Home संपादकीय विचार मंच Pressure Or the journalism of the Swantah Sukhaye: दबाव या स्वान्तःसुखाय की पत्रकारिता

Pressure Or the journalism of the Swantah Sukhaye: दबाव या स्वान्तःसुखाय की पत्रकारिता

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ये दौर चाटुकारिता का है। च्विंग्गम चबाने जैसी खबरें। बस चबाते जाओ आखिर में मुँह थक जाय तो थूक दो। फिर दोबारा जुगाली करते रहो। टीवी चैनल देखने से लगता है कि रफ़ाएल युद्धक विमान और राम मंदिर के शिलान्यास से बड़ी कोई ख़बर ही नहीं है। जबकि पत्रकारिता का बुनियादी सिद्धांत यह है कि इंसानी मुसीबतों या उनकी बुलंदियों को सबसे ऊपर रखा जाए। पूरी दुनिया में कोरोना के कारण हाहाकार मचा हुआ है। भारत में हर राज्य में कोरोना संक्रमित मरीज हैं। लोगों को तरह-तरह की पेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। कहीं अस्पताल की सुविधा नहीं है तो कहीं क्वारंटाइन के प्रबंधन को लेकर दिक्कतें हैं। जांचें बहुत कम हो रही हैं। ख़बरें यह भी हैं कि बहुत सारे बीमार लोग जांच के लिए नमूने नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि इसके लिए आवश्यक सुविधाओं का अभाव  है। गांवों में भी लोग कोरोना संक्रमित हो रहे हैं लेकिन उनकी गिनती नहीं हो  रही है क्योंकि किसी अस्पताल या सरकारी एजेंसी में उनका कहीं कोई रिकार्ड नहीं है। अगर किसी की कोरोना से मृत्यु हो रही है तो ऐसी भी सूचना आ रही है कि उसके परिवार वाले उसका अंतिम संस्कार तक नहीं कर  रहे हैं। कोरोना से बीमार लोगों को परिवार के लोग छोड़कर ज़िम्मेदारी से मुक्त हो रहे हैं। यह जितने भी विषय हैं यह सब समाचार हैं। ईमानदारी की पत्रकारिता में ये सारी खबरें सुर्खियों के लायक मानी जाएंगी।
सवाल यह है कि मीडिया संस्थान सच्चाई को दिखाने से डरते क्यों हैं, जबकि हमारा संविधान मीडिया को जनहित में अपनी बात कहने की आज़ादी देता है।  प्रेस की आजादी की व्यवस्था संविधान में ही है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए)में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की व्यवस्था दी गई है, प्रेस की आज़ादी उसी से निकलती है। इस आज़ादी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुत से फैसलों में सही ठहराया है। 1950 के बृजभूषण बनाम दिल्ली राज्य और 1962 के सकाळ पेपर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन आफ इण्डिया के फैसलों में प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रख दिया गया है।
असम, बिहार और उत्तराखंड में बरसात में आने वाली बाढ़ के चलते तबाही आई हुई है। सड़कें टूट रही हैं, पुल गिर रहे हैं। गांवों में पानी घुस आया है,  ज़िंदगी मुसीबत के मंझधार में  है। विपत्ति की यह खबरें भी अगर कहीं आ रही हैं तो साइड की ख़बरों की तरह चलाई जा रही हैं। लेकिन कुछ टीवी चैनलों में तो बिलकुल नदारद हैं। हां, कुछ चैनल इन ख़बरों को भी ज़रूरी प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन पिछले एक हफ़्ते में ज़्यादातर टीवी चैनलों को देख कर लगता है देश में सब अमन चैन है, कहीं कोई परेशानी नहीं है।
अजीब  बात है कि फ्रांस से बहुत ही महंगे दाम में खरीदे गए रफायल युद्धक विमानों को घंटों ख़बरों में चलाया जा रहा है। अव्वल तो सेना के पास कितने हथियार हैं यह बात आम तौर पर गुप्त रखी जाती है क्योंकि माना यह जाता है कि जिनके ख़िलाफ़ युद्ध होना है उनको किसी भी देश के हथियारों की विस्तृत जानकारी नहीं होनी चाहिए। लेकिन हमारा विजुअल मीडिया है कि एक महत्वपूर्ण हथियार के सारे विवरण टेलिविजन पर दिन-रात प्रचारित कर रहा है। पत्रकारिता की यह गैर ज़िम्मेदार प्रवृत्ति तो है ही, यह राष्ट्रहित को भी नुकसान पहुंचा सकती है। कई साल के विवाद के बाद अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण होना है। पांच अगस्त को उस मंदिर का शिलान्यास प्रधानमंत्री करेंगे। उस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया जाएगा। निश्चित रूप से यह ख़बर है लेकिन टीवी चैनलों की नज़र में पिछले एक सप्ताह से पांच अगस्त के शिलान्यास के कार्यक्रम की जो अहर्निश विवरणी चल रही है उसको देख कर लगता है कि उसके अलावा कोई ऐसी ख़बर ही नहीं है जिसे प्रमुखता से दिखाया जा सके।
