद दिलाने का खामियाजा उसे आज तक निभाना पड़ रहा है। ऐसे में उसे कौन-सा कानून उसकी रक्षा कर सकता है, इसी का विवरण इस पुस्तक में है।
दूसरे अध्याय में है अहिल्या। अहिल्या का मामला विचित्र है। पौराणिक आख्यान के अनुसार अहिल्या बहुत सुंदर और मन-मोहिनी थीं। अपने पति गौतम ऋषि से उसका कोई मन-भेद नहीं था, फिर भी इंद्र के साथ भी उसने रमण किया। एक तरह से देखा जाए, तो वह पति को भी पसंद करती थीं और इंद्र के प्रति भी उसका आकर्षण था। अगर आकर्षण नहीं होता, तो वह पति को अँधेरे में ही बाहर जाने को प्रेरित न करती। जबकि उसे पता था, कि अभी सुबह नहीं हुई है। यह तो चंद्रमा की कला है। किंतु उसने इंद्र को पहचान कर भी उनके साथ रमण किया। इसीलिए उसके पति गौतम ऋषि ने उसे पत्थर हो जाने का श्राप दिया था। पर अपनी स्पष्टवादिता और अपनी इच्छाओं का दमन न करने के कारण ही अहिल्या को उन पाँच कन्याओं में स्थान मिला, जिनके बारे में मान्यता है, कि सुबह उठ कर इन पाँचों कन्याओं का स्मरण अवश्य करना चाहिए। ये पाँच कन्याएँ हैं- तारा, कुंती, द्रोपदी, अहिल्या, मंदोदरी।
यहाँ कन्या का अर्थ है, काम्य। अर्थात् अपनी कामना की पूर्ति करने को इच्छुक। इन पाँचों स्त्रियों ने अपनी इच्छा को कभी दबाया नहीं। इसलिए प्रश्न यह उठता है, कि अहिल्या को पत्थर क्यों बनना पड़ा? ह्यशतपथ ब्राह्मणह्ण के टिप्पणीकार कुमारिल भट्ट लिखते हैं कि इंद्र और अहिल्या एक तरह से सूर्य और उसकी छाया हैं। अर्थात् उजाला और अंधेरा। मिथिला जाते समय राम ने इस पत्थर हो चुकी अहिल्या को पुन: मनुष्य बनाया। इसे यूँ कहा जाए, कि राम ने ह्यअनुर्वर भूमिह्ण जागृत कर उर्वर बनाया। यहाँ लेखक-द्वय लिखते हैं, कि अहिल्या अपने मुकदमे के लिए न्यायाधीश महोदय से पूछती है, कि महामहिम मेरा क्या अपराध है? विधाता ने पहले तो मुझे सुंदर बनाया फिर मेरे लालन-पालन का जिÞम्मा गौतम ऋषि पर डाला।
मैं उन्हें अपना पिता समझती रही। जब मैं युवा हुई, तो गौतम ऋषि ने मुझसे शादी कर ली। अब मैं तो थी युवा लेकिन ऋषि अधेड़! ऋषि मेरी जरूरतें नहीं समझ सकते थे। लेकिन ऋषि के प्रति मेरा स्नेहभाव बराबर था। अब ऐसे में मुझे इंद्र के प्रति अनुरक्ति हुई तो मेरा क्या कसूर? दूसरे कानून सब के लिए बराबर होता है, इसलिए मुझे भी इंसाफ चाहिए। इसके बाद इंद्र के अपने तर्क हैं। इसी तरह मेनका की अपनी पीड़ा है। देवराज इंद्र का सिंहासन जब भी डोलता नजर आता है, फौरन उसे ही याद करते हैं। विश्वामित्र की तपस्या भंग करने वह गई। विश्वामित्र की तपस्या खंडित हुई और मेनका की कोख से शकुंतला पैदा हुई। जिसे विश्वामित्र के आश्रम में वह छोड़ आई। अब आज की तार्किक और कानूनी बुद्धि से सोचा जाए तो यह अपराध की श्रेणी में आएगा।
शकुंतला माँ के प्यार से वंचित रही। और ऋषि विश्वामित्र का कृत्य भी। है न यह मजेदार मुकदमा। लेखकों ने बड़े ही अनूठे अंदाज में निष्कर्ष निकाले हैं। इसी तरह रावण ने भी अप्सरा रम्भा के साथ बलात्कार किया था। और यह भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (1) के तहत गम्भीर अपराध है। बिना सहमति के किसी स्त्री के साथ शारीरिक संबंध बनाना। किंतु यह मुकदमा इसलिए खारिज हो जाता है, क्योंकि रावण कोर्ट में पेश ही नहीं हुआ। अलबत्ता अदालत उसे भगोड़ा घोषित कर देती है और उसकी सम्पत्ति को जब्त करने का आदेश भी। श्रवण कुमार का मामला तो हत्या का है। अदालत में यह मुकदमा 304-ए के तहत पेश होता है। युवराज दशरथ ने एक निर्दोष युवक को मार दिया, जो अपने अंधे माँ-बाप को तीर्थाटन करा रहा था। पर अदालत की दलील है, कि धारा 299 के तहत यह सीधे-सीधे हत्या नहीं है। यह अनजाने में हुआ कृत्य है। वेदवती एक युवा तपस्विनी थी, जिसका शीलभंग करने की कोशिश रावण लगातार करता है। आजिज आकर वह तपस्विनी आत्महत्या कर लेती है। रावण के इस दुष्कृत्य को धारा 376 के अधीन अदालत में लाया जाता है। और 354 के तहत रावण दोषी भी है। अदालत के पास शूर्पणखा का मुकदमा भी आता है।
यह मुकदमा धारा 326 और 354 के तहत दर्ज है। इसके बाद अदालत में इस मुकदमे की सुनवाई होती है। लेकिन अदालत का निर्णय आता है कि खुद की और परिवार की सुरक्षा के तहत यह कांड हुआ। इसलिए राम और लक्ष्मण निर्दोष हैं। गिद्धराज जटायु का मुकदमा वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम के अधीन अदालत के समक्ष लाया जाता है। रावण पर उस पक्षी को मारने का आरोप है, जो अब लुप्तप्राय हो चला है। बालि के मामले में कोर्ट ने माना है, कि बालि को मारना क्षत्रिय मयार्दा के अनुकूल नहीं है। हनुमान के मुकदमे में मंदोदरी और सीता को विटनेस बॉक्स में लाया जाता है। रावण पर सीता के अपहरण का मुकदमा चलता है।
अग्निपरीक्षा का मुकदमा भी कोर्ट के समक्ष आता है और बाद में सीता के वनवास का भी। लेखक द्वय ने कोई भी प्रसंग नहीं छोड़ा है। शम्बूक वध का मुकदमा भी चलाया जाता है। किसी भी महाकाव्य, जबकि उसे धार्मिक ग्रंथ का दर्जा प्राप्त हो, ऐसा मुकदमा एक नए तरह का विचार लग सकता है। किंतु लेखकों ने इस ग्रंथ की मयार्दा को बनाए रखते हुए फैसले दिए हैं।
इसलिए यह पुस्तक बहुत रोचक बन पड़ी है। इसे आग्रह-दुराग्रह और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर पढ़िए तो यह पुस्तक रामायण के प्रति और अधिक श्रद्धावनत करती है। इछडडटरइवफ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य है- 499 रुपए। सहज और प्रवाहमान अंग्रेजी में लिखी यह पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ संपादक हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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