टीवी चैनलों की एक और ख़बर है बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की। उसकी जांच चल रही है।  उस जांच की पल-पल की जानकारी चप्पे-चप्पे पर मौजूद चैनलों के रिपोर्टर दे रहे हैं। और चैनल इसको लहक-लहक कर सुना रहा है। सुशांत सिंह की आत्महत्या निश्चित रूप से एक बड़ी ख़बर है लेकिन उसकी जांच की हर जानकारी तो उतनी बड़ी ख़बर नहीं है कि उसका लगभग सीधा प्रसारण किया जाए लेकिन आजकल टीवी पत्रकारिता में जो भेड़चाल है उसके चलते यह सारे हालात पैदा हुए हैं। अमिताभ बच्चन की बीमारी भी कई दिन तक टीवी चैनलों का मुख्य विषय बनी रही। इन ख़बरों के बीच में मुंबई सहित बाकी देश में कोरोना के कारण पैदा हुई आर्थिक तबाही, बेरोज़गारी और फ़िल्मी दुनिया में काम करने वालों की भीख मांगने की मजबूरी का कहीं भी ज़िक्र नहीं हो रहा है। बड़े शहरों ने बेरोजगार होकर गांवों में गये लोग जिस तरह से अपराध की तरफ प्रवृत्त हो रहे हैं वह भी कहीं चर्चा में नहीं आ रहा है।
राजस्थान में संविधान की व्याख्या को लेकर जो संकट मौजूद है उसका भी ज़िक्र केवल सचिन पायलट के अधिकारों को छीन लेने तक सीमित कर दिया गया है। वहां के राज्यपाल की संदिग्ध भूमिका का टीवी चैनलों में विश्लेषण नहीं हो रहा है। मायावती की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव हो चुका है। अगर कबीरपंथी पत्रकारिता का दौर होता तो उसका विधिवत विश्लेषण किया जाता लेकिन ऐसा कहीं कुछ देखने को नहीं मिल रहा है।राजस्थान में उनकी पार्टी के विधानमंडल दल ने अपना विलय कांग्रेस में बहुत पहले कर लिया था। अब मायावती उन कांग्रेसी विधायकों के लिए व्हिप जारी करती हैं या उनकी सदस्यता रद्द करवाने  सुप्रीम कोर्ट जाती हैं, उसकी जानकारी पूरी तरह से बार-बार देश को दी जा रही है लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि उनको यह काम करने की प्रेरणा कौन दे रहा है।
प्रेस की यह आजादी निर्बाध (एब्सॉल्यूट ) नहीं है। संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अनुच्छेद 19(2) में ही उसकी सीमाएं तय कर दी गई हैं।  संविधान में लिखा है  कि अभिव्यक्ति की आजादी  के  ‘अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी। यानी प्रेस की आज़ादी मौलिक अधिकारों के तहत कुछ भी लिखने की आजादी नहीं है। हालांकि यह भी सच है कि सत्ताधीश कई बार इस आजादी को गैर-संवैधानिक तरीकों से कुचल भी देते हैं। सरकारी आदेश या अन्य तरीकों से मीडिया संस्थान या पत्रकारों पर हमले भी होते  हैं।
कई बार तो पत्रकारों को सही खबर लिखने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद उनके पुराने लेखों का ज़िक्र किया गया जिसमें उन्होंने ऐसी बातें लिखी थीं जो एक वर्ग को स्वीकार नहीं थीं। सोशल मीडिया पर सक्रिय एक वर्ग ने  चरित्र हनन का प्रयास भी किया। वे यह कहना चाह  रहे थे कि गौरी लंकेश की हत्या करना एक ज़रूरी काम था और जो हुआ वह ठीक ही हुआ।  आज ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की प्रवृत्तियों की निंदा की जाए। अगर इस बात को सही साबित करने की कोशिश की जायेगी तो लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान  लग जाएगा। इस लोकतंत्र को बहुत ही मुश्किल से हासिल किया गया है और उतनी ही मुश्किल से इसको संवारा गया है।
अगर समाचार संस्थान जनता तक सही बातें और वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं पहुंचाएंगे, तो सत्ता पक्ष के लिए भी मुश्किल होगी। वास्तव में चारण पत्रकारिता सत्ताधारी पार्टियों की सबसे बड़ी दुश्मन है क्योंकि वह सत्य पर पर्दा डालती है और सरकारें ग़लत फ़ैसले लेती हैं । ऐसे माहौल में सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह मीडिया को निष्पक्ष और निडर बनाए रखने में योगदान करे और चापलूस पत्रकारों से पिंड छुड़ाए। सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के सवाल पूछने के अधिकार और आज़ादी  सुनिश्चित करे साथ ही संविधान के अनुच्छेद 19(2) की सीमा में रहते हुए कुछ भी लिखने की आज़ादी और अधिकार को सरकारी तौर पर गारंटी की श्रेणी में ला दे। इससे निष्पक्ष पत्रकारिता का बहुत लाभ होगा। ऐसी कोई व्यवस्था कर दी जाए जो सरकार की चापलूसी करने को  पत्रकारीय कर्तव्य पर कलंक माने और इस तरह का काम करने वालों को हतोत्साहित करे। अगर मौजूदा सरकार इस तरह का माहौल बनाने में सफल होती है तो वह राष्ट्रहित और समाज हित में होगा।
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